भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

उपशम-प्रकरण ] * पुण्यका पावनको उपदेश * २७१


ली गयी है, वह बन्धु हो गया और जिसके प्रति शत्रुको भावना कर ली गयी, वह शत्रु हो गया। परंतु सभी शरीरोंमें अभिन्नरूपसे विद्यमान जो सर्वव्यापी आत्मा है, उस एकमें ही 'यह बन्धु है, यह शत्रु है' ऐसी कल्पना कैसे हो सकती है? वत्स ! यह शरीर रक्त, मांस और हड्डियोंका समूह है, अस्थियोंका पञ्जर है; इससे भिन्न मैं कौन हूँ, इसका तुम स्वयं अपने चित्तसे विचार करो। पारमार्थिक दृष्टिसे देखनेपर न तुम कोई हो और न मैं कोई हूँ। 'यह पुण्य है, यह पावन है' इत्यादि कल्पनाओंके रूपमें मिथ्याज्ञान ही नृत्य कर रहा है। यदि तुम आत्मासे भिन्न कोई लिङ्गशरीर ही हो तो बताओ । बीते हुए दूसरे अनेक जन्मोंमें जो तुम्हारे बन्धु और धन-वैभव नष्ट हो गये हैं, उनके लिये भी शोक क्यों नहीं करते ? सुन्दर फूलोंसे सुशोभित वनस्थलियोँमें तुम्हारे बहुत-से बन्धु मृगयोनियोंमें मृग-शरीर धारण करके रहे हैं, उनके लिये तुम्हें शोक क्यों नहीं हो रहा है ? वत्स ! इसी जम्बूद्वीपमें तुम पहले अन्यान्य बहुत-सी योनियोंमें सैकड़ों-हजारों बार जन्म ले चुके हो। मैं तत्त्वज्ञानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म-बुद्धिके द्वारा तुम्हारे और अपने पूर्वजन्मके वासना-क्रमको देख रहा हूँ। मेरी भी बहुत-सी योनियों अनेक बार बीत चुकी हैं, उन मोह-मन्थर (अज्ञानसे जडीभूत) अतीत योनियोंको आज मैं तत्त्वज्ञानसे उदित हुई सूक्ष्मदृष्टिसे द्वारा देखता और स्मरण करता हूँ। ऐसी अवस्थामें जो जगत्‌में उत्पन्न हुए सैकड़ों माता-पिता, भाई-बन्धु और मित्र कालके गालमें जा चुके हैं, उनमेंसे किन-किनके लिये हम दोनों शोक करें और किनके लिये न करें। अथवा किनको-किनको छोड़कर यहाँ किन-किनके लिये हम शोकमें डूबे रहें; क्योंकि संसारकी तो ऐसी ही गति है। पावन ! तुम्हारा भला हो। मनमें अहम्भावके रूपमें स्थित इस प्रपञ्च-भावनाको त्यागकर तुम उस गतिको प्राप्त करो, जो आत्मज्ञानी पुरुषोंको उपलब्ध होती है। वत्स ! तुम शान्तचित्त होकर आत्माका—अपने आपका जो भाव और अभाव (उत्पत्ति और विनाश) से मुक्त तथा जरा और मृत्युसे रहित है, स्मरण करो। मनमें मूढ़ता न लाओ। उत्तम बुद्धिवाले पावन ! न तुम्हें दुःख है न तुम्हारा जन्म हुआ है, न तुम्हारी कोई माता है और न पिता ही है। तुम केवल शुद्ध-बुद्ध आत्मा हो, दूसरे कोई नहीं हो। जैसे रात होनेपर दीपक संनिधिमात्रसे प्रकाशके कर्ता होते हुए भी व्यापार-शून्य होनेके कारण अकर्ता ही हैं, उसी प्रकार तत्त्वज्ञानी पुरुष कर्तापनके अभिमानसे रहित होनेके कारण लोक-व्यवहारकी स्थितिमें कर्ता होकर भी अकर्ता ही हैं। वत्स ! जो समस्त एषणाओंके कलङ्कसे रहित एवं मननशील है तथा जिसका हृदय-कमलमें खस्थ आत्मस्वरूपसे साक्षात्कार किया गया है, उस आत्माके द्वारा अपने भीतरके सम्पूर्ण संसारभ्रमको मिटाकर अवशिष्ट हुए उस भावरूप आत्मा (परब्रह्म परमात्मा) से ही संतोष प्राप्त करो।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! पुण्यके इस प्रकार समझाने-बुझानेपर पावनको उत्कृष्ट बोध (परमात्म-तत्त्वका दृढ़ निश्चय) प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् ज्ञान और विज्ञानमें पारंगत तथा सिद्ध और अनिन्द्य स्थितिको प्राप्त हुए वे दोनों बन्धु उस वनमें इच्छानुसार विचरने लगे। तदनन्तर

२७२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


समय आनेपर वे दोनों देहरहित हो परम निर्वाणपद (परमात्मा) को प्राप्त हो गये । निष्पाप श्रीराम ! इस प्रकार पूर्वजन्मोंमें जो असंख्य देह धारण कर चुके हैं, उन प्राणियोंके माता-पिता, बन्धु-बान्धव आदिका समुदाय अनन्त है । उनमेंसे कौन किनको ग्रहण करे और कौन किनका त्याग । रघुनन्दन ! इसलिये इन असंख्य तृष्णाओंकी निवृत्तिका एकमात्र उपाय त्याग ही है, उनको पोसना नहीं । जैसे लकड़ी डालनेसे आग प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार विषय-भोगोंके चिन्तनसे चिन्ता बढ़ती जाती है; और जैसे बिना ईंधनके आग बुझ जाती है, उसी प्रकार विषयोंका चिन्तन न करनेसे चिन्ता मिट जाती है । एकमात्र विवेकरूपी सखा और एकमात्र पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिरूपिणी प्रिय सखीको साथ ले संसारमें शास्त्रविहित आचरण करनेवाला पुरुष संकट पड़नेपर भी मोहग्रस्त नहीं होता । वैराग्यसे, शास्त्रोंके अभ्याससे तथा महत्तायुक्त क्षमा, दया, शान्ति, समता और संतोष आदि गुणोंसे यत्नपूर्वक आपत्तिका निवारण करनेके लिये मनुष्य स्वयं ही मनको उन्नत बनाये । जो परम पदकी प्राप्तिरूप फल पूर्वोक्त महत्तायुक्त गुणोंसे उत्कर्षको प्राप्त हुए मनके द्वारा उपलब्ध हो सकता है, वह तीनों लोकोंके ऐश्वर्य तथा रत्नोंसे भरे हुए कोशकी प्राप्तिसे भी नहीं हो सकता । मनके विशुद्ध अमृत-रससे पूर्ण होनेपर सारी वसुधा आनन्दकी सुधा-धारासे आप्लावित हो जाती है। मन वैराग्यसे ही पूर्णताको प्राप्त—विज्ञानानन्दघन रससे परिपूर्ण होता है। आशा (इच्छा, कामना आदि) के वशीभूत हुआ मन उपर्युक्त पूर्णताको नहीं प्राप्त होता । जिनके चित्तमें किसी लौकिक वस्तुकी स्पृहा नहीं है, उन लोगोंके लिये तीनों लोकोंका ऐश्वर्य कमलगट्टेके समान अत्यन्त तुच्छ है । श्रीराम ! चित्तके नष्ट हो जानेपर अविचल धैर्यसे युक्त पुरुष उस परमपदको प्राप्त कर लेता है, जहाँ फिर नाशका भय नहीं है। (सर्ग २०-२१)


राजा बलिके अन्तःकरणमें वैराग्य एवं विचारका उदय तथा उनका अपने पितासे पहलेके पूछे हुए प्रश्नोंका स्मरण करना

श्रीवसिष्ठजीने कहा—अथवा हे रघुकुलरूपी आकाशके पूर्ण चन्द्रमा श्रीराम ! तुम राजा बलिकी भाँति विवेकके द्वारा परब्रह्म परमात्माका यथार्थ एवं विशुद्ध ज्ञान प्राप्त करो ।

श्रीरामचन्द्रजी बोले—भगवन् ! सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता गुरुदेव ! आपकी कृपासे मुझे प्राप्तव्य सच्चिदानन्दघन परमात्माके ज्ञानका यथार्थ अनुभव प्राप्त है और उसी निर्मल पदमें मैं परम शान्तिको प्राप्त होकर स्थित हूँ । प्रभो ! जैसे शरद्ऋतुमें आकाशसे बा दल हट जाते हैं उसी प्रकार मेरे चित्तसे तृष्णा नामक महान् तम (अज्ञानान्धकार) का अत्यन्त अभाव हो गया है। पूर्णिमाके सायंकालमें उदित हुए आकाशवर्ती शीतल अमृतमयी किरणोंसे सम्पन्न तथा महातेजस्वी पूर्ण चन्द्रमाके समान मैं विज्ञानानन्दघनमय अमृतसे परिपूर्ण, चिन्मय आकाशस्वरूप ब्रह्ममें विराजमान शान्तिमय महान् प्रकाशस्वरूप तथा अन्तःकरणमें परमानन्दसे परिपूर्ण होकर स्थित हूँ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! मैं तुमसे बलिके उत्तम वृत्तान्तका वर्णन करता हूँ, सुनो ! इस ब्रह्माण्ड-कोशके भीतर किसी दिशारूपी निकुञ्जमें भूमिके नीचे विद्यमान पाताल नामसे विख्यात एक लोक है, जिसमें असुरोंके बाहुदण्डोंपर आधारित महान् साम्राज्य है ।

