संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * विरोचनका बलिको भोगोंसे वैराग्य तथा विचारपूर्वक आत्मसाक्षात्कारके लिये उपदेश * २७५
त्यागकी अभिलाषा एवं चिन्तन करते हुए भोगोंकी ओरसे विरक्तिका अभ्यासपूर्वक विस्तार करे—ठीक वैसे ही, जैसे सींचने आदिके द्वारा लगायी हुई बेलको बढ़ाया जाता है। बेटा! हर्ष और अमर्षसे रहित शुभ कर्मफलको प्राप्त करनेके लिये इस संसारमें परम पुरुषार्थके सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है। पुरुषार्थसे ही उसकी प्राप्ति होती है। संसारमें दैवकी चर्चा बहुत की जाती है। परन्तु दैव कहीं देहधारण करके स्थित हो, ऐसी बात नहीं है। अवश्य होनेवाली जो भवितव्यता है—नियतिके द्वारा मिलनेवाला जो अपने ही शुभाशुभ कर्मोंका फल है, उसीको यहाँ दैव अथवा प्रारब्ध नाम दिया गया है।
प्रारब्ध-भोगरूप जो दैव है, उसे परम पुरुषार्थसे ही जीता जाता है। जीवात्मा पुरुष-शरीर धारण करके पुरुषार्थसे जिस पदार्थका जैसे संकल्प करता है, इस लोकमें वह पदार्थ उसे उसी रूपमें प्राप्त होता है, दूसरे किसी रूपमें नहीं। बेटा! इस जगत्में पुरुषार्थके सिवा दूसरा कुछ नहीं है। अतः उत्तम पुरुषार्थका आश्रय ले भोगोंकी ओरसे वैराग्य प्राप्त करे। जबतक भोगोंसे वैराग्य, जो संसार-बन्धनका विनाश करनेवाला है, नहीं प्राप्त होता, तबतक विजयदायक परमानन्दकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जबतक मोहमें डालनेवाली विषयासक्ति बनी हुई है, तबतक भवदशारूपी झूला चञ्चल गतिसे आन्दोलित होता रहता है अर्थात् जीवको संसारमें भटकानेवाली अस्थिर अवस्था प्राप्त होती रहती है। पुत्र! अभ्यासके बिना विषयभोगरूपी भुजङ्गोंसे भरी हुई दुःखदायिनी दुराशा कदापि दूर नहीं होती।
बलिने पूछा—असुरेश्वर! विषयोंकी ओरसे जो वैराग्य है, वह जीवके अन्त:करणमें कैसे दृढतापूर्वक स्थित होता है?
विरोचनने कहा—बेटा! आत्मसाक्षात्काररूपिणी फलदायिनी लता जीवके अन्तःकरणमें विषयभोगोंसे विरक्तिरूपी फल अवश्य उत्पन्न करती है। आत्म-साक्षात्कार होनेपर विषयोंमें (राग-आसक्ति) का अत्यन्त अभाव हो जाता है। इसलिये पुरुष पवित्र और तीक्ष्ण बुद्धिके द्वारा अति उत्तम विवेक-विचारसे परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करे। साथ ही विषयोंकी आसक्तिसे सर्वथा रहित हो जाय। पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिवाला पुरुष दिनके दो भागोंमें अपने चित्तको वैराग्यपूर्वक परमार्थ-साधनरूप सत्-शास्त्रके अनुशीलनमें लगाये, तीसरे भागमें एकान्तदेशमें स्थित होकर मनको सच्चिदानन्दघन परमात्माके ध्यानमें लगाये तथा चौथे भागमें अपने चित्तको श्रद्धाभक्तिपूर्वक गुरुकी सेवा और आज्ञापालनमें लगाये। साधु स्वभाव (श्रेष्ठ आचरण) को प्राप्त हुआ पुरुष ही ज्ञानोपदेश पानेका अधिकारी होता है। जैसे स्वच्छ वस्त्र ही उत्तम रंगको ग्रहण करता है, उसी तरह सदाचारी पुरुष ही ज्ञानोपदेशको अपने हृदयमें धारण करता है। यह चित्त एक बालकके समान है। इसे पवित्र, वचनों, युक्तियों और शास्त्रके अनुशीलनसे धीरे-धीरे लाड़-प्यारके साथ रिझाकर वशमें करना चाहिये।
बेटा! शुद्ध और सूक्ष्म बुद्धिसे तृष्णा-आसक्तिका सर्वथा अभाव करते हुए ही सच्चिदानन्दघन परमात्माका चिन्तन करना चाहिये; क्योंकि परमात्माका साक्षात्कार होनेपर तृष्णा एवं आसक्तिका सर्वथा अभाव होता है और तृष्णा एवं आसक्तिका अभाव होनेपर परमात्माका साक्षात्कार होता है। इस तरह ये दोनों बातें एक-दूसरेपर अवलम्बित हैं। इसलिये दोनों साधनोंको एक साथ करते रहना चाहिये। जब भोग-समूहोंमें आसक्तिका अत्यन्त अभाव हो जाता है तथा परावरस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मदेवका साक्षात्कार हो जाता है, तब जीवको कभी नष्ट न होनेवाली सीमारहित परमशान्ति प्राप्त हो जाती है। विषयोंमें ही आनन्द मानकर उनका आस्वादन करनेवाले मनुष्योंको तो इस जगत्में कभी भी परमात्म-तत्त्वके श्रवण बिना निस्सीम एवं निरतिशय आनन्दकी