भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

उपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादका उपाख्यान--भगवान् नृसिंहकी क्रोधाग्निसे दैत्योंका संहार * २८३


आत्मसाक्षात्कारके लिये परम पुरुषार्थ करके स्वयं अपने ऊपर अनुग्रह नहीं करता, तबतक विवेक-विचारका उदय नहीं होता। जबतक अपने आपका यथार्थरूपसे अनुभव नहीं होता, तबतक वेदों और वेदान्तशास्त्रके अर्थोंसे तथा तार्किक दृष्टियोंसे भी इस आत्माका प्राकट्य नहीं होता । ( सर्ग २९ )


प्रह्लादका उपाख्यान—भगवान् नृसिंहकी क्रोधाग्निसे हिरण्यकशिपु आदि दैत्योंका संहार तथा प्रह्लादका विचारद्वारा अपने आपको भगवान् विष्णुसे अभिन्न अनुभव करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे दैत्यराज प्रह्लाद अपने-आप सिद्ध हो गये थे, ज्ञानप्राप्तिके उस उत्तम क्रमका मैं वर्णन करता हूँ; सुनो । पाताललोकमें हिरण्यकशिपु नामसे प्रसिद्ध एक दैत्य था, जिसका पराक्रम भगवान् नारायणके समान था । उसने युद्धभूमिमें देवताओं और असुरोंको भी मार भगाया था । उसने समस्त भुवनोंपर आक्रमण किया और इन्द्रके हाथसे त्रिलोकीका राज्य छीन लिया । वह देवताओं और असुरोंको परास्त करके तीनों लोकोंका राज्य करने लगा । त्रिभुवनके साम्राज्यपर शासन करते हुए उस असुरराजने यथासमय बहुत-से पुत्र उत्पन्न किये । जैसे बहुमूल्य मणियोंमें कौस्तुभ प्रधान है, उसी प्रकार उन सभी पुत्रोंमें प्रह्लादनामक बलवान् पुत्र प्रधान हुआ । इससे हिरण्यकशिपुका गर्व और भी बढ़ गया । उसका आक्रमणजनित ताप उत्तरोत्तर बढ़कर तीनों लोकोंको उसी तरह तपाने लगा, जैसे प्रलयकालके बारह सूर्य अपनी किरणोंकी नूतन प्रभासे समस्त भुवनोंको संतप्त कर देते हैं । उसके आक्रमणसे सूर्य और चन्द्र आदि देवता खिन्न हो उठे । उन सबने ब्रह्माजीसे उस दैत्यराजके वधके लिये प्रार्थना की । क्यों न हो, किसीके बारंबार किये जानेवाले दुष्कर्म या अपराधको महापुरुष भी सहन नहीं कर सकते । तदनन्तर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने नृसिंह रूप धारण करके जोर-जोरसे दहाड़ते हुए उस महान् असुरको उसी प्रकार मार डाला, जैसे हाथी कट्कट् शब्दके साथ घोड़ेको मार डालता है । भगवान् नृसिंहके नख दिग्गजोंके दाँतोंके समान सुदृढ और वज्र आदिके समान भयंकर थे । उनकी चमकीली दन्तपङ्क्ति सुस्थिर विद्युल्लताके समान शोभा पा रही थी । उनका क्रोध तीनों लोकोंको दग्ध करनेके लिये प्रज्वलित हुई प्रलयाग्निके समान जान पड़ता था । उनके सम्पूर्ण अङ्गोंसे पट्टिश, प्रास, तोमर आदि नाना प्रकारके आयुध निकल रहे थे। जैसे प्रलयकालमें अग्निकी ज्वाला समस्त जगज्जालको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार भगवान् नृसिंहके नेत्रोंसे प्रकट हुई आगने उस असुरपुरीके समस्त असुरोंको दग्ध कर दिया । संवर्तक नामक प्रलयकर मेघोंकी गर्जनायुक्त धारावाहिक वृष्टिसे सर्वत्र व्याप्त हुए एकार्णवमें विक्षुब्ध हुई वायुके समान जब भगवान् नृसिंह अत्यन्त क्षोभसे भर गये, तब समस्त दानवोंके समुदाय दिशाओंमें जलते हुए मच्छरोंके समान भाग-भागकर अदृश्य हो गये । भगवान् नृसिंह हिरण्यकशिपुका वध करके आश्वस्त हुए देवताओं द्वारा बड़े आदरके साथ पूजित हो जब धीरेसे कहीं चले गये, तब मरनेसे बचे हुए दानव प्रह्लादसे सुरक्षित हो अपने उस जले हुए देशमें लौट गये । वहाँ अपने बन्धु-बान्धवोंके नाशका विचार करके समयोचित विलाप करनेके अनन्तर उन सबने परलोकवासी बन्धुओंका और्ध्वदैहिक संस्कार एवं श्राद्ध किया । तदनन्तर जिनके बन्धु-बान्धव मारे अथवा भगवान् नृसिंहकी क्रोधाग्निसे जल गये थे, मरनेसे बचे हुए उन आत्मीय जनोंको उन सबने धीरे-धीरे आश्वासन दिया ।

भगवान् नृसिंहने जहाँके दानवोंका विनाश कर डाला था, उस पाताल-गर्तमें रहनेवाले मननशील प्रह्लादने मन-ही-मन अत्यन्त दुखी हो विवेकपूर्वक विचार किया—'इस संसारमें सब प्रकारसे, सब तरहकी पवित्र बुद्धियोंसे और

२८४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

समस्त उत्तम क्रियाओं द्वारा तीव्रतापूर्वक शरण लेने योग्य एकमात्र भगवान् श्रीहरि ही हैं। उनके सिवा यहाँ दूसरी कोई गति नहीं है। तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर कोई नहीं है। सृष्टि, पालन और संहारके एकमात्र कारण श्रीहरि ही हैं। अब इसी क्षणसे सदाके लिये मैं अजन्मा भगवान् नारायणकी शरणमें आया हूँ। जैसे वायु आकाशसे अलग नहीं होती, उसी प्रकार सम्पूर्ण मनोरथोंका साधक 'नमो नारायणाय' यह मन्त्र मेरे हृदयकोशसे दूर नहीं होता। श्रीहरि ही दिशा हैं, हरि ही आकाश हैं; वे ही पृथ्वी हैं और वे ही जगत् हैं; अतः मैं भी अप्रमेयात्मा श्रीहरि ही हूँ। मैं विष्णुरूप हो गया हूँ। श्रीहरि ही प्रह्लाद नामसे प्रकट हैं। मुझ आत्मासे श्रीहरि भिन्न नहीं हैं, मेरे अन्त.करणमें यह दृढ़ निश्चय हो गया है; अतएव मैं सर्वव्यापी हरि ही हूँ। जिनकी हाथरूपी शाखाओंपर चक्र, गदा और खड्ग आदि अस्त्ररूपी पक्षी सदा विश्राम करते हैं, जो नख-किरणमयी मञ्जरियोंसे व्याप्त हैं, जिनके कंधे कोमल-कोमल मन्दारपुष्पकी मालाओंसे अलंकृत हैं, वे महान् मरकत-मणिमय वृक्षोंके समान ये मेरी चार भुजाएँ सुशोभित हो रही हैं, जिनके बाजूबंद समुद्र-मन्थनके समय मन्दराचलकी रगड़से घिस गये थे। ये सदा क्रमशः शीतल तथा उष्ण रहनेवाले दो देवता चन्द्रमा और सूर्य, जिन्होंने संसारको प्रकाशित किया है, मेरे मुखमण्डलके दो नेत्र हैं, नील कमलके समान श्याम तथा गहरी मेघमालाओंके समान सुन्दर मेरी यह अङ्गकान्ति सब ओर फैल रही है। मेरे हाथमें यह पाञ्चजन्य शङ्ख है, जिससे गम्भीर ध्वनिका विस्तार होता है। यह शब्दस्वरूप होनेके कारण मूर्तिमान् आकाश और श्वेत होनेसे क्षीरसागरके समान जान पड़ता है। मेरे करतलमें यह शोभाशाली कमल विद्यमान है, जो मेरी ही नाभिसे उत्पन्न हुआ है। यह दैत्यों और दानवोंका मर्दन करनेवाली मेरी भारी गदा है, जो रत्नजटित होनेसे चितकबरी और सोनेके अङ्गद (वलय) से विभूषित होनेके कारण सुमेरु पर्वतके शिखर-सी प्रतीत होती है। यह मेरा सुदर्शन चक्र है, जिससे सब ओर किरणें छिटक रही हैं तथा जिसकी आकृति साक्षात् सूर्यके समान दिखायी देती है। यह धूमयुक्त अग्निके समान सुन्दर मेरा काला और चमकीला नन्दक नामक खड्ग है, जो दैत्यरूपी वृक्षोंका उच्छेद करनेके लिये कुठार है और देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाला है। यह इन्द्रधनुषके समान सुन्दर और नागराज वासुकिके समान कुण्डलाकार मेरा शार्ङ्गधनुष है, जो पुष्पक और आवर्तक नामक मेघोंके समान बाणरूपी जलकी अविच्छिन्न धाराएँ बरसाता है। पृथ्वी ये मेरे दोनों पैर हैं, आकाश मेरा यह सिर है, तीनों लोक मेरे शरीर हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ मेरी कुक्षि हैं। मैं नील मेघके भीतरी भागकी भाँति श्यामकान्तिसे सुशोभित, गरुड़रूपी पर्वतपर आरूढ एवं शङ्ख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाला साक्षात् विष्णु हूँ। मेरे सामने खड़े हुए ये देवता और असुर मेरे तेजके प्रवाहको उसी तरह नहीं सह सकते जैसे मन्द दृष्टिवाले लोग सूर्यकी प्रभाको नहीं सहन कर पाते। ये ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि और रुद्र आदि देवता बहुसंख्यक मुखोंसे निकली हुई अनन्त वाणीद्वारा मुझ सर्वेश्वर विष्णुकी ही स्तुति करते हैं। मेरा ऐश्वर्य बहुत बढ़ा हुआ है। मैं अपराजित विष्णुरूप हो गया हूँ, सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे ऊपर उठकर अपनी सर्वोत्कृष्ट महिमासे सम्पन्न हूँ।

(सर्ग ३०-३१)

उपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्य पूजा * २८५

प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्य पूजा, उसके प्रभावसे समस्त दैत्योंको वैष्णव हुआ देख विस्मयमें पड़े हुए देवताओंका भगवान्‌से इसके विषयमें पूछना, भगवान्‌का देवताओंको सान्त्वना दे अदृश्य हो प्रह्लादके देवपूजा-गृहमें प्रकट होना और प्रह्लादद्वारा उनकी स्तुति