उपशम-प्रकरण ] * राजा बलिके अन्तःकरणमें वैराग्य एवं विचारका उदय *

उस साम्राज्यपर विरोचनकुमार बलि राजाके रूपमें प्रतिष्ठित हुए। वे दैत्यराज बलि त्रिलोकीके रत्नोंके कोश, समस्त शरीरधारियोंके रक्षक तथा भुवनपालोंके भी पाळक हैं। साक्षात् भगवान् विष्णु उनकी रक्षा करते हैं। उन्होंने अनायास ही वशमें किये हुए सम्पूर्ण लोकोंके विस्तारसे अपने आपको विभूषित करके दस करोड़ वर्षोंतक राज्य किया। तदनन्तर आने-जानेवाले बहुत-से युग बीत गये। देवताओं और असुरोंके महान् समूह कभी उन्नतिको प्राप्त हुए और कभी उनका पतन हुआ। तीनों लोकोंमें अत्यन्त उत्कृष्ट समझे जानेवाले बहुत-से भोगोंका निरन्तर उपभोग करते-करते एक समय दानवराज बलिको उन भोगोंसे अत्यन्त उद्वेग (वैराग्य) प्राप्त हुआ। एक दिन मेरुपर्वतके शिखरपर स्थित रत्नोंके बने हुए विशाल भवनमें खिड़कीके सामने बैठे हुए दैत्यराज बलि स्वयं ही संसारकी स्थितिपर विचार करने लगे— 'अहो ! अक्षुण्ण शक्तिवाले मुझ बलिको अब इस लोकमें कितने समयतक यह साम्राज्य चलाना और तीनों लोकोंमें विचरना होगा ? मेरा यह महान् राष्ट्र तीनों लोकोंको आश्चर्यमें डालनेवाला है। प्रचुर भोगोंसे सम्पन्न होनेके कारण यह अत्यन्त मनोहर जान पड़ता है, किंतु इसके उपभोगसे मेरा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध हो रहा है ! आरम्भमें तभीतक मधुर प्रतीत होता है, जबतक नष्ट या विकृत नहीं हो जाता, और जिसका विनाश अवश्यम्भावी है, उस भोग-समुदायका उपभोगमात्र करना मेरे लिये क्या सुखदायक हो सकता है ? जिसके प्राप्त हो जानेपर दूसरा कुछ पाना या करना शेष न रह जाय, उस परम उदार अद्वितीय (परमात्मप्राप्तिरूप) फलको मैं यहाँ नहीं देख पाता । इन क्षणभङ्गुर भोगोंको छोड़कर दूसरा नित्य, उत्तम एवं यथार्थ सुख क्या है ? इसीका मैं विचार करता हूँ।' विवेक-वैराग्ययुक्त बुद्धिसे ऐसा सोच-समझकर राजा बलि तत्काल ध्यानमग्न हो गये।

तदनन्तर विचार किये हुए परम पुरुषार्थका मन-ही-मन चिन्तन करते हुए असुरराज बलिने क्षणभरमें भूतपूर्व स्मरणपूर्वक कहा—"अरे ! याद आ गया। पहलेकी बात है, जिन्होंने लोकके छोटे-बड़े सभी व्यवहारोंको देखा था तथा जो आत्मतत्त्वके ज्ञानसे सम्पन्न थे, उन अपने ऐश्वर्यशाली पिता महाराज विरोचनसे मैंने पूछा—'महामते ! जहाँ समस्त दुःखों और सुखोंसे सम्बन्ध रखनेवाले मार्ग शान्त हो जाते हों, संसारकी वह सीमा कौन है ! तात !

२७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मनका मोह कहाँ शान्त होता है ? समस्त एषणाओंका कहाँ अभाव होता है तथा चिरकालके लिये निरन्तर एवं पुनरावृत्तिरहित विश्राम कहाँ प्राप्त होता है ? पूज्य पिताजी ! अविनाशी आनन्दसे परम सुन्दर किसी ऐसे परमपदका मेरे लिये वर्णन कीजिये, जहाँ स्थित होकर मैं सदाके लिये परमशान्ति प्राप्त कर लूँ।' मेरे इस प्रश्नको सुनकर पिताने सम्मोहशान्ति (अज्ञान-निवारण) के लिये मुझसे यह बात कही।' (सर्ग २२-२३)


विरोचनका बलिको भोगोंसे वैराग्य तथा विचारपूर्वक परमात्मसाक्षात्कारके लिये उपदेश

विरोचन बोले—महामते ! मनुष्यसे लेकर ब्रह्मपदतक सम्पूर्ण पदोंका अतिक्रमण करनेवाला जो मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरका स्वामी शुद्ध आत्मा है, वह एक राजाके समान है। उसने बुद्धियुक्त मनको अपना मन्त्री बनाया है। उस मन्त्रीको जीत लेनेपर सबको जीत लिया जाता है और सब कुछ प्राप्त हो जाता है। परंतु उसे अत्यन्त दुर्जय समझना चाहिये। वह बलसे नहीं, युक्तिसे ही जीता जाता है।

बलिने कहा—भगवन् ! उस चित्तरूपी मन्त्रीपर आक्रमण करनेके लिये जो युक्ति या उपाय हो, उसे आप भलीभाँति बताइये, जिससे मैं उस भयंकर मनपर विजय पा सकूँ।

विरोचन बोले—बेटा ! सभी विषयोंके प्रति सब प्रकारसे जो अत्यन्त अनास्था (वैराग्य) है वही मनपर विजय पानेके लिये उत्तम युक्ति है। यह अनास्था ही वह उत्तम युक्ति है, जिससे महान् मदमत्त मनरूपी मातङ्ग (गजराज) का शीघ्र ही दमन किया जा सकता है। महामते ! यह युक्ति अत्यन्त दुर्लभ और परम सुलभ भी है। यदि इसके लिये अभ्यास न किया जाय तो यह अत्यन्त दुर्लभ है। परंतु यदि इसके लिये भलीभाँति अभ्यास किया जाय तो यह अनायास ही प्राप्त हो जाती है। बेटा ! यदि क्रमशः विषयोंसे विरक्त होनेका अभ्यास किया जाय तो जैसे सींचनेसे लता लहलहा उठती है, उसी प्रकार यह विरक्ति भी सब ओरसे सुस्पष्टतः प्रकट हो जाती है। पुत्र ! जैसे बोये बिना धान नहीं प्राप्त होता, वैसे ही यदि विरक्तिके लिये अभ्यास न किया जाय तो विषय लोलुप पुरुष कितना ही क्यों न चाहे, यह विरक्ति उसे नहीं मिलती; अतः तुम इसे अभ्यासके द्वारा दृढ़ करो। संसाररूपी गर्तमें निवास करनेवाले ये जीव तबतक नाना प्रकारके दुःखोंमें भटकते रहते हैं, जबतक उन्हें विषयोंसे वैराग्य नहीं हो जाता। जैसे कोई अत्यन्त बलवान् देहवाला मनुष्य भी यदि पैर उठाकर कहीं जाय नहीं तो वह देशान्तरमें नहीं पहुँच सकता, उसी तरह कोई शारीरिक शक्तिसे सम्पन्न पुरुष भी यदि अभ्यास न करे तो वह विषयोंसे वैराग्य नहीं प्राप्त कर सकता। इसलिये देहधारी मनुष्यको चाहिये कि वह जीवन्मुक्तिके हेतुभूत पूर्वकथित ध्येय नामक वासना-

उपशम-प्रकरण ] * विरोचनका बलिको भोगोंसे वैराग्य तथा विचारपूर्वक आत्मसाक्षात्कारके लिये उपदेश * २७५


त्यागकी अभिलाषा एवं चिन्तन करते हुए भोगोंकी ओरसे विरक्तिका अभ्यासपूर्वक विस्तार करे—ठीक वैसे ही, जैसे सींचने आदिके द्वारा लगायी हुई बेलको बढ़ाया जाता है। बेटा! हर्ष और अमर्षसे रहित शुभ कर्मफलको प्राप्त करनेके लिये इस संसारमें परम पुरुषार्थके सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है। पुरुषार्थसे ही उसकी प्राप्ति होती है। संसारमें दैवकी चर्चा बहुत की जाती है। परन्तु दैव कहीं देहधारण करके स्थित हो, ऐसी बात नहीं है। अवश्य होनेवाली जो भवितव्यता है—नियतिके द्वारा मिलनेवाला जो अपने ही शुभाशुभ कर्मोंका फल है, उसीको यहाँ दैव अथवा प्रारब्ध नाम दिया गया है।

प्रारब्ध-भोगरूप जो दैव है, उसे परम पुरुषार्थसे ही जीता जाता है। जीवात्मा पुरुष-शरीर धारण करके पुरुषार्थसे जिस पदार्थका जैसे संकल्प करता है, इस लोकमें वह पदार्थ उसे उसी रूपमें प्राप्त होता है, दूसरे किसी रूपमें नहीं। बेटा! इस जगत्में पुरुषार्थके सिवा दूसरा कुछ नहीं है। अतः उत्तम पुरुषार्थका आश्रय ले भोगोंकी ओरसे वैराग्य प्राप्त करे। जबतक भोगोंसे वैराग्य, जो संसार-बन्धनका विनाश करनेवाला है, नहीं प्राप्त होता, तबतक विजयदायक परमानन्दकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जबतक मोहमें डालनेवाली विषयासक्ति बनी हुई है, तबतक भवदशारूपी झूला चञ्चल गतिसे आन्दोलित होता रहता है अर्थात् जीवको संसारमें भटकानेवाली अस्थिर अवस्था प्राप्त होती रहती है। पुत्र! अभ्यासके बिना विषयभोगरूपी भुजङ्गोंसे भरी हुई दुःखदायिनी दुराशा कदापि दूर नहीं होती।

बलिने पूछा—असुरेश्वर! विषयोंकी ओरसे जो वैराग्य है, वह जीवके अन्त:करणमें कैसे दृढतापूर्वक स्थित होता है?

