भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२८४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

समस्त उत्तम क्रियाओं द्वारा तीव्रतापूर्वक शरण लेने योग्य एकमात्र भगवान् श्रीहरि ही हैं। उनके सिवा यहाँ दूसरी कोई गति नहीं है। तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर कोई नहीं है। सृष्टि, पालन और संहारके एकमात्र कारण श्रीहरि ही हैं। अब इसी क्षणसे सदाके लिये मैं अजन्मा भगवान् नारायणकी शरणमें आया हूँ। जैसे वायु आकाशसे अलग नहीं होती, उसी प्रकार सम्पूर्ण मनोरथोंका साधक 'नमो नारायणाय' यह मन्त्र मेरे हृदयकोशसे दूर नहीं होता। श्रीहरि ही दिशा हैं, हरि ही आकाश हैं; वे ही पृथ्वी हैं और वे ही जगत् हैं; अतः मैं भी अप्रमेयात्मा श्रीहरि ही हूँ। मैं विष्णुरूप हो गया हूँ। श्रीहरि ही प्रह्लाद नामसे प्रकट हैं। मुझ आत्मासे श्रीहरि भिन्न नहीं हैं, मेरे अन्त.करणमें यह दृढ़ निश्चय हो गया है; अतएव मैं सर्वव्यापी हरि ही हूँ। जिनकी हाथरूपी शाखाओंपर चक्र, गदा और खड्ग आदि अस्त्ररूपी पक्षी सदा विश्राम करते हैं, जो नख-किरणमयी मञ्जरियोंसे व्याप्त हैं, जिनके कंधे कोमल-कोमल मन्दारपुष्पकी मालाओंसे अलंकृत हैं, वे महान् मरकत-मणिमय वृक्षोंके समान ये मेरी चार भुजाएँ सुशोभित हो रही हैं, जिनके बाजूबंद समुद्र-मन्थनके समय मन्दराचलकी रगड़से घिस गये थे। ये सदा क्रमशः शीतल तथा उष्ण रहनेवाले दो देवता चन्द्रमा और सूर्य, जिन्होंने संसारको प्रकाशित किया है, मेरे मुखमण्डलके दो नेत्र हैं, नील कमलके समान श्याम तथा गहरी मेघमालाओंके समान सुन्दर मेरी यह अङ्गकान्ति सब ओर फैल रही है। मेरे हाथमें यह पाञ्चजन्य शङ्ख है, जिससे गम्भीर ध्वनिका विस्तार होता है। यह शब्दस्वरूप होनेके कारण मूर्तिमान् आकाश और श्वेत होनेसे क्षीरसागरके समान जान पड़ता है। मेरे करतलमें यह शोभाशाली कमल विद्यमान है, जो मेरी ही नाभिसे उत्पन्न हुआ है। यह दैत्यों और दानवोंका मर्दन करनेवाली मेरी भारी गदा है, जो रत्नजटित होनेसे चितकबरी और सोनेके अङ्गद (वलय) से विभूषित होनेके कारण सुमेरु पर्वतके शिखर-सी प्रतीत होती है। यह मेरा सुदर्शन चक्र है, जिससे सब ओर किरणें छिटक रही हैं तथा जिसकी आकृति साक्षात् सूर्यके समान दिखायी देती है। यह धूमयुक्त अग्निके समान सुन्दर मेरा काला और चमकीला नन्दक नामक खड्ग है, जो दैत्यरूपी वृक्षोंका उच्छेद करनेके लिये कुठार है और देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाला है। यह इन्द्रधनुषके समान सुन्दर और नागराज वासुकिके समान कुण्डलाकार मेरा शार्ङ्गधनुष है, जो पुष्पक और आवर्तक नामक मेघोंके समान बाणरूपी जलकी अविच्छिन्न धाराएँ बरसाता है। पृथ्वी ये मेरे दोनों पैर हैं, आकाश मेरा यह सिर है, तीनों लोक मेरे शरीर हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ मेरी कुक्षि हैं। मैं नील मेघके भीतरी भागकी भाँति श्यामकान्तिसे सुशोभित, गरुड़रूपी पर्वतपर आरूढ एवं शङ्ख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाला साक्षात् विष्णु हूँ। मेरे सामने खड़े हुए ये देवता और असुर मेरे तेजके प्रवाहको उसी तरह नहीं सह सकते जैसे मन्द दृष्टिवाले लोग सूर्यकी प्रभाको नहीं सहन कर पाते। ये ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि और रुद्र आदि देवता बहुसंख्यक मुखोंसे निकली हुई अनन्त वाणीद्वारा मुझ सर्वेश्वर विष्णुकी ही स्तुति करते हैं। मेरा ऐश्वर्य बहुत बढ़ा हुआ है। मैं अपराजित विष्णुरूप हो गया हूँ, सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे ऊपर उठकर अपनी सर्वोत्कृष्ट महिमासे सम्पन्न हूँ।

(सर्ग ३०-३१)