भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२८२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

पातालतलमें ही बाँध दिया अर्थात् उन्हें पाताललोकके ही राज्यका अधिकारी बना दिया । श्रीराम ! अब वे जीवन्मुक्त और अपने ब्रह्मस्वरूप आत्मामें स्थित हो मनको सदा परमात्मचिन्तनमें लगाये रखकर पुनः भावी इन्द्रपद-की प्राप्तिके हेतु पातालमें ही विराजमान हैं। पातालरूपी गर्तमें रहकर जीवन्मुक्तस्वरूप बलि आपत्ति और सम्पत्ति-को समान दृष्टिसे ही देखते हैं। उनका सारा मनोरथ पूर्ण हो चुका है। वे भोगोंकी अभिलाषा छोड़कर नित्य अपने आत्मामें ही रमण करते हुए पातालमें प्रतिष्ठित हैं। श्रीराम ! ये बलि पुनः इन्द्रपदपर विराजमान हो बहुत वर्षोंतक इस सम्पूर्ण जगत्‌पर शासन करेंगे। भविष्यमें होनेवाली इन्द्रपदकी प्राप्ति ( की आशा ) से न तो उन्हें हर्ष होता है और न अपने त्रिलोकीके राज्यपदसे भ्रष्ट कर दिये जानेके कारण उनके मनमें उद्वेग ही होता है। वे सभी भावोंमें सम तथा सदा ही संतुष्ट-चित्त रहकर प्राप्त भोगोंका अनासक्त-भावसे सेवन करते हुए आकाशके समान अपने ब्रह्मस्वरूप आत्मामें नित्य स्थित हैं।

असुरराज बलि लगातार दस करोड़ वर्षोंतक तीनों लोकोंका राज्य करके अन्तमें उससे विरक्त हो गये। अतः भोगसमूहोंमें अवश्य वैरस्य (रसका अभाव एवं दुःखका बाहुल्य) है। श्रीराम ! सूर्यके समान सबको प्रकाशित करनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप तुम्हीं सम्पूर्ण जगत्में स्थित हो । तुम्हारे लिये कौन अपना है और कौन पराया ? महाबाहो ! तुम अनन्त हो, आदि पुरुषोत्तम हो । तुम्हारा शरीर चिन्मय है। सैकड़ों पदार्थों-के रूपमें तुम्हीं चेष्टा कर रहे हो । जैसे सूतमें मणियाँ पिरोयी होती हैं, उसी प्रकार नित्य प्रकाशमान, शुद्ध-बुद्धस्वरूप तुममें यह सारा चराचर जगत् पिरोया हुआ है। तुम्हारा न जन्म होता है न मृत्यु । तुम अजन्मा हो, अन्तर्यामी और विराट् पुरुष हो । शुद्ध चैतन्य ही तुम्हारा स्वरूप है । तुम इस जगत्‌के स्वामी और नित्य प्रकाशित होनेवाले चिन्मय सूर्यरूपसे स्थित हो । तुममें ही यह स्वप्न-तुल्य सारा संसार भासित होता है ।* मनुष्यको उचित है कि बालकके समान यह मन जिन-जिन स्थानोंमें आसक्त होता है, वहाँ-वहाँसे उसे हटाकर परम तत्त्वस्वरूप परमात्मामें लगाये। इस प्रकार अभ्यासको प्राप्त हुए मनरूपी मतवाले हाथीको सर्वतोभावेन बाँधकर मनुष्य परम-कल्याणका भागी होता है । जबतक मनुष्य


* चिदादित्यो भवानेव सर्वत्र जगति स्थितः ।
कः परस्ते क आत्मीयः परिस्खलसि किं मुधा ॥
त्वमनन्तो महाबाहो त्वमाद्यः पुरुषोत्तम ।
त्वं पदार्थशताकारैः परिस्फूर्जसि चिद्वपुः ॥
त्वयि सर्वमिदं प्रोतं जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
बोधे नित्योदिते शुद्धे सूत्रे मणिगणा यथा ॥
न जायसे न म्रियसे त्वमजः पुरुषो विराट् ।
चिच्छुद्धा जन्ममरणभ्रान्तयो मा भवन्तु ते ॥
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त्वयि स्थिते जगन्नाथे चिदादित्ये सदोदिते ।
इदमाभासते सर्वं संसारस्वप्नमण्डलम् ॥
( उपशम० २९ । ४५—४८, ५० )