विरोचनने कहा—बेटा! आत्मसाक्षात्काररूपिणी फलदायिनी लता जीवके अन्तःकरणमें विषयभोगोंसे विरक्तिरूपी फल अवश्य उत्पन्न करती है। आत्म-साक्षात्कार होनेपर विषयोंमें (राग-आसक्ति) का अत्यन्त अभाव हो जाता है। इसलिये पुरुष पवित्र और तीक्ष्ण बुद्धिके द्वारा अति उत्तम विवेक-विचारसे परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करे। साथ ही विषयोंकी आसक्तिसे सर्वथा रहित हो जाय। पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिवाला पुरुष दिनके दो भागोंमें अपने चित्तको वैराग्यपूर्वक परमार्थ-साधनरूप सत्-शास्त्रके अनुशीलनमें लगाये, तीसरे भागमें एकान्तदेशमें स्थित होकर मनको सच्चिदानन्दघन परमात्माके ध्यानमें लगाये तथा चौथे भागमें अपने चित्तको श्रद्धाभक्तिपूर्वक गुरुकी सेवा और आज्ञापालनमें लगाये। साधु स्वभाव (श्रेष्ठ आचरण) को प्राप्त हुआ पुरुष ही ज्ञानोपदेश पानेका अधिकारी होता है। जैसे स्वच्छ वस्त्र ही उत्तम रंगको ग्रहण करता है, उसी तरह सदाचारी पुरुष ही ज्ञानोपदेशको अपने हृदयमें धारण करता है। यह चित्त एक बालकके समान है। इसे पवित्र, वचनों, युक्तियों और शास्त्रके अनुशीलनसे धीरे-धीरे लाड़-प्यारके साथ रिझाकर वशमें करना चाहिये।

बेटा! शुद्ध और सूक्ष्म बुद्धिसे तृष्णा-आसक्तिका सर्वथा अभाव करते हुए ही सच्चिदानन्दघन परमात्माका चिन्तन करना चाहिये; क्योंकि परमात्माका साक्षात्कार होनेपर तृष्णा एवं आसक्तिका सर्वथा अभाव होता है और तृष्णा एवं आसक्तिका अभाव होनेपर परमात्माका साक्षात्कार होता है। इस तरह ये दोनों बातें एक-दूसरेपर अवलम्बित हैं। इसलिये दोनों साधनोंको एक साथ करते रहना चाहिये। जब भोग-समूहोंमें आसक्तिका अत्यन्त अभाव हो जाता है तथा परावरस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मदेवका साक्षात्कार हो जाता है, तब जीवको कभी नष्ट न होनेवाली सीमारहित परमशान्ति प्राप्त हो जाती है। विषयोंमें ही आनन्द मानकर उनका आस्वादन करनेवाले मनुष्योंको तो इस जगत्में कभी भी परमात्म-तत्त्वके श्रवण बिना निस्सीम एवं निरतिशय आनन्दकी

२७६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

प्राप्ति नहीं होती। सकामभावसे किये गये यज्ञ, दान, तप और तीर्थसेवनसे तो स्वर्गादि सुख ही प्राप्त होते हैं। आत्माका यथार्थ ज्ञान हुए बिना उन तप, दान और तीर्थ-सेवनरूप सकाम साधनोंद्वारा जीवको कभी विषयोंसे वैराग्य नहीं होता।

बेटा ! अपने परम पुरुषार्थके बिना पुरुषकी बुद्धि किसी भी युक्तिसे कल्याणके हेतुभूत आत्मज्ञानमें प्रवृत्त नहीं होती। भोगोंके सर्वथा त्यागसे प्राप्त होनेवाले परम पुरुषार्थके बिना ब्रह्मपदकी प्राप्तिरूप परम शान्ति एवं परमानन्दकी उपलब्धि नहीं होती। परम कारणरूप परमात्माका यथार्थ बोध हो जानेपर मनुष्यको जैसी शान्ति प्राप्त होती है, वैसी ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त इस सम्पूर्ण जगत्‌में कहीं भी नहीं मिलती। बुद्धिमान् मनुष्य परम पुरुषार्थका आश्रय ले दैव (प्रारब्ध) को दूरसे ही त्याग दे तथा कल्याणरूपी भवनके द्वारको दृढ़तापूर्वक बन्द रखनेवाले अर्गलारूप जो भोग हैं, उनसे घृणा करे—उनकी ओरसे सर्वथा विरक्त हो जाय। भोगोंके प्रति वैराग्यसे परमात्मविषयक विचार उत्पन्न होता है और परमात्मविषयक विचार उदित होनेपर भोगोंकी ओरसे वैराग्य होने लगता है। जैसे समुद्र बादलोंको और बादल समुद्रको भरते हैं, उसी तरह ये दोनों साधन एक-दूसरेके पूरक हैं। जैसे परस्पर अत्यन्त स्नेह रखनेवाले सुहृद् एक-दूसरेके मनोरथ सिद्ध करते हैं, उसी प्रकार भोगोंसे वैराग्य, परमात्म-विषयक विचार और नित्य आत्मदर्शन—ये तीनों एक दूसरेको पुष्ट करते हैं। मनुष्यको चाहिये कि पहले देशाचार और सदाचारके अनुकूल तथा बन्धु-बान्धवोंकी सम्पत्तिके अनुरूप न्याययुक्त पुरुषार्थद्वारा क्रमशः धनका उपार्जन करे। उस धनके द्वारा कुलीन और गुणशाली सज्जनोंको अपनाये—उनकी सेवा करके उन्हें अपने अनुकूल बनाये। उन सत्पुरुषोंका सङ्ग करनेसे भोगोंकी ओरसे विरक्ति होने लगती है। तदनन्तर विवेकपूर्वक विचारका उदय होता है। तत्पश्चात् शास्त्रोंके यथार्थ अर्थका अनुभव होता है। उसके बाद क्रमशः परम पदस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति होती है। (सर्ग २४)


बलिको पिताके दिये हुए ज्ञानोपदेशके स्मरणसे संतोष तथा पहलेकी अज्ञानमयी स्थितिको याद करके खेद प्रकट करते हुए शुक्राचार्यका चिन्तन करना, शुक्राचार्यका आना और बलिसे पूजित होकर उन्हें सारभूत सिद्धान्तका उपदेश देकर चला जाना

बलि मन-ही-मन कहने लगे—पूर्वकालमें सुन्दर विचार रखनेवाले मेरे पूज्य पिताजीने मुझे ऐसा उपदेश दिया था। सौभाग्यकी बात है कि वह उपदेश मुझे इस समय याद आ गया, इससे मैं प्रबुद्ध हो गया हूँ। आज मेरे अन्तःकरणमें भोगोंके प्रति यह अतिशय विरक्ति प्रत्यक्ष अनुभवमें आने लगी है। बड़े आनन्दकी बात है कि मैं अमृतके समान शीतल, विशुद्ध एवं परम शान्तिमय परमानन्द-सिन्धुमें प्रविष्ट हो गया हूँ। अहा ! अन्तःकरणको शीतल बना देनेवाली यह शान्तिमय स्थिति बड़ी ही रमणीय है। इस शान्तिमयी स्थितिमें सुख-दुःखकी सारी दृष्टियाँ ही शान्त (विलीन) हो गयी हैं। परम उपरतिमें स्थित हो मैं परम शान्तिका अनुभव करता हूँ। सब ओरसे निर्वाणको प्राप्त हो रहा हूँ। सुखपूर्वक स्थित हूँ और मेरे अन्तःकरणमें ऐसा अपार हर्ष हो रहा है, मानो मुझे चन्द्रमण्डलमें स्थापित कर दिया गया है। समस्त वैभवोंके दृष्टान्तभूत महान् वैभवका मैंने उपभोग किया, भोगने योग्य सारे भोगोंको बिना किसी बाधाके भोग लिया और समस्त