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार विचार करके भावनाद्वारा अपने शरीरको साक्षात् नारायण-का स्वरूप बनाकर प्रह्लादने उन असुरारि श्रीहरिकी पूजाके लिये फिर इस प्रकार चिन्तन आरम्भ किया—'मैं भावना-दृष्टिसे देख रहा हूँ कि ये भगवान् विष्णु दूसरा शरीर धारण करके मेरे भीतरसे बाहर आकर खड़े हैं, गरुड़की पीठपर बैठे हैं, चतुर्विध शक्तियोंसे सम्पन्न हैं। इनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा आदि शोभा पा रहे हैं। भगवान्‌के श्रीअङ्ग सुन्दर श्याम कान्तिसे सुशोभित हैं। इनके चार भुजाएँ हैं। चन्द्रमा और सूर्य ही इनके नेत्र हैं। ये अद्भुत शोभासे सम्पन्न हैं। कान्तिमान् नन्दक नामक खड्गसे अपने भक्तजनोंको आनन्द प्रदान करते हैं। इनके हाथमें कमल शोभा दे रहा है। नेत्र । दे रहे हैं। ये शार्ङ्गधनुष धारण करते हैं और महान् तेजसे सम्पन्न हैं। इनके पार्षद इन्हें सब ओरसे घेरे हुए हैं। इसलिये मैं शीघ्र ही भावनाभावित समस्त सामग्रियों-से सुशोभित मानसिक पूजाद्वारा इनका पूजन आरम्भ करता हूँ। इसके बाद बाहरी उपकरणोंसे युक्त और अनेक प्रकार-के रत्नोंसे परिपूर्ण विशाल पूजाका भी आयोजन करके इन महान् देव नारायणकी पूजा-अर्चा करूँगा।'

ऐसा विचारकर प्रह्लादने विविध पूजा-सामग्रियोंके सम्भारसे युक्त मनके द्वारा कमलापति माधवका पूजन आरम्भ किया। रत्नसमूहोंसे जटित नाना प्रकारके पात्रों-द्वारा अभिषेक करके भगवान्‌के श्रीअङ्गोंमें उन्होंने चन्दन आदिका अनुलेप किया। फिर नाना प्रकारके धूप-दीप निवेदन किये, भाँति-भाँतिके वैभवशाली आभूषण पहनाये, मन्दार-पुष्पोंकी मालाएँ धारण करायीं, सुवर्णमय कमलोंकी राशि भेंट की, कल्पवृक्षकी लताओं तथा रत्नोंके गुच्छ (गुलदस्ते) अर्पित किये, दिव्य वृक्षोंके पल्लव तथा नाना प्रकारके फूलोंके हार उपहारमें दिये, किंकिरात, बक, कुन्द, चम्पा, नीलकमल, लालकमल, कुमुद, काश, खजूर, आम, पलाश, अशोक, मैनफल, वेठ, कनेर, किरातक, कदम्ब, बकुल, नीम, सिन्दुवार, जूही, पारिभद्र, गुग्गुल और बिन्दुक आदिके यथायोग्य पत्र-पुष्प एवं फल अर्पित किये। प्रियङ्गु, पाट, पाटल धातुपाटल, आम, अमड़ा, गव्य, हरें और बहेड़े भेंट किये। शाल, ताल और तमालके लता, फूल एवं पल्लव चढ़ाये, कोमल-कोमल कलिकाएँ अर्पित कीं, सहकार, कुङ्कुम, केतक, शतपत्र और इलायचीकी मञ्जरियाँ अर्पित कीं। फिर नैवेद्य, ताम्बूल, आरती और पुष्पाञ्जलि आदि सभी सुन्दर-सुन्दर उपचारोंको सादर समर्पित किया। अन्तमें अपने आपको श्रीहरिके चरणोंमें भेंट कर दिया। इस प्रकार जगत्‌के सारे वैभवोंसे भव्य प्रतीत होनेवाली पूजन-सामग्री एवं उच्चकोटिकी भक्तिसे प्रह्लादने अन्तःपुरमें अपने स्वामी भगवान् विष्णुका मानसिक पूजन किया।

२८६* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तदनन्तर दानवराज प्रह्लादने सुप्रसिद्ध देवमन्दिरमें बाह्य वैभवोंसे परिपूर्ण पूजनके उपचारोंद्वारा भगवान् जनार्दनकी पूजा की। मानस-पूजनमें बताये गये क्रमसे ही बाह्य पदार्थोंके अर्पणद्वारा बारंबार परमेश्वर श्रीहरिका पूजन करके दानवराज प्रह्लादको बड़ा संतोष हुआ। तभीसे प्रह्लाद प्रतिदिन पूर्ण भक्तिभावसे परमेश्वरकी पूजा करने लगे। फिर तो उस नगरके सभी दैत्य उसी दिनसे भव्य वैष्णव बन गये; क्योंकि राजा ही आचारका कारण होता है। (सजा सदाचारी हो तो प्रजा भी सदाचारपरायण होती है।) शत्रुसूदन श्रीराम ! फिर तो आकाशवर्ती देवलोकमें यह बात फैल गयी कि सारे दैत्य द्वेष छोड़कर भगवान् विष्णुके भक्त हो गये हैं। रघुनन्दन ! यह सुनकर इन्द्र आदि देवता और मरुद्गण बड़े विस्मित हुए कि दैत्योंने भगवान् विष्णुकी भक्ति कैसे अपनायी। आश्चर्यमें डूबे हुए देवता अन्तरिक्षवर्ती स्वर्गलोकको छोड़कर क्षीरसागरमें शेषनागकी शय्यापर विराजमान भगवान् श्रीहरिके पास गये । वहाँ बैठे हुए भगवान्‌से उन्होंने दैत्योंका सारा समाचार कह सुनाया और इस अपूर्व आश्चर्य तथा विस्मयसे भरे हुए स्वभाव-परिवर्तनका कारण पूछा।

देवता बोले—भगवन् ! यह क्या बात है ? जो दैत्य सदा ही आपके विरोधी रहे, वे ही आपकी भक्तिमें कैसे तन्मय हो गये ? कहाँ तो वे अत्यन्त दुराचारी दानव और कहाँ आप भगवान् जनार्दनके प्रति उत्तम भक्ति। कहाँ तो पामरोचित कार्य करनेवाला, सदा निन्दित कर्मोंमें निरत और हीन जातिवाला बेचारा दानव-समाज और कहाँ आप भगवान् विष्णुकी उत्तम भक्ति।

श्रीभगवान् बोले—देवताओ ! तुम विषादमें न पड़ो। शत्रुदमन प्रह्लाद भक्तिमान् हो गये हैं। यह उनका अन्तिम जन्म है। अब वे मोक्षके अधिकारी हो गये हैं। इसके बाद ये दानव प्रह्लाद गर्भवास नहीं कर सकते। जैसे भूना हुआ बीज अङ्कुर नहीं उत्पन्न कर सकता, उसी प्रकार ज्ञानाग्निसे दग्ध हुए कर्म बन्धन-कारक नहीं हो सकते। श्रेष्ठ देवगण ! तुमलोग अपने-अपने विचित्र लोकोंमें पधारो। प्रह्लादकी यह गुणवत्ता (उनकी यह भगवद्भक्ति) तुम्हें दुःख देनेवाली नहीं हो सकती।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देवताओंसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये और देवताओंका समुदाय स्वर्गलोकको लौट गया। तबसे प्रह्लादके प्रति देवताओंकी मित्रता हो गयी । भक्त प्रह्लाद इसी प्रकार प्रतिदिन मन, वाणी और क्रियाद्वारा देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी पूजा करने लगे। पूजामें तत्पर रहनेवाले प्रह्लादके हृदयमें समय पाकर विवेक, आनन्द, वैराग्य और विभूति आदि गुण बढ़ने लगे। जैसे पक्षी सूखे हुए वृक्षको पसंद नहीं करते, उसी प्रकार प्रह्लादने भोग-समूहोंका अभिनन्दन नहीं किया—भोगोंकी ओरसे उनकी रुचि हट गयी। जैसे मृग जनसमुदायसे भरी हुई भूमिमें प्रसन्न नहीं होता, उसी

उपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्य पूजा * २८७


प्रकार उनका मन कान्ताओंमें नहीं रमता था, शास्त्रीय बातोंकी चर्चाके सिवा अन्य लोकचर्चाओंमें उनका मन नहीं लगता था। नाशवान् दृश्य पदार्थोंसे उनकी आसक्ति सर्वथा दूर हो गयी थी। भगवान् विष्णुने क्षीरसागर-रूपी मन्दिरमें रहते हुए ही अपनी सर्वव्यापिनी परम दिव्य बुद्धिके द्वारा प्रह्लादकी उस उच्चतम स्थितिको जान लिया। तदनन्तर भक्तोंको आह्लाद प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णु पाताल-मार्गसे प्रह्लादके उस भवनमें पधारे, जिसमें वे अपने इष्टदेवकी पूजा किया करते थे। कमलनयन भगवान् विष्णुको आया हुआ जानकर दैत्यराज प्रह्लादने पहलेकी अपेक्षा दुगुनी वैभवशालिनी सामग्रीसे सुशोभित पूजा-विधिद्वारा उनका आदर-सत्कारपूर्वक पूजन किया। तत्पश्चात् पूजागृहमें पधारे हुए भगवान्

श्रीहरिको प्रत्यक्ष विराजमान देख परम प्रीतियुक्त हुए प्रह्लादने भक्तिभावसे परिपुष्ट हुई वाणीद्वारा उनका स्तवन आरम्भ किया।

प्रह्लाद बोले—जो त्रिभुवनरूपी रत्नको सुरक्षित रखनेके लिये मनोहर कोषागार हैं, उपासकोंके सारे पापोंको हर लेनेवाले हैं, अज्ञानान्धकारसे परे परम प्रकाश-स्वरूप हैं, अशरणको शरण देनेवाले तथा शरणागत-पालक हैं, उन अजन्मा, अच्युत, परमेश्वर श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ।

जो प्रफुल्ल नील कमलदल तथा नील मणिके समान श्याम सुन्दर कान्तिसे सुशोभित हैं, जिनके श्याम विग्रहके लिये शरद् ऋतुके निर्मल आकाशके मध्यभागसे उपमा दी जाती है, भ्रमर, अन्धकार, काजल और अञ्जनके समान नील आभासे जिनके श्रीअङ्ग प्रकाशित होते हैं तथा जो अपने हाथोंमें कमल, चक्र एवं गदा धारण करते हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

जो परम निर्मल हैं, जिनके कोमल अङ्ग अलिकलाप (भ्रमर-राशि)-के समान श्याम हैं, जिनके हाथमें श्वेत दलवाले अधखिले कमलके समान शङ्ख शोभा पाता है, जिनके नाभि-कमलमें वेदमन्त्रोंकी ध्वनिरूप गुञ्जारवसे युक्त ब्रह्मारूपी भ्रमर विराजमान हैं तथा जो अपने भक्तजनोंके हृदय-कमल-दलमें निवास करते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ।

भगवान्के श्वेत नख-समूह जहाँ तारोंके समान छिटके हुए हैं, जहाँ मधुर मुस्कानकी ज्योत्स्नासे उज्ज्वल मुखरूपी पूर्ण चन्द्रमण्डलका प्रकाश छा रहा है तथा हृदयस्थित कौस्तुभ मणिकी किरणोंका समूह जहाँ आकाश-गङ्गाकी छटा छिटका रहा है, उन सर्व-व्यापी श्रीहरिरूपी शरत्कालिक निर्मल आकाशकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

प्रलयकालमें अक्षयवटके पत्रपर शयन करनेवाले शिशुरूप बालमुकुन्दकी मैं शरण लेता हूँ। बालरूप होनेपर भी उनका अनन्त कल्याणमय दिव्य गुणगणोंसे सुशोभित शरीर बहुत पुराना (वृद्ध) है। उनके

