संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 322, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादका उपाख्यान--भगवान् नृसिंहकी क्रोधाग्निसे दैत्योंका संहार * २८३
आत्मसाक्षात्कारके लिये परम पुरुषार्थ करके स्वयं अपने ऊपर अनुग्रह नहीं करता, तबतक विवेक-विचारका उदय नहीं होता। जबतक अपने आपका यथार्थरूपसे अनुभव नहीं होता, तबतक वेदों और वेदान्तशास्त्रके अर्थोंसे तथा तार्किक दृष्टियोंसे भी इस आत्माका प्राकट्य नहीं होता । ( सर्ग २९ )
प्रह्लादका उपाख्यान—भगवान् नृसिंहकी क्रोधाग्निसे हिरण्यकशिपु आदि दैत्योंका संहार तथा प्रह्लादका विचारद्वारा अपने आपको भगवान् विष्णुसे अभिन्न अनुभव करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे दैत्यराज प्रह्लाद अपने-आप सिद्ध हो गये थे, ज्ञानप्राप्तिके उस उत्तम क्रमका मैं वर्णन करता हूँ; सुनो । पाताललोकमें हिरण्यकशिपु नामसे प्रसिद्ध एक दैत्य था, जिसका पराक्रम भगवान् नारायणके समान था । उसने युद्धभूमिमें देवताओं और असुरोंको भी मार भगाया था । उसने समस्त भुवनोंपर आक्रमण किया और इन्द्रके हाथसे त्रिलोकीका राज्य छीन लिया । वह देवताओं और असुरोंको परास्त करके तीनों लोकोंका राज्य करने लगा । त्रिभुवनके साम्राज्यपर शासन करते हुए उस असुरराजने यथासमय बहुत-से पुत्र उत्पन्न किये । जैसे बहुमूल्य मणियोंमें कौस्तुभ प्रधान है, उसी प्रकार उन सभी पुत्रोंमें प्रह्लादनामक बलवान् पुत्र प्रधान हुआ । इससे हिरण्यकशिपुका गर्व और भी बढ़ गया । उसका आक्रमणजनित ताप उत्तरोत्तर बढ़कर तीनों लोकोंको उसी तरह तपाने लगा, जैसे प्रलयकालके बारह सूर्य अपनी किरणोंकी नूतन प्रभासे समस्त भुवनोंको संतप्त कर देते हैं । उसके आक्रमणसे सूर्य और चन्द्र आदि देवता खिन्न हो उठे । उन सबने ब्रह्माजीसे उस दैत्यराजके वधके लिये प्रार्थना की । क्यों न हो, किसीके बारंबार किये जानेवाले दुष्कर्म या अपराधको महापुरुष भी सहन नहीं कर सकते । तदनन्तर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने नृसिंह रूप धारण करके जोर-जोरसे दहाड़ते हुए उस महान् असुरको उसी प्रकार मार डाला, जैसे हाथी कट्कट् शब्दके साथ घोड़ेको मार डालता है । भगवान् नृसिंहके नख दिग्गजोंके दाँतोंके समान सुदृढ और वज्र आदिके समान भयंकर थे । उनकी चमकीली दन्तपङ्क्ति सुस्थिर विद्युल्लताके समान शोभा पा रही थी । उनका क्रोध तीनों लोकोंको दग्ध करनेके लिये प्रज्वलित हुई प्रलयाग्निके समान जान पड़ता था । उनके सम्पूर्ण अङ्गोंसे पट्टिश, प्रास, तोमर आदि नाना प्रकारके आयुध निकल रहे थे। जैसे प्रलयकालमें अग्निकी ज्वाला समस्त जगज्जालको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार भगवान् नृसिंहके नेत्रोंसे प्रकट हुई आगने उस असुरपुरीके समस्त असुरोंको दग्ध कर दिया । संवर्तक नामक प्रलयकर मेघोंकी गर्जनायुक्त धारावाहिक वृष्टिसे सर्वत्र व्याप्त हुए एकार्णवमें विक्षुब्ध हुई वायुके समान जब भगवान् नृसिंह अत्यन्त क्षोभसे भर गये, तब समस्त दानवोंके समुदाय दिशाओंमें जलते हुए मच्छरोंके समान भाग-भागकर अदृश्य हो गये । भगवान् नृसिंह हिरण्यकशिपुका वध करके आश्वस्त हुए देवताओं द्वारा बड़े आदरके साथ पूजित हो जब धीरेसे कहीं चले गये, तब मरनेसे बचे हुए दानव प्रह्लादसे सुरक्षित हो अपने उस जले हुए देशमें लौट गये । वहाँ अपने बन्धु-बान्धवोंके नाशका विचार करके समयोचित विलाप करनेके अनन्तर उन सबने परलोकवासी बन्धुओंका और्ध्वदैहिक संस्कार एवं श्राद्ध किया । तदनन्तर जिनके बन्धु-बान्धव मारे अथवा भगवान् नृसिंहकी क्रोधाग्निसे जल गये थे, मरनेसे बचे हुए उन आत्मीय जनोंको उन सबने धीरे-धीरे आश्वासन दिया ।
भगवान् नृसिंहने जहाँके दानवोंका विनाश कर डाला था, उस पाताल-गर्तमें रहनेवाले मननशील प्रह्लादने मन-ही-मन अत्यन्त दुखी हो विवेकपूर्वक विचार किया—'इस संसारमें सब प्रकारसे, सब तरहकी पवित्र बुद्धियोंसे और