उपशम-प्रकरण ] * बलिका पिताके दिये हुए ज्ञानोपदेशके स्मरणसे संतोष * २७७


प्राणियोंको पददलित कर दिया, तो भी इससे मुझे कौन-सा सुन्दर लाभ मिला ? परलोकमें, इस लोकमें तथा अन्य स्वर्ग आदिमें इधर-उधर, बारंबार वे ही पहलेकी अनुभव की हुई वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं। कहीं कोई अपूर्व (नूतन) वस्तु नहीं है । पातालमें, भूलोकमें और स्वर्गमें सार पदार्थ क्या है—सुन्दरी स्त्रियाँ, रत्न एवं मणिमय प्रस्तर आदि । परंतु काल इन सबको क्षणभरमें निगल जाता है । आजसे पहले इतने समयतक मैं पूरा मूर्ख बना रहा जो तुच्छ सांसारिक वस्तुओंकी इच्छासे देवताओंके साथ द्वेष करता रहा । जो मनकी कल्पनामात्रा है, उस जगत् नामकी महती मानसिक व्यथाका त्याग न करनेसे कौन-सा पुरुषार्थ सिद्ध होता है ? इसमें महात्मा पुरुषका क्या अनुराग होगा ? अहो ! बड़े दुःखकी बात है कि अज्ञानरूपी मदसे मत्त हुए मैंने दीर्घकालतक अनर्थमें ही अर्थ-बुद्धि करके स्वयं ही उसका सेवन किया । अत्यन्त चञ्चल तृष्णावाले मुझ मूर्खने तीनों लोकोंमें केवल अपने पश्चात्तापको बढ़ानेके लिये अबतक क्या नहीं किया ? अब मैं आश्रित जनोंपर सदा प्रसन्न रहनेवाले गुरुदेव भगवान् शुक्राचार्यका चिन्तन करता हूँ । उनकी वाणीद्वारा उपदेश पाकर मैं अनन्त प्रभावशाली विज्ञानानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें स्थित होऊँगा; क्योंकि महात्माओंके उपदेश-वाक्य अक्षय वस्तुको फलरूपमें उत्पन्न करते हैं—अविनाशी तत्त्वका बोध करा देते हैं ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! बलवान् बलिने ऐसा सोचकर आँखें बंद कर लीं और विज्ञानानन्दघन ब्रह्मस्वरूप आकाशमें स्थित कमलनयन शुक्राचार्यका चिन्तन किया । तब परमात्माके ध्यानमें नित्य तत्पर रहनेवाले शुक्राचार्यने सर्वव्यापी ब्रह्मके स्वरूपमें स्थित और चित्तके द्वारा परमात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले अपने शिष्य बलिके विषयमें यह जान लिया कि वह अपने नगरमें तत्त्वज्ञानकी इच्छा रखकर गुरुसे मिलना चाहता है । यह जानकर प्रभु शुक्राचार्यजी, जो सर्वगत अनन्त चेतन परमात्मामें स्थित हैं, अपने आपको बलिकी रत्ननिर्मित खिड़कीके पास ले आये अर्थात् वे बलिके यहाँ स्वयं उपस्थित हो गये । वहाँ राजा बलिने रत्नमय अर्घ्य देकर, मन्दारवृक्षके पुष्पोंकी राशियाँ चढ़ाकर और चरणोंमें मस्तक झुकाकर इन शुक्राचार्यका पूजन किया । जब वे रत्नमय अर्घ्य ग्रहण करके पूर्णतया पूजित तथा मन्दारवृक्षके फूलोंद्वारा निर्मित मुकुटसे विभूषित होकर बहुमूल्य आसनपर विराजमान हो गये, तब बलिने अपने उन गुरुदेवसे इस प्रकार कहा ।

बलि बोले—भगवन् ! जैसे नवोदित सूर्यकी प्रभा संध्या-वन्दन आदि कर्म करनेके लिये लोगोंको प्रेरित करती है, उसी प्रकार आपके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुई मेरी यह बुद्धि मुझे आपके सामने कुछ कहनेके लिये प्रेरित कर रही है । प्रभो ! मैं महान् मोह प्रदान करनेवाले भोगोंसे विरक्त हूँ, इसलिये ऐसे परम तत्त्वको जानना चाहता हूँ, जो अपने ज्ञानमात्रसे महान् मोहका नाश कर दे।

शुक्राचार्य बोले—सर्वदानवराजेन्द्र ! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ ? मैं आकाशमें जानेके लिये उद्यत हूँ; इसलिये संक्षेपसे सार तत्त्व बता रहा हूँ, सुनो ! इस संसारमें एकमात्र चेतन ही है । यह सब जगत् भी चेतनमात्र—चिन्मय ही है । तुम भी चिन्मय, मैं भी चिन्मय और ये लोक भी चिन्मय हैं। अर्थात् जो कुछ भी दिखायी देता है, वह सब एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है—यह समस्त सिद्धान्तोंका सार है । यदि तुम श्रद्धालु हो तो इस निश्चयसे तुम सब कुछ प्राप्त कर सकते हो; और यदि तुममें श्रद्धा नहीं है तो तुम्हें

२७८* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

दिया गया बहुत-सा उपदेश भी राखमें डाली गयी आहुतिके समान व्यर्थ है। चेतनकी जो विषयाकार कल्पना है, वही बन्धन है। उससे छूटना ही मोक्ष कहलाता है। विषयाकाररहित चेतन ही पूर्ण ब्रह्म परमात्मा है, यह समस्त सिद्धान्तोंका सार है। इस सिद्धान्तको ग्रहण करके यदि तुम स्वयं अखण्डाकार वृत्तिसे अपने द्वारा अपने आपका यथार्थ अनुभव करोगे तो अनन्त परमपदस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाओगे। मैं इस समय देवलोकको जाता हूँ। मुझे यहाँपर सप्तर्षि मिले थे। वहाँ देवताओंके किसी कार्यके लिये मुझे रहना होगा।

ऐसा कहकर शुक्राचार्यजी ग्रहसमुदायसे भरे हुए आकाशमार्गसे चले गये। (सर्ग २५-२६)


राजा बलिको शुक्राचार्यके दिये हुए उपदेशपर विचार करते-करते समाधिस्थ हो जाना, दानवोंके स्मरण करनेसे आये हुए दैत्यगुरुका बलिकी सिद्धावस्थाको बताकर उनकी चिन्ता दूर करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! देवताओं और असुरोंकी सभामें श्रेष्ठ माने जानेवाले भृगुनन्दन शुक्राचार्यके चले जानेपर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बलिने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—"भगवान् शुक्राचार्यने यह ठीक ही कहा है कि 'ये तीनों लोक चेतन ही हैं। मैं चेतन हूँ, ये सब लोग चेतन हैं, दिशाएँ चेतन हैं और ये सब क्रियाएँ भी चेतन ही हैं।' वास्तवमें जगत्‌के बाहर और भीतर सब चेतन ही है। चेतनके अतिरिक्त यहाँ कहीं कुछ भी नहीं हैं। इन्द्रियाँ चेतन हैं, शरीर चेतन है, मन चेतन है, उसकी इच्छा चेतन है, भीतर चेतन है, बाहर चेतन है, आकाश चेतन है, समस्त भाव-पदार्थ चेतन हैं तथा इस जगत्‌की स्थिति भी चेतन ही है। अर्थात् जो कुछ भी है, वह एक सच्चिदानन्दघन परमात्माका ही स्वरूप है। वहाँ केवल चेतन-ही-चेतन है, दूसरी कोई कल्पना ही नहीं है। संसारमें जब द्वैतकी सम्भावना ही नहीं है अर्थात् एक चेतन परमात्माके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी सत्ता ही नहीं है, तब कौन किसका शत्रु है और कौन किसका मित्र। बहुत विचारनेसे भी इस विशाल त्रिलोकीके भीतर चेतनके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु सिद्ध नहीं होती। उस अतिशय शुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मामें न द्वेष है न राग, न मन है और न उसकी वृत्तियाँ ही। फिर उस चिन्मय परमात्मामें विकल्पकी कल्पना हो ही कैसे सकती है। मैं सर्वत्र विचरनेवाला, व्यापक, नित्यानन्दमय, विकल्प-कल्पनासे रहित तथा द्वैतसे शून्य सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही हूँ। मैं आकाशके समान सर्वव्याप्त, अनन्त और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हूँ; इसलिये ये सुख-दुःख आदिकी दशाएँ मेरे पास नहीं फटक पातीं।"

इस प्रकार विचार करते हुए ही परम विवेकी दैत्यराज बलि ओंकारसे प्रकट हुए उसकी अर्धमात्रा (मकार

उपशम-प्रकरण] * राजा बलिका शुक्राचार्यके दियेहुए उपदेशपर विचार करते-करते समाधिस्थ हो जाना * २७९


अर्थभूत तुरीय परमात्माका चिन्तन करने लगे और चुपचाप समाधिस्थ हो गये। उस समय बलिके सारे संकल्प शान्त हो गये, समस्त कल्पनाएँ विलीन हो गयीं। उनके भीतर किसी प्रकारकी शङ्का नहीं रह गयी। वे ध्याता, ध्येय और ध्यानसे रहित हो गये। उनकी बुद्धिसे चेत्य, चिन्तक और चिन्तनकी त्रिपुटी दूर हो गयी। वे निर्मल और वासनाशून्य हो वायुरहित स्थानमें रक्खे हुए दीपककी लौके समान निश्चल हो गये। वे महान् पद (परमात्मा) को प्राप्त हो गये थे। उनका मन सर्वथा शान्त हो गया था। वे वहाँ रत्ननिर्मित वातायन (खिड़की) में दीर्घकालतक उसी तरह अविचल भावसे बैठे रहे, मानो प्रस्तरमें खुदी हुई मूर्ति हों।

रघुनन्दन! तदनन्तर बलिके अनुचर दानवलोग स्फटिकमणिके बने हुए उनके महलकी ऊँची अट्टालिकापर क्षणभरमें चढ़ गये। डिम्भ आदि धीर मन्त्री, कुमुद आदि सामन्त, सुर आदि राजा, वृत्त आदि सेनापति, हयग्रीव आदि सैनिक, चाक्राज आदि भाई-बन्धु, लहुक आदि सुहृद्, वल्लुक आदि लाड़ लड़ानेवाले सखा, हाथमें भेंट लेकर उपस्थित हुए कुबेर, यम और इन्द्र आदि देवता, सेवाका अवसर चाहनेवाले यक्ष, विद्याधर और नाग उस समय बलिकी सेवाके लिये उस स्थानपर आ पहुँचे। इनके सिवा त्रिलोकीके भीतर निवास करनेवाले अन्य बहुत-से सिद्ध भी आये। उनके पास आकर उन सबके मुकुट प्रणामके लिये झुक गये। उन सबने बड़े आदरके साथ राजा बलिको देखा, वे ध्यानमें मौन हो समाधिस्थ हो गये थे और चित्रलिखित पुरुषकी भाँति निष्कम्पभावसे बैठे थे। उस अवस्थामें उनका दर्शन करके अवश्य-कर्तव्य प्रणाम आदि कर चुकनेपर वे महान् असुर पहले तो उन्हें निष्प्राण समझकर विषादमें डूब गये, परंतु उनके मुखपर छायी हुई प्रसन्नता देख विस्मित हुए। तत्पश्चात् रोमाञ्च आदि आनन्दके चिह्न देखकर वे स्वयं भी आनन्दमग्न हो गये। परंतु उस समय अपना कोई रक्षक न देखकर वे भयके कारण शिथिल होने लगे। फिर दानव मन्त्रियोंने यह विचार किया कि अब यहाँ हमारे लिये कौन-सा कर्तव्य प्राप्त है। यह विचार आते ही उन्होंने सर्वज्ञ पुरुषोंमें श्रेष्ठ दैत्यगुरु शुक्राचार्यका स्मरण किया। स्मरण करते ही दैत्योंनें देखा, भृगुनन्दन शुक्र अपने तेजस्वी शरीरसे वहाँ उपस्थित हैं। असुरोंने उनकी पूजा की, फिर वे गुरुके उच्च सिंहासनपर विराजमान हुए। तदनन्तर शुक्राचार्यने