२८८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

उस बालवपुके उदरभागमें यह घनीभूत सारी सृष्टि पूर्णतया समायी हुई है। वे भगवान् नित्य निरन्तर विराजमान, जन्म-वृद्धि आदि विकारोंसे रहित तथा विशाल (सर्वत्र व्यापक) हैं।

नूतन खिले हुए नाभि-कमलके परागसे जिनका वक्षःस्थल गौरवर्णका प्रतीत होता है, जिनका वामाङ्ग लक्ष्मीजीके दीप्तिमान् देहसे विभूषित है, जो सायंकालिक अरुण किरणके समान लाल अङ्गराग धारण करते हैं तथा सुवर्णके समान रंगवाले रेशमी पीताम्बरसे जिनका श्रीविग्रह परम सुन्दर दिखायी देता है, उन भगवान् श्रीनारायणकी मैं शरण लेता हूँ।

दैत्यरूपिणी कमलिनीपर तुषारपात करनेके लिये जो हेमन्त और शिशिरके समान हैं, देवरूपिणी नलिनीको विकसित करनेके लिये सदा उदित रहनेवाले सूर्यबिम्बके सदृश हैं तथा ब्रह्मारूपी कमलके उद्भवके लिये जो जलसे भरे हुए तड़ागके तुल्य हैं, उपासकोंके हृदय-कमलमें निवास करनेवाले उन भगवान् श्रीहरिका मैं आश्रय लेता हूँ।

जो त्रिभुवनरूपी कमलके विकासके लिये सूर्यके सदृश हैं, अन्धकारकी भाँति बुद्धिको आच्छादित करनेवाले मोह या अज्ञानका निवारण करनेके लिये उत्तम एवं प्रज्वलित दीपकके तुल्य हैं, जिनमें जड़तारूपिणी मायाका अभाव है, जो सदा अपने स्वरूपको प्रकाशित करते हैं अथवा नित्य दिव्य प्रकाश जिनका रूप है, उन चिन्मय आत्मतत्त्वस्वरूप तथा सम्पूर्ण जगत्‌की सारी पीड़ाओंको हर लेनेवाले श्रीहरिकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार बहुत-सी गुणवाग्रियोंसे युक्त स्तुति-ऋचाओंद्वारा पूजित हुए असुर-विनाशक तथा नील कमलदलके समान श्याम भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होकर प्रीतियुक्त भक्त दैत्यराज प्रह्लादसे बोले। (सर्ग ३२-३३)


प्रह्लादको भगवान्द्वारा वर-प्राप्ति, प्रह्लादका आत्मचिन्तन करते हुए परमात्माका साक्षात्कार करना और उनका स्तवन करते हुए समाधिस्थ हो जाना, तत्पश्चात् पातालकी अराजकताका वर्णन और भगवान् विष्णुका प्रह्लादको समाधिसे विरत करनेका विचार

श्रीभगवान्‌ने कहा—दैत्यकुलशिरोमणि प्रह्लाद ! तुम तो गुणोंके आकर हो, अतः जन्म-मरणरूपी दुःखकी निवृत्तिके लिये तुम पुनः अपना अभीष्ट वर माँग लो।

प्रह्लाद बोले—भगवन् ! आप समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें विराजमान होकर उनके इच्छानुसार फल प्रदान करनेवाले हैं; अतः विभो ! आप जिस वस्तुको सबसे श्रेष्ठ समझते हों, वही मुझे देनेकी कृपा कीजिये।

श्रीभगवान्‌ने कहा—निष्पाप प्रह्लाद ! जबतक तुम्हें ब्रह्मतत्त्वकी प्राप्ति न हो जाय, तबतक तुम सम्पूर्ण संशयोंकी पूर्णतया शान्ति तथा सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप फलके लिये विचारपरायण बने रहो।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! दैत्यराज प्रह्लाद-से ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। उन विष्णुदेवके अन्तर्हित हो जानेपर प्रह्लादने पूजाके अन्तमें मणि-रत्नोंसे सुशोभित पुष्पाञ्जलि समर्पित की। उस समय उनका चित्त अत्यन्त प्रसन्न था। वे एक श्रेष्ठ आसनपर पद्मासन लगाकर बैठ गये और स्तोत्रपाठ

उपशम-प्रकरण ]

  • प्रह्लादको भगवान्‌द्वारा वर-प्राप्ति, प्रह्लादका आत्मचिन्तन * २८९

करते समय अपने हृदयमें यों विचार करने लगे कि आवागमनरूपी संसारका निवारण करनेवाले भगवान्‌ने मुझे ऐसा उपदेश दिया है कि 'तुम विवेक-विचार-संयुक्त होओ। अतः अब मैं अपने अन्तःकरणमें आत्म विचार करनेमें तत्पर होता हूँ। वृक्ष, तृण और पर्वतोंसे युक्त यह जगत् तो मैं हूँ नहीं; क्योंकि जो बाह्य और अत्यन्त जड है, वह मैं कैसे हो सकता हूँ। अचेतन शरीर भी मैं नहीं हूँ; क्योंकि यह असत् होता हुआ भी प्रकट, जड़ होनेके कारण बोलनेमें असमर्थ, प्राण-वायुओंद्वारा अपने संचरणकालमें ही परिचालित और अल्प कालमें ही विनष्ट होनेवाला है। मैं तो केवल वह शुद्ध चेतन ही हूँ, जो ममताहीन, मननरूप मनके व्यापारसे शून्य, शान्त, पाँचों इन्द्रियोंके भ्रमोंसे रहित और मायाके सम्बन्धसे हीन है। यह जो सबका प्रकाशक, बाहर-भीतर सर्वत्र व्याप्त, अखण्ड, निर्मल और सत्तामात्र है, वह जड़-दृश्यरहित शुद्ध चिन्मय आत्म-स्वरूप ही मैं हूँ। यह आत्मा, जो सर्वव्यापक और विकल्प-

रहित चिन्मय बोधस्वरूप है, वह मैं ही हूँ। यह आत्मा ही जगत्‌की स्थितिमें निरन्तर अनुभवमें आनेवाले समस्त पदार्थोंका आदि कारण है, परंतु इस आत्माका कोई कारण नहीं है। इसी आत्मासे सारे पदार्थोंका पदार्थत्व उत्पन्न होता है। ये घट-पट आदि आकारवाले सैकड़ों सांसारिक पदार्थ विशाल दर्पणरूप इस चिन्मय शुद्ध आत्मामें प्रतिबिम्बित होते हैं। यह अकेला मैं, जो आदि और अन्तसे रहित तथा सर्वव्यापक हूँ, सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंके अंदर आत्मस्वरूपसे स्थित हूँ। मेरा यह साँवला स्वरूप—जो शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाला तथा सम्पूर्ण सौभाग्योंकी चरम सीमा है, इस जगत्‌का पालन करता है। जो कमलरूपी आसनपर विराजमान होते हैं और निर्विकल्प समाधिमें स्थित होकर परम सुखका अनुभव करते हैं, उन ब्रह्माके रूपमें मैं ही सदा इस जगत्‌में उत्पन्न होता हूँ। मैं ही त्रिनेत्र-धारी शिव होकर प्रलयकालमें इस जगत्‌का संहार करता हूँ। मैं ही इन्द्ररूपसे मन्वन्तरके क्रमसे प्राप्त हुई इस सम्पूर्ण त्रिलोकीका पालन करता हूँ। यह जो कुछ स्थावर-जंगमरूप जगत् दृष्टिगोचर हो रहा है, सम्पूर्ण संकल्पोंसे रहित वह परम शुद्ध चेतन आत्मरूप मैं ही हूँ। जिसमें अनन्त आनन्दका अनुभव प्राप्त होता है तथा जो परम शान्तिसे सुशोभित एवं शुद्ध है, ऐसी यह चिन्मयी दृष्टि सम्पूर्ण दृष्टियोंसे बढ़कर है। जो शाश्वत एवं विज्ञानानन्दघनरूप है, उस उत्तम साम्राज्यका परित्याग करके मुझे इन अनित्य एवं दुःखरूप राज्य-विभूतियोंमें लेशमात्र भी सुखकी प्रतीति नहीं होती; क्योंकि ये विभूतियाँ रमणीय नहीं हैं। ऐसे विज्ञानानन्दघन परम पदको छोड़कर मूर्ख ही तुच्छ विषय-भोगोंमें आसक्त होता है, विवेकशील ज्ञानी नहीं। भला, इस परम दिव्यदृष्टिका त्याग करके कौन मनुष्य घृणा करने योग्य तुच्छ राज्यमें आसक्त होगा। जिन्होंने इस उत्तम दृष्टिका परित्याग करके दुःखरूप क्षणभङ्गुर राज्यमें मन लगाया, वे सब-के-सब वास्तवमें मूर्ख ही थे; क्योंकि

२९० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

कहाँ तो नन्दनवनकी प्रफुल्लित रमणीय वनस्थली और कहाँ संतप्त मरुस्थल ! उसी प्रकार कहाँ तो ये पारमार्थिक शान्त दिव्य ज्ञानदृष्टियाँ और कहाँ देह एवं विषय-भोगोंमें अहंता-ममताबुद्धि ! अर्थात् इनमें आकाश-पातालका अन्तर है । इस त्रिलोकीमें राज्य पाकर भी वास्तविक सुख लेशमात्र भी नहीं मिलता, किंतु मूर्खताके कारण ही मनुष्य उसे चाहता है । उधर जो सर्वव्यापक, स्वस्थ, सम, निर्विकार और सर्वरूप है, उस चेतनका आश्रय ग्रहण करनेसे सम्पूर्ण वास्तविक आनन्द सदा-सर्वदा प्राप्त होता रहता है । ये जो कोई भी विषयी मनुष्य मोहरूपी जालमें आ फँसे हैं, उनके गिरनेका प्रधान कारण उनकी संकल्प-कल्पना ही है । इसी प्रकार मेरे पितामह आदि पूर्वजोंने भी जो संकल्प-समूहोंसे आवृत और विषयरूपी गर्तमें गिरनेवाले थे, इस बाधारहित परमानन्दस्वरूप आत्मपदका अनुभव नहीं किया । इसीलिये वे भूतलपर इने-गिने दिनोंतक ही स्फुरित होकर गड्ढेमें गिरे हुए क्षुद्र मच्छरोंकी भाँति विनष्ट हो गये । सभी जीव इच्छा और द्वेषसे उत्पन्न हुए सुख-दुःखादि द्वन्द्वरूपी मोहसे युक्त होनेके कारण पृथ्वीके छिद्रमें छिपे हुए कीटोंकी समताको प्राप्त हो गये हैं; परन्तु जिसकी अनुकूल और प्रतिकूल कल्पनारूपी मृगतृष्णा सच्चिदानन्द परमात्माके ज्ञानरूपी मेघसे शान्त हो चुकी है, उसीका जीवन धन्य है ।

