भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * समाधिसे जगे हुए बलिक विचारपूर्वक समभावसे स्थित होना * २८१


समाधिसे जगे हुए बलिक विचारपूर्वक समभावसे स्थित होना, श्रीहरिका उन्हें त्रिलोकीके राज्यसे हटाकर पातालका ही राजा बनाना, उस अवस्थामें भी उनकी समतापूर्ण स्थिति तथा श्रीरामके चिन्मय स्वरूपका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर एक सहस्र दिव्य वर्ष व्यतीत होनेपर ऐश्वर्यशाली असुरराज बलि देव-दुन्दुभियोंका तुमुलनाद सुनकर समाधिसे जागे और इस प्रकार विचार करने लगे—'न बन्धन है न मोक्ष है । मेरी मूर्खता ( अज्ञान ) का नाश हो गया । ध्यानके लीला-विलाससे मेरा क्या होगा अथवा ध्यान न करनेसे भी कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा ? न मैं ध्यानकी इच्छा करता हूँ और न ध्यान न करनेकी; न भोग चाहता हूँ न भोगोंका अभाव; मैं चिन्तारहित होकर समभावसे ही स्थित हूँ । यह जगत्का राज्य रहे, तो भी मैं यहाँ स्थिर-भावसे स्थित हूँ । अथवा यहाँ यह जगत्का राज्य न रहे, तो भी मैं शान्तस्वरूप हो परमात्मामें स्थित हूँ । ध्यान-दृष्टिसे मेरा क्या काम है ? राज्य-वैभवकी सम्पत्तिसे भी मेरा क्या प्रयोजन है ? जो आता है, वह आये । न वह मैं हूँ न कहीं कुछ मेरा है । यदि आवश्यकताकी दृष्टिसे इस समय मेरा कुछ भी कर्तव्य नहीं है तो अकर्तव्य भी कुछ नहीं है । अतः यह जो कुछ प्रस्तुत कर्म—राज्यपालन आदि है, इसे मैं क्यों न करूँ ?'

ऐसा विचार करके बलि वासनारहित मनसे वहाँ समस्त राज्यकार्य करने लगे । उन्होंने पूजनके अर्घ्य-पाद्य आदि उपचारोंद्वारा देवताओं, ब्राह्मणों और गुरुजनोंकी पूजा की तथा सुहृदों, बन्धु-बान्धवों, सामन्तों और सत्पुरुषोंका दान-मान आदिके द्वारा सत्कार किया । इतना ही नहीं, उन्होंने सेवकों और याचकोंको धन-धान्यसे परिपूर्ण कर दिया । इस प्रकार उस राज्यमें, जहाँ सबपर समानरूपसे शासन किया जाता था, राजा बलि दिनों-दिन बढ़ने लगे । किसी समय उनके मनमें यज्ञ करनेका विचार

हुआ, तब वे शुक्राचार्य आदि मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंके साथ महायज्ञ अश्वमेधका अनुष्ठान करने लगे । उस यज्ञमें समस्त भुवनोंके प्राणियोंको तृप्त किया गया । देवर्षियोंके समुदायने उस यज्ञकी भूरि-भूरि प्रशंसा की । राजा बलिको भोगसमूहोंकी अभिलाषा नहीं है—ऐसा निश्चय करके सिद्धिदाता भगवान् लक्ष्मीपति विष्णु बलिके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धिके लिये उस यज्ञमें पधारे । कार्यके तत्त्वोंको जाननेवाले श्रीहरि एकमात्र भोगोंमें आसक्त होनेके कारण कृपण एवं शोचनीय देवराज इन्द्रको, जो ( उनके बड़े भाई होनेके नाते ) अवस्थामें ज्येष्ठ थे, इस जगतरूपी जंगलका भाग देनेके लिये यहाँ आये थे । उन्होंने बलपूर्वक पैर बढ़ाकर तीनों लोकोंको नाप लिया और बलिको वैभव भोगसे वञ्चित करके उन्हें