२८० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


दानवराज बलिको देखा, जो मौनभावसे ध्यानमग्न होकर बैठे थे। क्षणभर विश्राम करके शुक्राचार्यने बड़े प्रेमसे बलिकी ओर देखा और विचार करके वे इस निश्चयपर पहुँचे कि बलिका संसाररूपी भ्रम नष्ट हो गया है। तत्पश्चात् गुरुने उस दैत्यमण्डलीसे कहा—'दैत्यो ! ये

ऐश्वर्यशाली बलि अपनी विचारधारासे ही विशुद्ध परमपदको प्राप्त होकर सिद्ध हो गये हैं। यही अतिशय शान्तमय परमानन्द है। दानव-शिरोमणियो ! ये इसी तरह समाधिमें स्थित हो अपने परमानन्दस्वरूप आत्मामें नित्य स्थितिको प्राप्त हों और निर्विकार परमपदका साक्षात्कार करें। दानवो ! जैसे थके हुए पुरुषको विश्राम मिले, उसी प्रकार ये बलि भी चित्तकी भ्रान्तिसे रहित हो परम विश्रामको प्राप्त हुए हैं। इनका संसाररूपी कुहरा (अज्ञान) शान्त हो गया है; अतः इस समय तुमलोग इनसे बातचीत न करो। जैसे भूतलपर रात्रिके अन्धकार एवं निद्रा आदिके शान्त होनेपर दिनमें सूर्यकी किरणोंका समुदाय प्राप्त होता है, उसी प्रकार इनका अज्ञानयुक्त भ्रम दूर हो जानेपर अब इन्हें अपना ही प्रकाश प्राप्त हुआ है। समय आनेपर ये स्वयं ही इस समाधिसे जाग उठेंगे। दानवनायको ! तुम सब लोग अपने स्वामीके कार्य करो। ये राजा बलि एक सहस्र वर्षपर समाधिसे उठेंगे।

गुरुदेवके ऐसा कहनेपर दैत्योंने हर्ष, अमर्ष और दुःखसे उत्पन्न हुई चिन्ताको त्याग दिया तथा पहलेकी व्यवस्थाके अनुसार बलिकी राज्य-सभाका सुदृढ संगठन करके वे सभी असुर यथाधिकार अपने-अपने कार्यमें संलग्न हो गये। तत्पश्चात् पन्नग भूतलको, नागराज रसातलको, ग्रह अन्तरिक्षको, देववृन्द स्वर्गको, पर्वत और दिक्पाल अपनी-अपनी दिशाओंको, वनचर जीव अपनी कन्दराओंको और आकाशचारी प्राणी आकाशको चले गये !

(सर्ग २७-२८)


कल्याण


[चित्र: दोनो लीलाओके साथ राजा पद्मका राज्याभिषेक]


दोनो लीलाओके साथ राजा पद्मका राज्याभिषेक
(उत्पत्ति-प्रकरण सर्ग ५९)

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उपशम-प्रकरण ] * समाधिसे जगे हुए बलिक विचारपूर्वक समभावसे स्थित होना * २८१


समाधिसे जगे हुए बलिक विचारपूर्वक समभावसे स्थित होना, श्रीहरिका उन्हें त्रिलोकीके राज्यसे हटाकर पातालका ही राजा बनाना, उस अवस्थामें भी उनकी समतापूर्ण स्थिति तथा श्रीरामके चिन्मय स्वरूपका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर एक सहस्र दिव्य वर्ष व्यतीत होनेपर ऐश्वर्यशाली असुरराज बलि देव-दुन्दुभियोंका तुमुलनाद सुनकर समाधिसे जागे और इस प्रकार विचार करने लगे—'न बन्धन है न मोक्ष है । मेरी मूर्खता ( अज्ञान ) का नाश हो गया । ध्यानके लीला-विलाससे मेरा क्या होगा अथवा ध्यान न करनेसे भी कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा ? न मैं ध्यानकी इच्छा करता हूँ और न ध्यान न करनेकी; न भोग चाहता हूँ न भोगोंका अभाव; मैं चिन्तारहित होकर समभावसे ही स्थित हूँ । यह जगत्का राज्य रहे, तो भी मैं यहाँ स्थिर-भावसे स्थित हूँ । अथवा यहाँ यह जगत्का राज्य न रहे, तो भी मैं शान्तस्वरूप हो परमात्मामें स्थित हूँ । ध्यान-दृष्टिसे मेरा क्या काम है ? राज्य-वैभवकी सम्पत्तिसे भी मेरा क्या प्रयोजन है ? जो आता है, वह आये । न वह मैं हूँ न कहीं कुछ मेरा है । यदि आवश्यकताकी दृष्टिसे इस समय मेरा कुछ भी कर्तव्य नहीं है तो अकर्तव्य भी कुछ नहीं है । अतः यह जो कुछ प्रस्तुत कर्म—राज्यपालन आदि है, इसे मैं क्यों न करूँ ?'

ऐसा विचार करके बलि वासनारहित मनसे वहाँ समस्त राज्यकार्य करने लगे । उन्होंने पूजनके अर्घ्य-पाद्य आदि उपचारोंद्वारा देवताओं, ब्राह्मणों और गुरुजनोंकी पूजा की तथा सुहृदों, बन्धु-बान्धवों, सामन्तों और सत्पुरुषोंका दान-मान आदिके द्वारा सत्कार किया । इतना ही नहीं, उन्होंने सेवकों और याचकोंको धन-धान्यसे परिपूर्ण कर दिया । इस प्रकार उस राज्यमें, जहाँ सबपर समानरूपसे शासन किया जाता था, राजा बलि दिनों-दिन बढ़ने लगे । किसी समय उनके मनमें यज्ञ करनेका विचार

हुआ, तब वे शुक्राचार्य आदि मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंके साथ महायज्ञ अश्वमेधका अनुष्ठान करने लगे । उस यज्ञमें समस्त भुवनोंके प्राणियोंको तृप्त किया गया । देवर्षियोंके समुदायने उस यज्ञकी भूरि-भूरि प्रशंसा की । राजा बलिको भोगसमूहोंकी अभिलाषा नहीं है—ऐसा निश्चय करके सिद्धिदाता भगवान् लक्ष्मीपति विष्णु बलिके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धिके लिये उस यज्ञमें पधारे । कार्यके तत्त्वोंको जाननेवाले श्रीहरि एकमात्र भोगोंमें आसक्त होनेके कारण कृपण एवं शोचनीय देवराज इन्द्रको, जो ( उनके बड़े भाई होनेके नाते ) अवस्थामें ज्येष्ठ थे, इस जगतरूपी जंगलका भाग देनेके लिये यहाँ आये थे । उन्होंने बलपूर्वक पैर बढ़ाकर तीनों लोकोंको नाप लिया और बलिको वैभव भोगसे वञ्चित करके उन्हें

२८२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

पातालतलमें ही बाँध दिया अर्थात् उन्हें पाताललोकके ही राज्यका अधिकारी बना दिया । श्रीराम ! अब वे जीवन्मुक्त और अपने ब्रह्मस्वरूप आत्मामें स्थित हो मनको सदा परमात्मचिन्तनमें लगाये रखकर पुनः भावी इन्द्रपद-की प्राप्तिके हेतु पातालमें ही विराजमान हैं। पातालरूपी गर्तमें रहकर जीवन्मुक्तस्वरूप बलि आपत्ति और सम्पत्ति-को समान दृष्टिसे ही देखते हैं। उनका सारा मनोरथ पूर्ण हो चुका है। वे भोगोंकी अभिलाषा छोड़कर नित्य अपने आत्मामें ही रमण करते हुए पातालमें प्रतिष्ठित हैं। श्रीराम ! ये बलि पुनः इन्द्रपदपर विराजमान हो बहुत वर्षोंतक इस सम्पूर्ण जगत्‌पर शासन करेंगे। भविष्यमें होनेवाली इन्द्रपदकी प्राप्ति ( की आशा ) से न तो उन्हें हर्ष होता है और न अपने त्रिलोकीके राज्यपदसे भ्रष्ट कर दिये जानेके कारण उनके मनमें उद्वेग ही होता है। वे सभी भावोंमें सम तथा सदा ही संतुष्ट-चित्त रहकर प्राप्त भोगोंका अनासक्त-भावसे सेवन करते हुए आकाशके समान अपने ब्रह्मस्वरूप आत्मामें नित्य स्थित हैं।