'ॐ'* ही जिस सच्चिदानन्द ब्रह्मका सर्वोत्तम नाम है और जो समस्त विकारोंसे सर्वथा रहित है, वह परमात्मा ही भूतलके समस्त पदार्थोंके रूपमें विराजमान है ।* ज्योतिःस्वरूप वह परमात्मा ही सूर्य आदिके अंदर स्थित होकर अपनी सत्ता-स्फूर्तिसे उन्हें प्रकाशित करता है । वही अग्निको उष्णतायुक्त करता है और जलको रसमय बनाता है । भयरहित वह परमात्मा स्वयं ही प्रकट होता है और ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त समस्त जगत्को अपनी सत्ता-स्फूर्तिसे घुमाता रहता है । वह स्थाणुसे भी बढ़कर नित्य अचल और आकाशसे भी बढ़कर नित्य निर्लेप है । इसीका सदा अन्वेषण, स्तवन और ध्यान करना चाहिये । समस्त प्राणियोंके शरीरोंके अंदर उनके हृदयकमलमें स्थित यह परमात्मा अत्यन्त सुलभ है; क्योंकि हृदयकी थोड़ी-सी भी सच्ची पुकारसे यह तत्क्षण सम्मुख प्रकट हो जाता है । यह परमात्मदेव सभी शरीरोंमें उसी प्रकार व्याप्त है, जैसे पुष्पोंमें सुगन्ध, तिलकणोंमें तेल और रसयुक्त पदार्थोंमें माधुर्य । परन्तु हृदयमें विद्यमान रहनेपर भी यह चेतन विवेक-विचारके अभावके कारण जाना नहीं जा सकता; विचारणाके द्वारा ही उस परमेश्वरका ज्ञान होता है । उसे भलीभाँति जान लेनेपर प्रियजनके समागमकी तरह परमानन्दकी प्राप्ति होती है । अतिशय आनन्द प्रदान करनेवाले परमात्मारूपी उस परमप्रेमी बन्धुका दर्शन होनेपर ऐसी ऐसी बुद्धियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनके प्रभावसे साधकका परमात्मासे कभी वियोग नहीं होता । उसके सांसारिक स्नेहके समस्त बन्धन टूट जाते हैं, काम-क्रोध आदि सारे शत्रु विनष्ट हो जाते हैं और तृष्णाएँ मनको चञ्चल नहीं कर पातीं । यही परमात्मा आकाशमें शून्यता, वायुमें स्पन्दन, तेजस्वी पदार्थोंमें प्रकाश, जलमें उत्तम मधुरता, पृथ्वीमें कठोरता, अग्निमें उष्णता, चन्द्रमामें शीतलता और सृष्टिसमूहमें सत्तारूपसे स्थित है ।

अज्ञानरूपी शत्रुने मेरे विवेक-धनका अपहरण करके उसका सर्वनाश कर डाला था और वह इतने कालतक मुझे कष्ट देता रहा; परंतु इस समय स्वतः उत्पन्न हुई सर्वोत्तम विष्णु-कृपासे मुझे परम तत्त्वका ज्ञान हो गया है, जिससे मैंने उस अज्ञानका परित्याग कर दिया है ।


* 'ओमिति ब्रह्म—ॐ ब्रह्म है', 'ओमितीदं सर्वम्—ॐ यह सब कुछ है', 'एतद् वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः—सत्यकाम ! यह पर और अपर ब्रह्म है, जो यह ओंकार है ।'

उपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादको भगवान्‌द्वारा वर-प्राप्ति प्रह्लादका आत्मचिन्तन * २९१


इस समय मैंने उस परम ज्ञानरूपी मन्त्रके बलसे इस अहंकार-पिशाचको शरीररूपी वृक्षके खोखलेसे बाहर निकाल दिया है, जिससे मेरा यह शरीररूपी महान् वृक्ष अहंकाररूपी यक्षसे रहित होकर परम पवित्र हो गया है और प्रफुल्लित वृक्षके समान सुशोभित हो रहा है। विवेकरूपी धनराशिकी प्राप्तिके कारण जब मेरे दुराशारूपी दोष सर्वथा नष्ट हो गये, तब मेरी अज्ञानरूपी दरिद्रता भी पूर्णतया शान्त हो गयी, अतः अब मैं परमेश्वरके रूपमें स्थित हूँ। भगवान्‌की कृपासे मुझे सम्पूर्ण ज्ञातव्य वस्तुओंका ज्ञान प्राप्त हो गया है और मैंने देखने योग्य सभी दृष्टियोंको देख लिया है। इस समय मुझे वह वस्तु प्राप्त हो गयी है, जिसके पा लेनेपर कुछ भी पाना अवशिष्ट नहीं रह जाता। सौभाग्यकी बात है कि मैं उसी ऊँची एवं विस्तृत पारमार्थिक भूमिको प्राप्त हो गया हूँ, जिसमें अनर्थोंका नाम-निशान नहीं है. विषय-रूपी सर्पोंका अत्यन्त अभाव हो गया है, अज्ञानरूपी कुहरा सर्वथा नष्ट हो गया है, आशारूपी मृगतृष्णा शान्त हो चुकी है, जिसकी सारी दिशाएँ रजोगुणरूपी धूलसे रहित हो गयी हैं और जिसमें शान्तिरूपी शीतल छायावाला वृक्ष लहलहा रहा है। भगवान् विष्णुकी स्तुति, प्रणाम और प्रार्थना करनेसे तथा शम एवं यम-नियमोंके पालनसे मुझे इन सच्चिदानन्दघन परमात्माकी प्राप्ति हुई है और उन्हींकी कृपासे मैंने परमात्माको स्पष्टरूपसे देखा और समझा भी है । वह अविनाशी एवं अहंकाररहित विज्ञानघन परमात्मा भगवान् विष्णुकी कृपावश चिरकालसे मेरी स्मृतिमें सुदृढ़रूपसे स्थित हो गया है, जिससे मेरा मोह पूर्णतया शान्त हो गया है, अहंकाररूपी राक्षस नष्ट हो गया है और मैं दुराशा-रूपी पिशाचिनीसे मुक्त हो गया हूँ; अतः अब मेरा संताप मिट गया है। सबसे बड़े हर्षकी बात तो यह है कि मेरी बहुत-सी दुर्वासनाएँ, जो दुराशाओं तथा दीर्घकालसे दुष्ट देह आदिमें आत्मत्वके अभिमानसे मलिन एवं भयरूपी सर्पोंके लिये हितकारिणी थीं, भगवान्‌के ध्यानसे विनष्ट हो गयी हैं। मैंने सच्चिदानन्द-घन परमात्माका साक्षात्कार कर लिया है और उन्हें भलीभाँति जान भी लिया है। मुझे उनका यथार्थ अनुभव भी हो गया है, इसीलिये उनका नित्य संयोग मुझे प्राप्त है। अब मेरा मन—जिसके विषय-भोग, संकल्प-विकल्प और इच्छाएँ पूर्णतया नष्ट हो गयी हैं, जो अहंकारसे सर्वथा मुक्त है, जिसमें आसक्ति और विषय-भोगोंकी उत्कण्ठा लेशमात्र भी नहीं रह गयी है और जो बाहर-भीतरकी चेष्टाओंसे रहित हो गया है, संसारसे उपराम होकर परमात्मामें लीन हो गया है।

यों समस्त पदोंसे उत्कृष्ट आनन्दरूप परमात्मा चिरकालसे मेरी स्मृतिमें स्थित हुए हैं। भगवन् ! बड़े सौभाग्यसे आप मुझे उपलब्ध हुए हैं, अतः आप परमात्माके लिये मेरा नमस्कार है। प्रभो ! मैं चिरकालसे आपका दर्शन करते हुए प्रणाम करके आलिङ्गन कर रहा हूँ। भला, त्रिलोकीमें आपके अतिरिक्त मेरा परम प्रिय बन्धु और कौन हो सकता है। विश्वको उत्पन्न करनेवाले विभो ! आपने अपनी सत्ता-स्फूर्तिसे सम्पूर्ण विश्वको परिपूर्ण कर रक्खा है, इसी कारण सर्वत्र आपका नित्य अनुभव होता है; अतः आप कहाँ भागकर जा सकते हैं अर्थात् अदृश्य हो सकते हैं। परम प्रिय मित्र ! बहुसंख्यक जन्मोंके व्यवधानके कारण अज्ञानवश हम दोनोंमें जो अन्तर प्रतीत होता था, वह अब उस अज्ञानके नाश होनेसे दूर हो गया है और अभेदरूप समीपता प्राप्त हो गयी है। बड़े सौभाग्यसे मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। आप कृतकृत्य, संसारके कर्ता और सबका भरण-पोषण करनेवाले हैं; आपको बारंबार नमस्कार है। आप संसार-वृक्षके कारण, अविनाशी और विशुद्धात्मा हैं; आपको मेरा प्रणाम है। जिनके हाथोंमें चक्र और कमल सुशोभित होते हैं, उन विष्णु-रूप आपको नमस्कार है।

२९२ * अविच्छिन्नसंविदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

ललाटपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले शिवस्वरूप आपको मैं अभिवादन करता हूँ। कमलसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मारूप आपको प्रणाम है। देवराज इन्द्रके रूपमें विराजमान आपकी मैं वन्दना करता हूँ। भगवन् ! हम दोनोंमें जो यह भेद दृष्टिगोचर हो रहा है, वह समुद्रके जल और उसकी तरङ्गके समान केवल झूठी कल्पना ही है। वस्तुतः हम दोनोंमें कोई भेद है ही नहीं। आप सृष्टिकर्ता, सबके साक्षीरूप और अनन्त रूपोंमें प्रकट होनेवाले हैं; आपको पुनः-पुनः नमस्कार है। सबके आत्मरूप और सर्वव्यापी आप परमात्माको बारंबार प्रणाम है। देव ! मिट्टी, काष्ठ, पत्थर और जलमात्र यह सारा जगत् आपके सिवा और कुछ नहीं है। अर्थात् आपका ही स्वरूप है, अतः आपकी प्राप्ति हो जानेपर फिर किसी अन्य वस्तुके प्राप्त करनेकी इच्छा ही नहीं रह जाती। जिसका वेद-वेदान्तके सिद्धान्त, तर्क और पुराणोंके गीतोंद्वारा वर्णन किया गया है, उस परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर फिर वह कैसे विस्मृत हो सकता है। निर्मल परब्रह्म परमात्मरूप आपका साक्षात्कार हो जानेपर देहके वे सुन्दर विषय-भोग भी आज मेरे हृदयको रुचिकर नहीं लग रहे हैं। आप निर्मल दिव्य ज्योतिःस्वरूप हैं। आपसे ही सूर्यमें प्रकाशकता आयी है और शीतल हिमरूप आपसे ही चन्द्रमाको शीतलताकी प्राप्ति हुई है। आपके ही प्रभावसे ये पर्वत गुरुतासे सम्पन्न हुए हैं और आपने ही इन खेचरोंको धारण कर रक्खा है। आपके ही बलसे यह पृथ्वी अटरूपसे स्थित है और आपकी ही सत्तासे आकाश आकाशताको प्राप्त हुआ है। बड़े सौभाग्यकी बात है कि आप मेरे स्वरूपको प्राप्त हो गये हैं और मैं आपके रूपमें परिणत हो गया हूँ; अतः अब मैं आप हूँ और आप मैं हैं। इसलिये देव ! अब हम दोनोंमें भेद नहीं रह गया है अर्थात् हम एकीभावको प्राप्त हो गये हैं। इसमें भी मेरा सौभाग्य ही कारण है। मेरा आत्मा—जो सम, शुद्ध, साक्षीरूप, निराकार और दिशा-काल आदिसे रहित है, उसीमें आप स्थित हैं। आपका स्वरूप सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है। आपके ही अंदर यह संसार-मण्डल था और रहेगा। काष्ठमें व्याप्त हुई आगकी भाँति आप इस शरीरके अंदर स्थित हैं। आप ही सर्वोत्तम अमृत-स्वरूप रस हैं और तेजस्वी पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही पदार्थोंके ज्ञाता और ज्योतियोंके प्रकाश हैं। जैसे सुवर्णमें कड़े, बाजूबंद, केयूर आदि आभूषणोंका आरोप किया जाता है, उसी तरह सांसारिक पदार्थ-समूह आपमें ही आरोपित हैं। आपको प्राप्त कर लेनेपर प्रारब्धानुकूल प्राप्त हुए सुख-दुःखका प्रवाह समूल नष्ट हो जाता है—ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यके प्रकाशको पाकर अन्धकारका अथवा गरमीको पाकर हिमका नाम-निशान मिट जाता है। भगवन् ! यह सारा विश्व आपका ही स्वरूप है, आपकी जय हो। आप शान्तिपरायण, सभी प्रमाणोंसे परे और सम्पूर्ण आगमोंद्वारा जानने योग्य हैं; आपकी बारंबार जय हो।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले प्रह्लाद इस प्रकार परमात्माका चिन्तन करते-करते निर्विकल्प परमानन्दस्वरूप परमात्मामें समाधिस्थ हो गये। अपने महलमें यों समाधि-अवस्थामें पड़े हुए दैत्यवंशी प्रह्लादका बहुत-सा समय व्यतीत हो गया। उस समय यद्यपि असुरश्रेष्ठोंने उन्हें जगानेकी बहुत चेष्टा की, तथापि असमयमें उन महाबुद्धिमान्‌की समाधि भङ्ग न हुई। यों निश्चल ब्रह्मस्वरूप एवं शान्त हुए प्रह्लाद बाह्यदृष्टिशून्य होकर हजारों वर्षोंतक उस दैत्यनगरीमें समाधिस्थ पड़े रहे। उस समय हिरण्यकशिपु मर चुका था और उसके पुत्र प्रह्लाद समाधिस्थ हो गये थे; अतः जब पातालमें कोई अन्य राजा नहीं रह गया, तब दानवोंको अपने अधिपतिका अभाव खटकने लगा। इसलिये उन्होंने प्रह्लादको समाधिसे जगानेके लिये घोर

उपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादको भगवान्‌द्वारा वर-प्राप्ति, प्रह्लादका आत्मचिन्तन * २९१


प्रयत्न किया, परन्तु वे नहीं जगे। तब उस राजारहित नगरमें बलवान् दैत्य लुटेरोंकी तरह स्वेच्छानुसार लूट-पाट करने लगे, जिससे उद्विग्न होकर अन्य दैत्य अपनी अभीष्ट दिशाओंमें भाग गये। उस अराजकताके कारण पाताललोक चिरकालके लिये मात्स्यन्यायसे* अस्त-व्यस्त और मर्यादारहित हो गया। वहाँ बलवानोंने दुर्बलोंके नगर छीन लिये। मर्यादाके क्रमका सर्वथा विनाश हो गया। सभी लोग स्त्रियोंको पीड़ा पहुँचाने लगे। पुरुषोंके प्रलाप और रोदनके शब्द चारों ओर व्याप्त हो गये। लोगोंने एक दूसरेके वस्त्र छीन लिये। नगरका मध्यभाग खंडहरके रूपमें परिणत हो गया और क्रीड़ोद्यान नष्ट-भ्रष्ट हो गये। सारा राज्य व्यर्थके अनर्थोंसे पीड़ित हो गया। दिशाएँ धूलसे व्याप्त हो गयीं। अन्न, फल और बन्धु-बान्धवोंका अभाव हो गया। इस प्रकार आकस्मिक उत्पातसे विवश होकर सारा असुर-समुदाय चिन्ताग्रस्त हो गया। उस समय वह असुर-मण्डल भयसे उद्विग्न हो गया था। वहाँ स्त्रियों, धन, मन्त्र और युद्ध मर्यादा-हीन हो गये थे। जिनके धन और स्त्रियोंका अपहरण हो गया था, उनका करुण-क्रन्दन चारों ओर गूँज रहा था, जिससे वह दैत्य-समाज कलियुग आनेपर लूट-पाट करनेवाले क्रूर लुटेरों-सा जान पड़ता था।

राघव ! तदनन्तर एक बार शेषशय्यापर विराजमान शत्रुसूदन श्रीहरि, जो लीलापूर्वक सम्पूर्ण जगत्‌का पालन करते हैं, देवताओंकी प्रयोजन-सिद्धिके लिये अपनी बुद्धिसे सांसारिक स्थितिका निरीक्षण करने लगे। पहले उन्होंने मन-ही-मन स्वर्गलोकका अवलोकन करके तत्पश्चात् भूतलवासियोंके आचरणोंका निरीक्षण किया। फिर वे मनसे ही शीघ्र दैत्योंद्वारा सुरक्षित पाताललोकमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि दानवराज प्रह्लाद अटल समाधिमें स्थित हैं, जिससे अमरावतीपुरीमें सम्पत्तिकी भरपूर वृद्धि हो गयी है। तब जो शेषशय्यापर पद्मासन लगाकर बैठे थे तथा जिनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा सुशोभित हो रहे थे, उन भगवान् नारायणके मनमें ऐसा विचार उत्पन्न हुआ कि मैं रसातलमें जाकर दानवराज प्रह्लादको उसके कर्ममें पहलेकी तरह उसी प्रकार स्थापित करूँगा, जैसे वसन्त ऋतु वृक्षको पुनः उसकी पूर्व दशामें ला देती है। यदि मैं प्रह्लादके अतिरिक्त किसी दूसरेको दानवराजके पदपर स्थापित करता हूँ तो वह निश्चय ही देवताओंपर आक्रमण कर देगा। साथ ही प्रह्लादका यह अन्तिम शरीर परम पावन है। वह इसी शरीरसे कल्पपर्यन्त यहाँ निवास करेगा; क्योंकि परमेश्वरकी नियति देवीने ऐसा ही निश्चित किया है कि प्रह्लादको इसी शरीरसे यहाँ एक कल्पतक रहना चाहिये। इसलिये मैं वहाँ जाकर दैत्यराज प्रह्लादको ही जगाऊँगा, जिससे वह जीवन्मुक्तोंकी समाधिमें स्थित होकर दैत्याधिपत्यको ग्रहण करे।


* बलवान् बड़ा मत्स्य अपनेसे छोटे निर्बल मत्स्योंको निगल जाता है, इसीको 'मात्स्यन्याय' कहते हैं।

सं० यो० व० अं० १९—

२९४ * अविच्छिन्नसच्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

निश्चय ही हम मर्यादारहित दस्युओंके अत्याचारसे भयानक उस पातालमें जाकर दैत्यराज प्रह्लादको समाधिसे विरत करेंगे और इस सम्पूर्ण जगत्‌को पूर्ववत् स्वस्थ बनायेंगे। (सर्ग ३४-३८)


भगवान् विष्णुका पातालमें जाना और शङ्खध्वनिसे प्रह्लादको प्रबुद्ध करके उन्हें तत्त्वज्ञानका उपदेश देना, प्रह्लादद्वारा भगवान्‌का पूजन, भगवान्‌का प्रह्लादको दैत्यराज्यपर अभिषिक्त करके कर्त्तव्यका उपदेश देकर क्षीरसागरको लौट जाना, आख्यानका उत्तम फल, जीवन्मुक्तोंके व्युत्थानका हेतु और पुरुषार्थकी शक्तिका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—वत्स राम ! यों विचारकर सर्वात्मा भगवान् श्रीहरि शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म और लक्ष्मी आदि पार्षदोंके साथ अपने नगर क्षीरसागरसे चल पड़े। वे उसी क्षीरसागरके तलेके छिद्रसे निकलकर प्रह्लादके नगरमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने स्वर्णमय महलके मध्यमें स्थित असुरराज प्रह्लादको देखा। भगवान् विष्णुके तेजसे प्रभावित होकर वहाँका सारा दैत्य-समुदाय धूलकी तरह उड़कर उसी प्रकार अदृश्य हो गया, जैसे सूर्यकी किरणोंसे भयभीत होकर उलूक छिप जाते हैं। तब अपने परिवारसहित श्रीहरिने दो-तीन प्रधान-प्रधान असुरोंको साथ लेकर प्रह्लादके महलमें प्रवेश किया। उस समय वे गरुड़की पीठपर सवार थे। लक्ष्मीजी उनपर चँवर डुला रही थीं। वे शङ्ख, चक्र, गदा आदि अपने (सजीव) आयुधोंसे घिरे हुए थे, और देवर्षि तथा मुनि उनकी वन्दना कर रहे थे। वहाँ पहुँचकर भगवान् विष्णुने 'महात्मन् ! समाधिका त्याग करके उठो' यों कहते हुए अपना पाञ्चजन्य शङ्ख बजाया, जिसकी ध्वनिसे सारी दिशाएँ गूँज उठीं। विष्णु-भगवान्‌के बलपूर्वक फूँकनेसे उस शङ्खसे ऐसा घोर शब्द प्रकट हुआ, जो प्रलयकालमें एक साथ परिक्षुब्ध हुए मेघों और सागरोंकी गर्जनाके समान वेगशाली था। उस शब्दसे भयभीत होकर असुर-समूह भूमिपर गिर पड़े और विष्णुभक्त भयरहित होकर आनन्दपूर्वक हर्ष मनाने लगे। प्रह्लादके शरीरमें प्राण और अपानका संचार होनेसे नाडिविवरोंमें संवेदन आरम्भ हो गया।

फिर तो जैसे वायुसे पीड़ित होकर कमल चञ्चल हो जाता है, उसी तरह उनका शरीर स्पन्दनयुक्त हो गया तथा नेत्र, मन, प्राण और शरीर—सभी विकसित हो गये। इस अवसरपर भगवान् श्रीहरिने ज्यों ही 'जागो' ऐसा कहा, त्यों ही वह सचेत हो गया। तब कल्पके आदिमें जैसे त्रिलोकेश्वर भगवान् कमलयोनि ब्रह्मासे कहते हैं, उसी प्रकार श्रीहरिने प्रह्लादसे—जिसके नेत्र प्रफुल्लित हो गये थे, जिसे 'मैं प्रह्लाद हूँ' ऐसी पहचान हो चुकी थी और जिसकी पूर्वस्मृति सुदृढ़ हो गयी थी—यों कहना प्रारम्भ किया—