असुरराज बलि लगातार दस करोड़ वर्षोंतक तीनों लोकोंका राज्य करके अन्तमें उससे विरक्त हो गये। अतः भोगसमूहोंमें अवश्य वैरस्य (रसका अभाव एवं दुःखका बाहुल्य) है। श्रीराम ! सूर्यके समान सबको प्रकाशित करनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप तुम्हीं सम्पूर्ण जगत्में स्थित हो । तुम्हारे लिये कौन अपना है और कौन पराया ? महाबाहो ! तुम अनन्त हो, आदि पुरुषोत्तम हो । तुम्हारा शरीर चिन्मय है। सैकड़ों पदार्थों-के रूपमें तुम्हीं चेष्टा कर रहे हो । जैसे सूतमें मणियाँ पिरोयी होती हैं, उसी प्रकार नित्य प्रकाशमान, शुद्ध-बुद्धस्वरूप तुममें यह सारा चराचर जगत् पिरोया हुआ है। तुम्हारा न जन्म होता है न मृत्यु । तुम अजन्मा हो, अन्तर्यामी और विराट् पुरुष हो । शुद्ध चैतन्य ही तुम्हारा स्वरूप है । तुम इस जगत्‌के स्वामी और नित्य प्रकाशित होनेवाले चिन्मय सूर्यरूपसे स्थित हो । तुममें ही यह स्वप्न-तुल्य सारा संसार भासित होता है ।* मनुष्यको उचित है कि बालकके समान यह मन जिन-जिन स्थानोंमें आसक्त होता है, वहाँ-वहाँसे उसे हटाकर परम तत्त्वस्वरूप परमात्मामें लगाये। इस प्रकार अभ्यासको प्राप्त हुए मनरूपी मतवाले हाथीको सर्वतोभावेन बाँधकर मनुष्य परम-कल्याणका भागी होता है । जबतक मनुष्य


* चिदादित्यो भवानेव सर्वत्र जगति स्थितः ।
कः परस्ते क आत्मीयः परिस्खलसि किं मुधा ॥
त्वमनन्तो महाबाहो त्वमाद्यः पुरुषोत्तम ।
त्वं पदार्थशताकारैः परिस्फूर्जसि चिद्वपुः ॥
त्वयि सर्वमिदं प्रोतं जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
बोधे नित्योदिते शुद्धे सूत्रे मणिगणा यथा ॥
न जायसे न म्रियसे त्वमजः पुरुषो विराट् ।
चिच्छुद्धा जन्ममरणभ्रान्तयो मा भवन्तु ते ॥
✕ ✕ ✕
त्वयि स्थिते जगन्नाथे चिदादित्ये सदोदिते ।
इदमाभासते सर्वं संसारस्वप्नमण्डलम् ॥
( उपशम० २९ । ४५—४८, ५० )

उपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादका उपाख्यान--भगवान् नृसिंहकी क्रोधाग्निसे दैत्योंका संहार * २८३


आत्मसाक्षात्कारके लिये परम पुरुषार्थ करके स्वयं अपने ऊपर अनुग्रह नहीं करता, तबतक विवेक-विचारका उदय नहीं होता। जबतक अपने आपका यथार्थरूपसे अनुभव नहीं होता, तबतक वेदों और वेदान्तशास्त्रके अर्थोंसे तथा तार्किक दृष्टियोंसे भी इस आत्माका प्राकट्य नहीं होता । ( सर्ग २९ )


प्रह्लादका उपाख्यान—भगवान् नृसिंहकी क्रोधाग्निसे हिरण्यकशिपु आदि दैत्योंका संहार तथा प्रह्लादका विचारद्वारा अपने आपको भगवान् विष्णुसे अभिन्न अनुभव करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे दैत्यराज प्रह्लाद अपने-आप सिद्ध हो गये थे, ज्ञानप्राप्तिके उस उत्तम क्रमका मैं वर्णन करता हूँ; सुनो । पाताललोकमें हिरण्यकशिपु नामसे प्रसिद्ध एक दैत्य था, जिसका पराक्रम भगवान् नारायणके समान था । उसने युद्धभूमिमें देवताओं और असुरोंको भी मार भगाया था । उसने समस्त भुवनोंपर आक्रमण किया और इन्द्रके हाथसे त्रिलोकीका राज्य छीन लिया । वह देवताओं और असुरोंको परास्त करके तीनों लोकोंका राज्य करने लगा । त्रिभुवनके साम्राज्यपर शासन करते हुए उस असुरराजने यथासमय बहुत-से पुत्र उत्पन्न किये । जैसे बहुमूल्य मणियोंमें कौस्तुभ प्रधान है, उसी प्रकार उन सभी पुत्रोंमें प्रह्लादनामक बलवान् पुत्र प्रधान हुआ । इससे हिरण्यकशिपुका गर्व और भी बढ़ गया । उसका आक्रमणजनित ताप उत्तरोत्तर बढ़कर तीनों लोकोंको उसी तरह तपाने लगा, जैसे प्रलयकालके बारह सूर्य अपनी किरणोंकी नूतन प्रभासे समस्त भुवनोंको संतप्त कर देते हैं । उसके आक्रमणसे सूर्य और चन्द्र आदि देवता खिन्न हो उठे । उन सबने ब्रह्माजीसे उस दैत्यराजके वधके लिये प्रार्थना की । क्यों न हो, किसीके बारंबार किये जानेवाले दुष्कर्म या अपराधको महापुरुष भी सहन नहीं कर सकते । तदनन्तर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने नृसिंह रूप धारण करके जोर-जोरसे दहाड़ते हुए उस महान् असुरको उसी प्रकार मार डाला, जैसे हाथी कट्कट् शब्दके साथ घोड़ेको मार डालता है । भगवान् नृसिंहके नख दिग्गजोंके दाँतोंके समान सुदृढ और वज्र आदिके समान भयंकर थे । उनकी चमकीली दन्तपङ्क्ति सुस्थिर विद्युल्लताके समान शोभा पा रही थी । उनका क्रोध तीनों लोकोंको दग्ध करनेके लिये प्रज्वलित हुई प्रलयाग्निके समान जान पड़ता था । उनके सम्पूर्ण अङ्गोंसे पट्टिश, प्रास, तोमर आदि नाना प्रकारके आयुध निकल रहे थे। जैसे प्रलयकालमें अग्निकी ज्वाला समस्त जगज्जालको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार भगवान् नृसिंहके नेत्रोंसे प्रकट हुई आगने उस असुरपुरीके समस्त असुरोंको दग्ध कर दिया । संवर्तक नामक प्रलयकर मेघोंकी गर्जनायुक्त धारावाहिक वृष्टिसे सर्वत्र व्याप्त हुए एकार्णवमें विक्षुब्ध हुई वायुके समान जब भगवान् नृसिंह अत्यन्त क्षोभसे भर गये, तब समस्त दानवोंके समुदाय दिशाओंमें जलते हुए मच्छरोंके समान भाग-भागकर अदृश्य हो गये । भगवान् नृसिंह हिरण्यकशिपुका वध करके आश्वस्त हुए देवताओं द्वारा बड़े आदरके साथ पूजित हो जब धीरेसे कहीं चले गये, तब मरनेसे बचे हुए दानव प्रह्लादसे सुरक्षित हो अपने उस जले हुए देशमें लौट गये । वहाँ अपने बन्धु-बान्धवोंके नाशका विचार करके समयोचित विलाप करनेके अनन्तर उन सबने परलोकवासी बन्धुओंका और्ध्वदैहिक संस्कार एवं श्राद्ध किया । तदनन्तर जिनके बन्धु-बान्धव मारे अथवा भगवान् नृसिंहकी क्रोधाग्निसे जल गये थे, मरनेसे बचे हुए उन आत्मीय जनोंको उन सबने धीरे-धीरे आश्वासन दिया ।

भगवान् नृसिंहने जहाँके दानवोंका विनाश कर डाला था, उस पाताल-गर्तमें रहनेवाले मननशील प्रह्लादने मन-ही-मन अत्यन्त दुखी हो विवेकपूर्वक विचार किया—'इस संसारमें सब प्रकारसे, सब तरहकी पवित्र बुद्धियोंसे और

२८४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

समस्त उत्तम क्रियाओं द्वारा तीव्रतापूर्वक शरण लेने योग्य एकमात्र भगवान् श्रीहरि ही हैं। उनके सिवा यहाँ दूसरी कोई गति नहीं है। तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर कोई नहीं है। सृष्टि, पालन और संहारके एकमात्र कारण श्रीहरि ही हैं। अब इसी क्षणसे सदाके लिये मैं अजन्मा भगवान् नारायणकी शरणमें आया हूँ। जैसे वायु आकाशसे अलग नहीं होती, उसी प्रकार सम्पूर्ण मनोरथोंका साधक 'नमो नारायणाय' यह मन्त्र मेरे हृदयकोशसे दूर नहीं होता। श्रीहरि ही दिशा हैं, हरि ही आकाश हैं; वे ही पृथ्वी हैं और वे ही जगत् हैं; अतः मैं भी अप्रमेयात्मा श्रीहरि ही हूँ। मैं विष्णुरूप हो गया हूँ। श्रीहरि ही प्रह्लाद नामसे प्रकट हैं। मुझ आत्मासे श्रीहरि भिन्न नहीं हैं, मेरे अन्त.करणमें यह दृढ़ निश्चय हो गया है; अतएव मैं सर्वव्यापी हरि ही हूँ। जिनकी हाथरूपी शाखाओंपर चक्र, गदा और खड्ग आदि अस्त्ररूपी पक्षी सदा विश्राम करते हैं, जो नख-किरणमयी मञ्जरियोंसे व्याप्त हैं, जिनके कंधे कोमल-कोमल मन्दारपुष्पकी मालाओंसे अलंकृत हैं, वे महान् मरकत-मणिमय वृक्षोंके समान ये मेरी चार भुजाएँ सुशोभित हो रही हैं, जिनके बाजूबंद समुद्र-मन्थनके समय मन्दराचलकी रगड़से घिस गये थे। ये सदा क्रमशः शीतल तथा उष्ण रहनेवाले दो देवता चन्द्रमा और सूर्य, जिन्होंने संसारको प्रकाशित किया है, मेरे मुखमण्डलके दो नेत्र हैं, नील कमलके समान श्याम तथा गहरी मेघमालाओंके समान सुन्दर मेरी यह अङ्गकान्ति सब ओर फैल रही है। मेरे हाथमें यह पाञ्चजन्य शङ्ख है, जिससे गम्भीर ध्वनिका विस्तार होता है। यह शब्दस्वरूप होनेके कारण मूर्तिमान् आकाश और श्वेत होनेसे क्षीरसागरके समान जान पड़ता है। मेरे करतलमें यह शोभाशाली कमल विद्यमान है, जो मेरी ही नाभिसे उत्पन्न हुआ है। यह दैत्यों और दानवोंका मर्दन करनेवाली मेरी भारी गदा है, जो रत्नजटित होनेसे चितकबरी और सोनेके अङ्गद (वलय) से विभूषित होनेके कारण सुमेरु पर्वतके शिखर-सी प्रतीत होती है। यह मेरा सुदर्शन चक्र है, जिससे सब ओर किरणें छिटक रही हैं तथा जिसकी आकृति साक्षात् सूर्यके समान दिखायी देती है। यह धूमयुक्त अग्निके समान सुन्दर मेरा काला और चमकीला नन्दक नामक खड्ग है, जो दैत्यरूपी वृक्षोंका उच्छेद करनेके लिये कुठार है और देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाला है। यह इन्द्रधनुषके समान सुन्दर और नागराज वासुकिके समान कुण्डलाकार मेरा शार्ङ्गधनुष है, जो पुष्पक और आवर्तक नामक मेघोंके समान बाणरूपी जलकी अविच्छिन्न धाराएँ बरसाता है। पृथ्वी ये मेरे दोनों पैर हैं, आकाश मेरा यह सिर है, तीनों लोक मेरे शरीर हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ मेरी कुक्षि हैं। मैं नील मेघके भीतरी भागकी भाँति श्यामकान्तिसे सुशोभित, गरुड़रूपी पर्वतपर आरूढ एवं शङ्ख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाला साक्षात् विष्णु हूँ। मेरे सामने खड़े हुए ये देवता और असुर मेरे तेजके प्रवाहको उसी तरह नहीं सह सकते जैसे मन्द दृष्टिवाले लोग सूर्यकी प्रभाको नहीं सहन कर पाते। ये ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि और रुद्र आदि देवता बहुसंख्यक मुखोंसे निकली हुई अनन्त वाणीद्वारा मुझ सर्वेश्वर विष्णुकी ही स्तुति करते हैं। मेरा ऐश्वर्य बहुत बढ़ा हुआ है। मैं अपराजित विष्णुरूप हो गया हूँ, सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे ऊपर उठकर अपनी सर्वोत्कृष्ट महिमासे सम्पन्न हूँ।

(सर्ग ३०-३१)

उपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्य पूजा * २८५

प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्य पूजा, उसके प्रभावसे समस्त दैत्योंको वैष्णव हुआ देख विस्मयमें पड़े हुए देवताओंका भगवान्‌से इसके विषयमें पूछना, भगवान्‌का देवताओंको सान्त्वना दे अदृश्य हो प्रह्लादके देवपूजा-गृहमें प्रकट होना और प्रह्लादद्वारा उनकी स्तुति

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार विचार करके भावनाद्वारा अपने शरीरको साक्षात् नारायण-का स्वरूप बनाकर प्रह्लादने उन असुरारि श्रीहरिकी पूजाके लिये फिर इस प्रकार चिन्तन आरम्भ किया—'मैं भावना-दृष्टिसे देख रहा हूँ कि ये भगवान् विष्णु दूसरा शरीर धारण करके मेरे भीतरसे बाहर आकर खड़े हैं, गरुड़की पीठपर बैठे हैं, चतुर्विध शक्तियोंसे सम्पन्न हैं। इनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा आदि शोभा पा रहे हैं। भगवान्‌के श्रीअङ्ग सुन्दर श्याम कान्तिसे सुशोभित हैं। इनके चार भुजाएँ हैं। चन्द्रमा और सूर्य ही इनके नेत्र हैं। ये अद्भुत शोभासे सम्पन्न हैं। कान्तिमान् नन्दक नामक खड्गसे अपने भक्तजनोंको आनन्द प्रदान करते हैं। इनके हाथमें कमल शोभा दे रहा है। नेत्र । दे रहे हैं। ये शार्ङ्गधनुष धारण करते हैं और महान् तेजसे सम्पन्न हैं। इनके पार्षद इन्हें सब ओरसे घेरे हुए हैं। इसलिये मैं शीघ्र ही भावनाभावित समस्त सामग्रियों-से सुशोभित मानसिक पूजाद्वारा इनका पूजन आरम्भ करता हूँ। इसके बाद बाहरी उपकरणोंसे युक्त और अनेक प्रकार-के रत्नोंसे परिपूर्ण विशाल पूजाका भी आयोजन करके इन महान् देव नारायणकी पूजा-अर्चा करूँगा।'

ऐसा विचारकर प्रह्लादने विविध पूजा-सामग्रियोंके सम्भारसे युक्त मनके द्वारा कमलापति माधवका पूजन आरम्भ किया। रत्नसमूहोंसे जटित नाना प्रकारके पात्रों-द्वारा अभिषेक करके भगवान्‌के श्रीअङ्गोंमें उन्होंने चन्दन आदिका अनुलेप किया। फिर नाना प्रकारके धूप-दीप निवेदन किये, भाँति-भाँतिके वैभवशाली आभूषण पहनाये, मन्दार-पुष्पोंकी मालाएँ धारण करायीं, सुवर्णमय कमलोंकी राशि भेंट की, कल्पवृक्षकी लताओं तथा रत्नोंके गुच्छ (गुलदस्ते) अर्पित किये, दिव्य वृक्षोंके पल्लव तथा नाना प्रकारके फूलोंके हार उपहारमें दिये, किंकिरात, बक, कुन्द, चम्पा, नीलकमल, लालकमल, कुमुद, काश, खजूर, आम, पलाश, अशोक, मैनफल, वेठ, कनेर, किरातक, कदम्ब, बकुल, नीम, सिन्दुवार, जूही, पारिभद्र, गुग्गुल और बिन्दुक आदिके यथायोग्य पत्र-पुष्प एवं फल अर्पित किये। प्रियङ्गु, पाट, पाटल धातुपाटल, आम, अमड़ा, गव्य, हरें और बहेड़े भेंट किये। शाल, ताल और तमालके लता, फूल एवं पल्लव चढ़ाये, कोमल-कोमल कलिकाएँ अर्पित कीं, सहकार, कुङ्कुम, केतक, शतपत्र और इलायचीकी मञ्जरियाँ अर्पित कीं। फिर नैवेद्य, ताम्बूल, आरती और पुष्पाञ्जलि आदि सभी सुन्दर-सुन्दर उपचारोंको सादर समर्पित किया। अन्तमें अपने आपको श्रीहरिके चरणोंमें भेंट कर दिया। इस प्रकार जगत्‌के सारे वैभवोंसे भव्य प्रतीत होनेवाली पूजन-सामग्री एवं उच्चकोटिकी भक्तिसे प्रह्लादने अन्तःपुरमें अपने स्वामी भगवान् विष्णुका मानसिक पूजन किया।

२८६* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तदनन्तर दानवराज प्रह्लादने सुप्रसिद्ध देवमन्दिरमें बाह्य वैभवोंसे परिपूर्ण पूजनके उपचारोंद्वारा भगवान् जनार्दनकी पूजा की। मानस-पूजनमें बताये गये क्रमसे ही बाह्य पदार्थोंके अर्पणद्वारा बारंबार परमेश्वर श्रीहरिका पूजन करके दानवराज प्रह्लादको बड़ा संतोष हुआ। तभीसे प्रह्लाद प्रतिदिन पूर्ण भक्तिभावसे परमेश्वरकी पूजा करने लगे। फिर तो उस नगरके सभी दैत्य उसी दिनसे भव्य वैष्णव बन गये; क्योंकि राजा ही आचारका कारण होता है। (सजा सदाचारी हो तो प्रजा भी सदाचारपरायण होती है।) शत्रुसूदन श्रीराम ! फिर तो आकाशवर्ती देवलोकमें यह बात फैल गयी कि सारे दैत्य द्वेष छोड़कर भगवान् विष्णुके भक्त हो गये हैं। रघुनन्दन ! यह सुनकर इन्द्र आदि देवता और मरुद्गण बड़े विस्मित हुए कि दैत्योंने भगवान् विष्णुकी भक्ति कैसे अपनायी। आश्चर्यमें डूबे हुए देवता अन्तरिक्षवर्ती स्वर्गलोकको छोड़कर क्षीरसागरमें शेषनागकी शय्यापर विराजमान भगवान् श्रीहरिके पास गये । वहाँ बैठे हुए भगवान्‌से उन्होंने दैत्योंका सारा समाचार कह सुनाया और इस अपूर्व आश्चर्य तथा विस्मयसे भरे हुए स्वभाव-परिवर्तनका कारण पूछा।

देवता बोले—भगवन् ! यह क्या बात है ? जो दैत्य सदा ही आपके विरोधी रहे, वे ही आपकी भक्तिमें कैसे तन्मय हो गये ? कहाँ तो वे अत्यन्त दुराचारी दानव और कहाँ आप भगवान् जनार्दनके प्रति उत्तम भक्ति। कहाँ तो पामरोचित कार्य करनेवाला, सदा निन्दित कर्मोंमें निरत और हीन जातिवाला बेचारा दानव-समाज और कहाँ आप भगवान् विष्णुकी उत्तम भक्ति।