'साधो ! अब उठो, शीघ्र उठो और इस विशाल दैत्य-राज्यलक्ष्मीका तथा अपने स्वरूपका स्मरण करो। अनघ ! तुम तो जीवन्मुक्त हो, अतः राज्यशासन करते हुए ही उद्वेगरहित होकर अपने इस शरीरको कल्पान्तपर्यन्त कर्मोंमें प्रेरित करते रहो। प्रलयके समय जब इस शरीरका नाश हो जायगा, तब तुम निरतिशय सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें निवास करोगे—ठीक उसी तरह, जैसे घटके फूट जानेपर घटाकाश महाकाशमें विलीन हो जाता है। तुम्हारी यह शुद्ध देह कल्पान्ततक स्थिर रहनेवाली है, लोकके ऊँच-नीच व्यवहारोंका अनुभव कर चुकी है और जीवन्मुक्तिसे सुशोभित है। मैं गरुडपर सवार होकर स्वेदज, अण्डज, जरायुज, उद्भिज्ज—चारों प्रकारके प्राणियोंसे व्याप्त तथा सूर्य आदिके प्रकाशसे उद्भासित दसों दिशाओंमें विचरता रहता हूँ। ऐसी परिस्थितिमें तुम इस शरीरका

उपशम-प्रकरण ] * भगवान् विष्णुका पातालमें जाना और प्रह्लादको तत्त्वज्ञानका उपदेश देना * २९५

परित्याग मत करो । ये हमलोग हैं । ये पर्वत हैं । ये प्राणी हैं । यह तुम हो । यह जगत् है । यह आकाश है । ये सभी जब प्रलयपर्यन्त रहनेवाले हैं, तब तुम भी तबतक इस शरीरको कायम रक्खो । जिसकी बुद्धि स्वात्मतत्त्वके विचारसे ऊबती नहीं, उस यथार्थदर्शी तत्त्वज्ञानीका जीवन शोभा देता है । जिसका अहम्भाव नष्ट हो गया है और जिसकी बुद्धि स्वार्थमें लिप्त नहीं है तथा जिसका सम्पूर्ण पदार्थोंमें समभाव है, उसका जीवन सुन्दर है । जो राग-द्वेषविहीन अतएव अन्तःशीतल बुद्धिसे साक्षीकी भाँति इस जगत्को देखता है, उसीके जीवनकी शोभा होती है । जो सत्य दृष्टिका अवलम्बन करके वासना-रहित होकर लीलापूर्वक इस जगत्-व्यवहारको करता है, उसका जीवन धन्य है । जो लोकव्यवहार करता हुआ भी न तो अनुकूलकी प्राप्तिसे अन्तःकरणमें प्रसन्नताका अनुभव करता है और न प्रतिकूलकी प्राप्ति होनेपर उद्विग्न होता है, उसीका जीवन प्रशंसनीय है । जिसके गुणोंके सुननेपर, स्वरूपका दर्शन करनेपर और जिसकी याद आ जानेपर प्राणियोंको आनन्द प्राप्त होता है, उसीका जीवन सार्थक है ।

"असुरेश ! इस वर्तमान देहकी स्थिरताको लोग जीवन कहते हैं और देहान्तरकी प्राप्तिके लिये इसके परित्यागको मरण कहा गया है; किंतु महामते ! तुम तो इन दोनों ही जन्म-मरणरूप पक्षोंसे रहित हो, अतएव इस लोकमें वस्तुतः न तो तुम्हारा जन्म है और न मरण ही । शत्रुसूदन ! यह सब तो मैंने तुम्हें समझानेके लिये कहा है । सर्वज्ञ ! तुम्हारा तो न कभी जन्म होता है और न तुम कभी मरते ही हो; क्योंकि तुम तो देहदृष्टिसे सर्वथा रहित हो, इसी कारण देहमें स्थित रहते हुए भी तुम विदेह हो । तुम्हें परमात्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो गया है, अतएव तुम प्रबुद्ध हो गये हो । भला, प्रबुद्ध हुए पुरुषोंका शरीरसे क्या सम्बन्ध है ? यह परिच्छिन्न देह तो केवल अज्ञानियोंकी दृष्टिमें ही है अर्थात् 'देह मैं हूँ' ऐसा अभिमान अज्ञानियोंको ही होता है । तुम्हारी बुद्धि तो सर्वदा एकमात्र परमात्मामें ही लीन रहती है, अतएव तुम चिदाकाशसे संयुक्त हो । इसीलिये सब कुछ तुम्हीं हो । तत्त्वज्ञानी जीवन्मुक्त पुरुष प्रलयकालमें उत्पातसूचक वायुओंके बहनेपर, प्रलयाग्निके धधकने तथा पर्वतोंके ढह जानेपर भी नित्य परमात्मामें ही स्थित रहता है । संसारके सभी प्राणी स्थित रहें अथवा सब-के सब चले जायँ, उनका विनाश हो जाय अथवा उनकी वृद्धि हो, तत्त्वज्ञानी तो परमात्मामें ही स्थित रहता है, उससे विचलित नहीं होता । परमात्मा इस शरीरका विनाश हो जानेपर न तो नष्ट होता है, न इसके वृद्धिगत होनेपर बढ़ता है और न इसके चेष्टा करनेपर चेष्टाशील ही होता है । तब 'इस देहको धारण करनेवाला देही मैं हूँ' चित्तके ऐसे अज्ञानके नष्ट हो जानेपर 'मैं इसका त्याग करता हूँ अथवा नहीं करता' ऐसी निरर्थक कल्पना क्यों उत्पन्न होती है ? तात ! जिन्हें तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो चुकी है, उनके हृदयमें 'मैं इस कार्यको समाप्त करके इसे करूँगा और इसका त्याग करके इसे छोड़ूँगा' ऐसे संकल्पोंका सर्वथा अभाव हो जाता है । ज्ञानी पुरुष इस जगत्में शास्त्रोक्त सारे कर्मोंको करते हुए भी कुछ नहीं करते और उनका कभी भी अनुष्ठान न करनेपर वे सदा अकर्तारूपसे ही स्थित रहते हैं । इस प्रकार संसारमें कर्तृत्व और भोक्तृत्वका उपशम हो जानेपर एकमात्र शान्ति ही शेष रह जाती है और वही शान्ति जब सुदृढ़ हो जाती है, तब विद्वान्लोग उसे मुक्ति नामसे पुकारते हैं । ग्राह्य-ग्राहक सम्बन्धका विनाश होनेपर परम शान्तिका उदय होता है । वही शान्ति जब स्थिरताको प्राप्त हो जाती है, तब मोक्ष नामसे कही जाती है । जिनका चित्त परमात्मामें ही संलग्न है, ऐसे ज्ञानीजन संसारके रमणीय विषयभोगोंके प्राप्त होनेपर न तो प्रसन्न होते हैं और न मनके विपरीत

२९६ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

दुःखोंके आ पड़नेपर उद्विग्न ही होते हैं । अर्थात् सुख-दुःखमें उनकी समान स्थिति रहती है । महात्मन् ! तुम परमात्माके परमपदमें स्थित होकर ब्रह्माके एक दिन ( इस कल्पके अन्त ) तक इस पातालमें ही विविध गुणोंसे युक्त राज्यलक्ष्मीका उपभोग करके अविनाशी परमपदको प्राप्त होओ ।"

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं —रघुनन्दन ! जब जगद्-रूपी रत्नोंके आकर तथा त्रैलोक्यरूपी अद्भुत पदार्थोंको प्रदर्शन करानेवाले भगवान् विष्णुने चन्द्रकिरण-सदृश शीतल वाणीद्वारा इस प्रकार कहा, तब जिसके नेत्र-कमल आनन्दवश प्रफुल्लित हो उठे थे तथा जिसने मननक्रम ग्रहण कर लिया था, उस धैर्यशाली प्रह्लाद नामक देहने हर्षपूर्वक यों कहना आरम्भ किया ।

प्रह्लादने कहा —भगवन् ! आपकी कृपासे मुझे तत्त्वज्ञानद्वारा भलीभाँति स्वरूपावस्थिति प्राप्त हो गयी है, जिससे मैं समाधि अथवा व्युत्थानावस्था—दोनोंमें वास्तविकरूपसे सदा ही सम हूँ । देवाधिदेव ! मैंने चिरकालतक विशुद्ध बुद्धिद्वारा अपने हृदयमें आपका साक्षात्कार किया है । देव ! सौभाग्यकी बात है कि अब पुनः बाहर नेत्रोंसे भी आपका प्रत्यक्ष दर्शन कर रहा हूँ । महेश्वर ! मैं जो समस्त संकल्पोंसे रहित इस अनन्त दृष्टिमें स्थित था, वह शोक, मोह, वैराग्य-चिन्ता, देहत्यागके प्रयोजन अथवा संसारके भयसे नहीं था; क्योंकि जब एक ही विज्ञानानन्दघन परमात्मा सर्वत्र विद्यमान है, तब शोक, हानि, देह, संसार, स्थिति और भय-अभय कहाँसे प्राप्त होंगे । परन्तु परमेश्वर ! 'हाय ! मैं विरक्त हो गया हूँ, अतः इस संसारका त्याग करता हूँ' इस प्रकारकी अज्ञानियोंद्वारा की गयी चिन्ता हर्ष-शोकरूप विकार उत्पन्न करनेवाली होती है । यह सुख है, यह दुःख है; यह मेरा है, यह मेरा नहीं है—यों द्विधाग्रस्त चित्त मूर्खका ही विनाशक होता है, पण्डितका नहीं । मैं अन्य हूँ और यह अन्य है—ऐसी वासना इस जगत्‌में उन अज्ञानी प्राणियोंको ही प्रभावित करती है, जो तत्त्वज्ञानसे बहुत दूर हैं । कमलनयन ! जब सभी प्राणियोंमें आत्मरूपसे आप ही व्याप्त हैं, तब ग्रहण-त्यागके पक्षका अवलम्बन करनेवाली कल्पना कहाँसे हो सकती है । देवेश्वर ! समाधिकालमें तो मैं भाव-अभावसे परे रहकर ग्रहण-त्यागसे रहित था; परन्तु इस समय प्रबुद्ध होकर वही कार्य करनेके लिये उद्यत हूँ, जो आपको रुचिकर है । भगवन् ! आप तो वे ही पुण्डरीकाक्ष नारायण हैं, जिनकी तीनों लोकोंमें पूजा होती है; अतः मेरेद्वारा स्वभावतः प्राप्त हुई पूजाको ग्रहण कीजिये । यों कहकर दानवराज प्रह्लादने उन भुवनाधिपति भगवान् गोविन्दकी—जिनके अंदर त्रिलोकी वर्तमान थी तथा जो शङ्ख-चक्र आदि आयुधों, अप्सरा-समूह, देवगण और पक्षिराज गरुड़के साथ सामने खड़े थे—पूजा की । पूजोपरान्त चरणोंमें पड़े हुए प्रह्लादसे भगवान् लक्ष्मीपतिने कहा ।

श्रीभगवान् बोले—दानवाधीश ! उठो और तबतक इस सिंहासनपर बैठे रहो, जबतक मैं शीघ्र स्वयं अपने हाथसे ही तुम्हारा राज्याभिषेक करता हूँ । साथ ही पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि सुनकर जो ये साध्य, सिद्ध और देवगण यहाँ आये हुए हैं, ये सब-के-सब तुम्हारी मङ्गलकामना करें । यों कहकर कमलनयन भगवान् नारायणने प्रह्लादको सिंहासनपर बैठा दिया । तदनन्तर अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न श्रीहरिने समस्त महर्षि-समुदाय, सारे सिद्धगण, विद्याधर और लोकपालोंको साथ लेकर इन महान् असुर प्रह्लादको आवाहन किये गये क्षीराब्धि आदि महासागरों, गङ्गा आदि सरिताओं और सम्पूर्ण तीर्थोंके जलसे सींचकर दैत्यराज्यको उसी प्रकार अभिषिक्त कर दिया, जैसे पूर्वकालमें देवगणोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए इन्द्रका स्वर्गलोकके राज्यपर अभिषेक किया था । उस समय अभिषिक्त हुए प्रह्लादकी देवता और असुर—