श्रीभगवान् बोले—देवताओ ! तुम विषादमें न पड़ो। शत्रुदमन प्रह्लाद भक्तिमान् हो गये हैं। यह उनका अन्तिम जन्म है। अब वे मोक्षके अधिकारी हो गये हैं। इसके बाद ये दानव प्रह्लाद गर्भवास नहीं कर सकते। जैसे भूना हुआ बीज अङ्कुर नहीं उत्पन्न कर सकता, उसी प्रकार ज्ञानाग्निसे दग्ध हुए कर्म बन्धन-कारक नहीं हो सकते। श्रेष्ठ देवगण ! तुमलोग अपने-अपने विचित्र लोकोंमें पधारो। प्रह्लादकी यह गुणवत्ता (उनकी यह भगवद्भक्ति) तुम्हें दुःख देनेवाली नहीं हो सकती।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देवताओंसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये और देवताओंका समुदाय स्वर्गलोकको लौट गया। तबसे प्रह्लादके प्रति देवताओंकी मित्रता हो गयी । भक्त प्रह्लाद इसी प्रकार प्रतिदिन मन, वाणी और क्रियाद्वारा देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी पूजा करने लगे। पूजामें तत्पर रहनेवाले प्रह्लादके हृदयमें समय पाकर विवेक, आनन्द, वैराग्य और विभूति आदि गुण बढ़ने लगे। जैसे पक्षी सूखे हुए वृक्षको पसंद नहीं करते, उसी प्रकार प्रह्लादने भोग-समूहोंका अभिनन्दन नहीं किया—भोगोंकी ओरसे उनकी रुचि हट गयी। जैसे मृग जनसमुदायसे भरी हुई भूमिमें प्रसन्न नहीं होता, उसी

उपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्य पूजा * २८७


प्रकार उनका मन कान्ताओंमें नहीं रमता था, शास्त्रीय बातोंकी चर्चाके सिवा अन्य लोकचर्चाओंमें उनका मन नहीं लगता था। नाशवान् दृश्य पदार्थोंसे उनकी आसक्ति सर्वथा दूर हो गयी थी। भगवान् विष्णुने क्षीरसागर-रूपी मन्दिरमें रहते हुए ही अपनी सर्वव्यापिनी परम दिव्य बुद्धिके द्वारा प्रह्लादकी उस उच्चतम स्थितिको जान लिया। तदनन्तर भक्तोंको आह्लाद प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णु पाताल-मार्गसे प्रह्लादके उस भवनमें पधारे, जिसमें वे अपने इष्टदेवकी पूजा किया करते थे। कमलनयन भगवान् विष्णुको आया हुआ जानकर दैत्यराज प्रह्लादने पहलेकी अपेक्षा दुगुनी वैभवशालिनी सामग्रीसे सुशोभित पूजा-विधिद्वारा उनका आदर-सत्कारपूर्वक पूजन किया। तत्पश्चात् पूजागृहमें पधारे हुए भगवान्

श्रीहरिको प्रत्यक्ष विराजमान देख परम प्रीतियुक्त हुए प्रह्लादने भक्तिभावसे परिपुष्ट हुई वाणीद्वारा उनका स्तवन आरम्भ किया।

प्रह्लाद बोले—जो त्रिभुवनरूपी रत्नको सुरक्षित रखनेके लिये मनोहर कोषागार हैं, उपासकोंके सारे पापोंको हर लेनेवाले हैं, अज्ञानान्धकारसे परे परम प्रकाश-स्वरूप हैं, अशरणको शरण देनेवाले तथा शरणागत-पालक हैं, उन अजन्मा, अच्युत, परमेश्वर श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ।

जो प्रफुल्ल नील कमलदल तथा नील मणिके समान श्याम सुन्दर कान्तिसे सुशोभित हैं, जिनके श्याम विग्रहके लिये शरद् ऋतुके निर्मल आकाशके मध्यभागसे उपमा दी जाती है, भ्रमर, अन्धकार, काजल और अञ्जनके समान नील आभासे जिनके श्रीअङ्ग प्रकाशित होते हैं तथा जो अपने हाथोंमें कमल, चक्र एवं गदा धारण करते हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

जो परम निर्मल हैं, जिनके कोमल अङ्ग अलिकलाप (भ्रमर-राशि)-के समान श्याम हैं, जिनके हाथमें श्वेत दलवाले अधखिले कमलके समान शङ्ख शोभा पाता है, जिनके नाभि-कमलमें वेदमन्त्रोंकी ध्वनिरूप गुञ्जारवसे युक्त ब्रह्मारूपी भ्रमर विराजमान हैं तथा जो अपने भक्तजनोंके हृदय-कमल-दलमें निवास करते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ।

भगवान्के श्वेत नख-समूह जहाँ तारोंके समान छिटके हुए हैं, जहाँ मधुर मुस्कानकी ज्योत्स्नासे उज्ज्वल मुखरूपी पूर्ण चन्द्रमण्डलका प्रकाश छा रहा है तथा हृदयस्थित कौस्तुभ मणिकी किरणोंका समूह जहाँ आकाश-गङ्गाकी छटा छिटका रहा है, उन सर्व-व्यापी श्रीहरिरूपी शरत्कालिक निर्मल आकाशकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

प्रलयकालमें अक्षयवटके पत्रपर शयन करनेवाले शिशुरूप बालमुकुन्दकी मैं शरण लेता हूँ। बालरूप होनेपर भी उनका अनन्त कल्याणमय दिव्य गुणगणोंसे सुशोभित शरीर बहुत पुराना (वृद्ध) है। उनके

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उस बालवपुके उदरभागमें यह घनीभूत सारी सृष्टि पूर्णतया समायी हुई है। वे भगवान् नित्य निरन्तर विराजमान, जन्म-वृद्धि आदि विकारोंसे रहित तथा विशाल (सर्वत्र व्यापक) हैं।

नूतन खिले हुए नाभि-कमलके परागसे जिनका वक्षःस्थल गौरवर्णका प्रतीत होता है, जिनका वामाङ्ग लक्ष्मीजीके दीप्तिमान् देहसे विभूषित है, जो सायंकालिक अरुण किरणके समान लाल अङ्गराग धारण करते हैं तथा सुवर्णके समान रंगवाले रेशमी पीताम्बरसे जिनका श्रीविग्रह परम सुन्दर दिखायी देता है, उन भगवान् श्रीनारायणकी मैं शरण लेता हूँ।

दैत्यरूपिणी कमलिनीपर तुषारपात करनेके लिये जो हेमन्त और शिशिरके समान हैं, देवरूपिणी नलिनीको विकसित करनेके लिये सदा उदित रहनेवाले सूर्यबिम्बके सदृश हैं तथा ब्रह्मारूपी कमलके उद्भवके लिये जो जलसे भरे हुए तड़ागके तुल्य हैं, उपासकोंके हृदय-कमलमें निवास करनेवाले उन भगवान् श्रीहरिका मैं आश्रय लेता हूँ।

जो त्रिभुवनरूपी कमलके विकासके लिये सूर्यके सदृश हैं, अन्धकारकी भाँति बुद्धिको आच्छादित करनेवाले मोह या अज्ञानका निवारण करनेके लिये उत्तम एवं प्रज्वलित दीपकके तुल्य हैं, जिनमें जड़तारूपिणी मायाका अभाव है, जो सदा अपने स्वरूपको प्रकाशित करते हैं अथवा नित्य दिव्य प्रकाश जिनका रूप है, उन चिन्मय आत्मतत्त्वस्वरूप तथा सम्पूर्ण जगत्‌की सारी पीड़ाओंको हर लेनेवाले श्रीहरिकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार बहुत-सी गुणवाग्रियोंसे युक्त स्तुति-ऋचाओंद्वारा पूजित हुए असुर-विनाशक तथा नील कमलदलके समान श्याम भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होकर प्रीतियुक्त भक्त दैत्यराज प्रह्लादसे बोले। (सर्ग ३२-३३)


प्रह्लादको भगवान्द्वारा वर-प्राप्ति, प्रह्लादका आत्मचिन्तन करते हुए परमात्माका साक्षात्कार करना और उनका स्तवन करते हुए समाधिस्थ हो जाना, तत्पश्चात् पातालकी अराजकताका वर्णन और भगवान् विष्णुका प्रह्लादको समाधिसे विरत करनेका विचार

श्रीभगवान्‌ने कहा—दैत्यकुलशिरोमणि प्रह्लाद ! तुम तो गुणोंके आकर हो, अतः जन्म-मरणरूपी दुःखकी निवृत्तिके लिये तुम पुनः अपना अभीष्ट वर माँग लो।

प्रह्लाद बोले—भगवन् ! आप समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें विराजमान होकर उनके इच्छानुसार फल प्रदान करनेवाले हैं; अतः विभो ! आप जिस वस्तुको सबसे श्रेष्ठ समझते हों, वही मुझे देनेकी कृपा कीजिये।

श्रीभगवान्‌ने कहा—निष्पाप प्रह्लाद ! जबतक तुम्हें ब्रह्मतत्त्वकी प्राप्ति न हो जाय, तबतक तुम सम्पूर्ण संशयोंकी पूर्णतया शान्ति तथा सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप फलके लिये विचारपरायण बने रहो।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! दैत्यराज प्रह्लाद-से ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। उन विष्णुदेवके अन्तर्हित हो जानेपर प्रह्लादने पूजाके अन्तमें मणि-रत्नोंसे सुशोभित पुष्पाञ्जलि समर्पित की। उस समय उनका चित्त अत्यन्त प्रसन्न था। वे एक श्रेष्ठ आसनपर पद्मासन लगाकर बैठ गये और स्तोत्रपाठ