उपशम-प्रकरण ] * भगवान् विष्णुका पातालमें जाना और प्रह्लादको तत्त्वज्ञानका उपदेश देना * २९७

सभी स्तुति कर रहे थे। तब सुरासुरवन्दित भगवान् मधुसूदन उनसे इस प्रकार बोले।

श्रीभगवान्‌ने कहा—निष्पाप प्रह्लाद ! जबतक सुमेरुगिरि, पृथ्वी तथा सूर्य और चन्द्रमाका मण्डल कायम रहेगा, तबतक तुम राज्य करोगे और तुम्हारे समस्त गुणोंकी प्रशंसा होगी। तुम राग, भय और क्रोधसे रहित होकर इष्ट-अनिष्ट फलोंका परित्याग करके समतायुक्त बुद्धिसे इस राज्यका भलीभाँति पालन करो। शत्रु-प्रजा आदिके ऊपर निग्रह-अनुग्रह आदि यथावसर प्राप्त हुई दृष्टियोंसे देश, काल और क्रियाके अनुरूप प्राप्त हुए कर्तव्यका तुम न्यायपूर्वक पालन करो और राग-द्वेष आदि विषमताका त्याग करके समबुद्धि बने रहो। आत्मा देहसे अतिरिक्त है—इस भावसे लाभ-हानिमें सम तथा इदंता ममतासे रहित कार्य करते हुए भी तुम इस जगत्‌में बन्धनको नहीं प्राप्त होओगे। जगद् व्यवहारको तो तुमने देख ही लिया है और उस अनुपम परमपदका अनुभव भी तुम्हें प्राप्त हो गया है। इस प्रकार तुम्हें देश-कालानुरूप सभी वस्तुएँ ज्ञात हैं। अब दूसरा और क्या उपदेश दिया जाय। अर्थात् व्यवहार और परमार्थ—दोनोंमें तुम कुशल हो, अतः अब तुम्हें उपदेशकी आवश्यकता नहीं है। राग, भय और क्रोधसे रहित तुम्हारे राजा होनेपर अब देवताओं-द्वारा प्राप्त दुःख न तो असुरोंमें टिक सकेगा और न उनका संहार ही कर सकेगा। आजसे देवताओं और दानवोंका युद्ध नहीं होगा, जिससे जगत् स्वस्थ हो जायगा।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—वत्स राम ! प्रह्लादसे ऐसा कहकर कमलनयन भगवान् नारायण देवता, किन्नर और मनुष्योंके साथ उस दैत्यसदनसे चल पड़े। उस समय प्रह्लाद आदि असुर पीछेसे उनपर अञ्जलि भर-भरकर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे, जिससे गरुडके पंखका पिछला भाग पुष्पोंसे आच्छादित हो गया। इस प्रकार क्रमश चलते हुए वे क्षीरसागरके तटपर जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने देवगणोंको विदा कर दिया और स्वयं शेषशय्यापर स्थित हो गये। इस प्रकार शेषशय्यापर विष्णु, स्वर्गलोकमें देवताओंसहित इन्द्र और पातालमें दानवराज प्रह्लाद—तीनों संतापरहित होकर स्थित हुए। श्रीराम ! प्रह्लादकी ज्ञान-प्राप्ति सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाली तथा अमृतके समान शीतल है। उसका वर्णन मैंने तुम्हें सुना दिया। संसारमें जो मनुष्य—चाहे वे घोर-से घोर पातकी ही क्यों न हों—विवेकपूर्वक उसका विचार करेंगे, वे शीघ्र ही परमपदको प्राप्त हो जायँगे। अज्ञान ही पाप कहलाता है और उस अज्ञानका नाश विवेकपूर्वक विचार करनेसे होता है; इसलिये पापका समूल विनाश करनेवाले विचारका परित्याग नहीं करना चाहिये। प्रह्लादकी इस सिद्धिका विवेक-पूर्वक विचार करनेवाले लोगोंके पूर्वके सात जन्मोंमें किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं—इसमें संशय नहीं है।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! महामनस्वी प्रह्लादका मन तो परमपदमें तल्लीन था, वह पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि सुनकर कैसे प्रबुद्ध हुआ? यह बतानेकी कृपा करें।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—निर्दोष स्वरूपवाले राम ! लोकमें दो प्रकारकी मुक्ति होती है—एक सदेहमुक्ति अर्थात् जीवन्मुक्ति और दूसरी विदेहमुक्ति। इन दोनोंका विभाग इस प्रकार है, सुनो। जिस अनासक्त बुद्धिवाले पुरुषकी इष्टानिष्ट कर्मोंके ग्रहण-त्यागमें अपनी कोई इच्छा नहीं रहती अर्थात् जिसकी इच्छाका सर्वथा अभाव हो गया है, ऐसे पुरुषकी स्थितिको तुम जीवन्मुक्त-अवस्था—सदेहमुक्ति समझो। फिर देहका विनाश होनेपर पुनर्जन्मसे रहित हुई वही जीवन्मुक्ति विदेहमुक्ति कही गयी है। श्रीराम ! जिन्हें विदेहमुक्तिकी प्राप्ति हो गयी है, वे फिर जन्म धारण करके दृश्यताको नहीं प्राप्त होते—ठीक उसी तरह, जैसे भुना हुआ

२९८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बीज जमता नहीं है । महाबाहु राम ! प्रह्लादके अन्तःकरणमें शुद्ध सत्त्वमयी वासना स्थित थी, वह शङ्खध्वनि होते ही उद्बुद्ध हो उठी । अपनी उसी वासनासे प्रह्लादको बोध प्राप्त हुआ था । श्रीहरि ही समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये उनके मनमें जैसा संकल्प होता है, वह शीघ्र ही उसी रूपमें मूर्त हो जाता है; क्योंकि परमात्मा ही सबके कारण हैं । भगवान् वासुदेवने ज्यों ही ऐसा संकल्प किया कि प्रह्लाद प्रबुद्ध हो जाय, त्यों ही वह क्षणमात्रमें उठ बैठा । अर्थात् भगवान्‌के संकल्पसे ही प्रह्लाद पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनिसे प्रबुद्ध हो गया । भगवान् वासुदेवने निजी स्वार्थके बिना ही प्राणियोंके कल्याणके हेतु अपने आत्मामें ही जगत्‌की सृष्टिके लिये विष्णुरूपसे शरीर धारण किया है । परमात्माके साक्षात्कारसे शीघ्र ही भगवान् माधवका दर्शन प्राप्त हो जाता है और उन माधवकी आराधनासे शीघ्र ही निर्गुण-निराकार परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है ।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! आप तो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं; अतः आपके शुद्ध वचनरूपी किरणोंसे हम उसी प्रकार आह्लादित हुए हैं, जैसे चन्द्रमाकी रश्मियोंके स्पर्शसे अनाजके पौधे प्रफुल्लित हो जाते हैं । परंतु गुरुदेव ! यदि पुरुषार्थपूर्वक प्रयत्न करनेसे ही सब कुछ प्राप्त हो जाता है तो भगवान् माधवके वरदान बिना प्रह्लाद अपने पुरुषार्थसे ही क्यों नहीं प्रबुद्ध हुआ ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! महामनस्वी प्रह्लाद-ने जिन-जिन पदार्थोंको प्राप्त किया था, वे सभी उसे अपने पुरुषार्थसे ही मिले थे । उनकी प्राप्तिमें दूसरा कोई कारण नहीं है । ( क्योंकि प्रह्लादने परम पुरुषार्थसे जो भक्ति की, उसीसे भगवान्‌ने उनको वर दिया; इसलिये भगवान्‌का वर मिलना भी अपना पुरुषार्थ ही है । ) जो विष्णु है, वही सबका आत्मा है और जो सबका आत्मा है, वही विष्णु है । इस प्रकार पुष्प और उसकी सुगन्धकी भाँति आत्मा और नारायण भिन्न नहीं हैं । पहले-पहल प्रह्लाद नामक आत्मा ही अपने-आप अपनी परम शक्तिसे ही विष्णुभक्तिमें नियुक्त हुआ । फिर उसने आत्मभूत विष्णुमे ही स्वयं यह वर प्राप्त किया और स्वयं ही अपने मनको विचारशील बनाकर स्वयं ही आत्मज्ञान प्राप्त किया । इस प्रकार कभी तो आत्मा अपने आप ही अपनी शक्तिसे प्रबुद्ध हो जाता है और कभी भक्तिरूपी प्रयत्नसे प्राप्त होनेवाले विष्णुरूपसे प्रबोधित किया जाता है । इसलिये किसीको जहाँ-कहीं भी जो कुछ प्राप्त होता है, वह सब उसे अपनी सामर्थ्यरूप प्रयत्नसे ही मिलता है; कहीं भी किसी अन्य कारणसे उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती ।

( सर्ग ३९-४९ )


मायाचक्रका निरूपण, चित्तनिरोधकी प्रशंसा, भगवत्प्राप्तिकी महिमा, मनकी सर्प और विषवृक्षसे तुलना, उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जो भगवत्प्राप्तिके साधनरूप सम्पूर्ण अङ्गोंका उच्छेदक तथा यों वेगपूर्वक घूमता रहता है, उस मायाचक्रका निरोध कैसे किया जाय ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! यह संसाररूपी मायाचक्र नित्य भ्रमणशील तथा भ्रान्तिदायक है। तुम चित्तको इस चक्रकी महानाभि समझो । जब पुरुष प्रयत्नपूर्वक बुद्धिद्वारा इस चित्तको स्तम्भित कर देता है, तब जिसकी नाभि पकड़ ली गयी है, ऐसा यह मायाचक्र शीघ्र ही आगे बढ़नेसे रुक जाता है । इस चित्त-निरोधरूपी युक्ति के बिना आत्माको अनन्त दुःखोंकी प्राप्ति हो रही है, परंतु इस उपर्युक्त दृष्टिके प्राप्त होनेपर तुम सारे-के-सारे दुःखोंको क्षणमात्रमें नष्ट हुआ ही

उपशम-प्रकरण ] * मायाचक्रका निरूपण, चित्तनिरोधकी प्रशंसा, भगवत्प्राप्तिकी महिमा * २९९


समझो। यह संसार एक महाभयंकर रोग है। चित्त-निरोध ही इस रोगकी परमोत्तम औषध है। इस औषधके अतिरिक्त अन्य किसी प्रयत्नसे उस व्याधिकी शान्ति नहीं होती। जैसे घड़ेके भीतर घटाकाश रहता है, परन्तु घड़ेके नष्ट होनेपर घटाकाश नहीं रह जाता, उसी तरह यह संसार चित्तके अंदर ही है, अतः चित्तका नाश होनेपर संसार भी विनष्ट हो जाता है। यह चित्त जब भूत और भविष्यके पदार्थोंका चिन्तन न करके वर्तमान समयका बाह्य बुद्धिद्वारा अनायास ही उपयोग करने लगता है, उसी क्षण अचित्तताको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि चित्तकी वृत्तियाँ तभीतक रहती हैं जबतक संकल्पकी कल्पना बनी रहती है—ठीक उसी तरह, जैसे जबतक मेघका विस्तार रहता है, तभीतक आकाशमें जलके अणु वर्तमान रहते हैं। संकल्प-कल्पना भी तभीतक रहती है, जबतक चेतन जीवात्मा मनके साथ है। रघुनन्दन ! यदि ऐसी भावना की जाय कि चेतन जीवात्मा मनसे पृथक् है तो जैसे सिद्ध पुरुषोंमें मूल अविद्यासहित वासनाओंका ज्ञानद्वारा जलकर अत्यन्ताभाव हो जाता है, उसी तरह तुम अपने संसारके मूलों—वासनाओंको मूलाविद्यासहित जलकर भस्म हुआ ही समझो। चित्तसे शून्य हुआ चेतन प्रत्यक्‌चेतनं अर्थात् शुद्ध आत्मा कहा जाता है। वास्तवमें तो निर्मनस्क रहना उसका स्वभाव ही है; क्योंकि उसमें संकल्परूपी मल नहीं है। वह शुद्ध आत्मा ही वास्तवमें सत्यता है; वही कल्याणरूपता सच्चिदानन्द परमात्माकी प्राप्तिरूप अवस्था, सर्वज्ञता और वास्तविक दृष्टि है। किंतु जिस समय उसका विनाशशील मनके साथ संयोग बना रहता है, उस समय उसकी उपर्युक्त स्थिति नहीं रहती; क्योंकि जहाँ मन रहता है, वहाँ उसके संनिकट अनेक प्रकारकी आशाएँ और सुख-दुःख उसी प्रकार सदा आते रहते हैं, जैसे श्मशानभूमिमें कौए मँडराया करते हैं। परंतु जब परमार्थ वस्तुरूप परमात्माके तत्त्वका ज्ञान हो जाता है, तब उस पुरुषके मनके संकल्पमें आशा आदि सम्पूर्ण भावोंकी व्यवस्थापिका संसाररूपी लताका बीज उत्पन्न ही नहीं होता; क्योंकि उस समय उसका मन भुने हुए बीजके समान हो जाता है। शास्त्राध्ययन और सज्जनोंकी संगतिका निरन्तर अभ्यास करनेसे सांसारिक पदार्थोंकी अवास्तविकताका ज्ञान होता है, अर्थात् जगत्‌के पदार्थ वास्तवमें असत् हैं—ऐसा अनुभव होता है। इसलिये निश्चयपूर्वक परम प्रयत्नके साथ मनको अविवेकसे हटाकर उसे बलात्कारसे शास्त्राध्ययन और सत्पुरुषोंके सङ्गमें लगाना चाहिये; क्योंकि परमात्माका साक्षात्कार होनेमें, शुद्ध आत्मा ही प्रधान कारण है।

श्रीराम ! अपना आत्मा ही अपनेद्वारा अनुभूत दुःखोंको त्याग देनेकी इच्छा करता है, अतएव परमात्माका साक्षात्कार होनेमें एकमात्र शुद्ध आत्मा ही मुख्य हेतु कहा गया है। इसलिये तुम बोलते हुए, त्याग करते हुए, ग्रहण करते हुए तथा आँखोंको खोलते और मींचते हुए भी अचिन्त्य, अनन्त, नित्यविज्ञानानन्दघन परमात्मामें स्थित रहो। इसी प्रकार बाल्य, यौवन और वृद्धावस्थामें, दुःखोंमें, सुखोंमें तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थाओंमें तुम सदा-सर्वदा अपने वास्तविक सच्चिदानन्द-स्वरूपमें बने रहो। जो आत्मज्ञानसम्पन्न एवं अमृतस्वरूप परमार्थ-तत्त्वका अनुभव करनेवाला है, उसके लिये हलाहल विष भी अमृतके समान फलदायक हो जाता है। जिस समय निर्मल एवं अखण्ड चैतन्यका ज्ञान नहीं रहता, उस समय संसाररूपी भ्रमका कारणस्वरूप महामोह वृद्धिको प्राप्त होता है और जब उस निर्मल एवं अखण्ड सच्चिदानन्दघन परमात्मामें दृढ़ स्थिति हो जाती है, तब संसार-भ्रमका कारणभूत मोह सर्वथा विनष्ट हो जाता है। श्रीराम ! जो अद्वितीय आनन्दरूप ब्रह्ममें स्थित होकर अपने विज्ञानानन्दघन स्वरूपका साक्षात्कार करनेवाला है, उसके लिये खादिष्ट रसायन

३०० * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भी तृण-तुल्य हो जाता है। परमात्माके तत्त्वको जानने- वाला महापुरुष समस्त प्रकाशोंमें, सभी प्रभावोंमें, समस्त बलवानोंमें, सम्पूर्ण महान् व्यक्तियोंमें तथा सभी उन्नतिशाली मनुष्योंमें परम उन्नत होता है। जिस परमात्माकी प्रभासे सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, मणि और तारे आदि प्रकाशित होते हैं, उस जगदीश्वरका जिन महापुरुषोंको ज्ञान हो गया है, वे भी सूर्यादिकी भाँति जगत्‌में सुशोभित होते हैं। परंतु श्रीराम ! जो मानव परमात्मविषयक ज्ञानसे हीन हैं, वे पृथ्वीके दरारोंमें रहनेवाले कीड़ों, गदहों एवं अन्य तिर्यग्योनिमें उत्पन्न हुए जीवोंसे भी अत्यन्त तुच्छ माने जाते हैं। आत्मज्ञान- विहीन पुरुषकी सारी चेष्टाएँ दुःखदायिनी होती हैं। वह भूतलपर चलता-फिरता हुआ भी मुर्दा ही है। इसलिये आत्मज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह भोगोंके रसोंमें आसक्त न होते हुए उनके उपभोगके तिरस्कारद्वारा मनको अत्यन्त सूखे हुए पत्तेके समान समयानुसार धीरे-धीरे कृश बना डाले; क्योंकि यह मन अनात्मामें आत्मभाव, देहमात्रमें ऐसी आस्था, पुत्र, कलत्र और कुटुम्बकी ममता, अहंकारके विकास, ममतारूपी मलमें सने रहना, 'यह मेरा है' ऐसी भावना, जरा-मरणरूपी दुःख, व्यर्थ ही उन्नतिको प्राप्त हुए काम-क्रोधादि दोषरूपी सर्पोंके विवररूप संसारकी ममता, आधि-व्याधिकी अभिवृद्धि, संसारकी रमणीयतामें विश्वास, हेयोपादेयके प्रयत्न, स्त्री-पुत्र आदिके प्रति स्नेह तथा रत्नों और स्त्रियोंके आपातकमणीय लाभसे उत्पन्न हुए धनके लोभसे स्थूलताको प्राप्त होता है। यह चित्त सर्पके समान है, जो दुराशारूपी दूधके पीनेसे, भोगरूपी वायुके बलसे, आदरप्रदानसे तथा नाना प्रकारके विषयोंमें संचरण करनेसे मोटा-ताजा हो जाता है। आना और जाना—उत्पत्ति विनाश ही जिनका स्वरूप है तथा जो चित्तकी विषमताको सूचित करनेवाले हैं, ऐसे भीषण भोगोंका उपभोग करनेसे चित्त स्थूलभावको प्राप्त हो जाता है।

राघव ! यह चित्त विषवृक्षके समान है, जो चिरकाल- से शरीररूपी बुरे गड्ढेमें उगा हुआ है। आशाएँ ही इसकी विशाल शाखाएँ और विकल्प ही इसके पत्ते हैं। अनेक प्रकारकी चिन्ताएँ ही इसकी लंबी-लंबी मञ्जरियाँ हैं। कामोपभोगोंके समूह ही इसमें खिले हुए पुष्प हैं। यह जरा-मरण और व्याधिरूपी फलोंके भारसे झुका हुआ है। इस पर्वताकार अद्भुत वृक्षको तुम निःशङ्क होकर हठपूर्वक विवेक-विचाररूपी मजबूत आरेसे काट डालो। जबतक इस चित्तरूपी पिशाचको—जो अज्ञानरूपी विशालवटवृक्षोंपर विश्राम करनेवाला है, तृष्णा-पिशाची जिसकी परिचर्या करती है और जो चेतनरहित सैकड़ों देह धारण करके अपनी कल्पनारूपी अटवीमें चिरकालसे भटक रहा है—विवेक, वैराग्य, गुरुसन्निधि, प्रयत्न और मन्त्र आदि स्वतन्त्र उपायोंद्वारा चेतन जीवात्माके निवास- स्थानरूप अपने हृदयसे हटाया नहीं जायगा, तबतक इस जगत्‌में आत्मसिद्धिकी प्राप्ति कैसे हो सकती है।

रघुनन्दन ! मेरे वाक्योंके एकमात्र तत्त्वज्ञ तो तुम्हीं हो, इसीलिये केवल मेरे वाक्यार्थोंकी भावनासे तुम्हें सुख मिलना है। वत्स राम ! पूर्वकालमें उद्दालक मुनिको पञ्च महाभूतोंके विचार विमर्शसे जिस प्रकार परमोत्कृष्ट एवं अविनाशी दृष्टि प्राप्त हुई थी, वह वृत्तान्त तुम्हें कहता हूँ; सुनो। प्राचीनकालमें पर्वतराज गन्धमादनके किसी भूभागमें एक ऊँचे शिखरपर एक मुनि निवास करते थे। उनका नाम उद्दालक था। अभी उनकी जवानी नहीं आयी थी। वे स्वाभिमानी और महाबुद्धिमान् थे तथा मौन रहकर घोर तपस्यामें संलग्न थे। पहले तो उनकी बुद्धि मन्द थी। उनमें विवेक-विचार भी नहीं था। उन्हें परमपदरूप शान्तिकी प्राप्ति भी नहीं हुई थी तथा वे परमात्माके तत्त्वसे भी अनभिज्ञ थे; परंतु उनका अन्तःकरण शुभ भावोंसे युक्त था। तदनन्तर तपस्या, नियमपूर्वक शास्त्रार्थ-चिन्तन और अभ्यासके पाकरूप कर्मोंसे उनके हृदयमें विवेक जाग उठा। उनका मन तो शुद्ध था ही, अतः उनकी बुद्धि इस

उपशम-प्रकरण ] * उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन * ३०१

संसाररूपी रोगको देखकर भयभीत हो उठी। तब वे किसी समय एकान्तमें बैठकर इस प्रकार विचार करने लगे—

‘जिसमें विश्राम प्राप्त हो जानेपर शोकका अत्यन्ताभाव हो जाता है तथा जिसे पा लेनेपर पुनर्जन्म नहीं होता, वह प्राप्त करने योग्य प्रधान वस्तु क्या है ! मैं मननरहित परम पवित्र पदमें चिरकालके लिये कब विश्रामको प्राप्त होऊँगा ? जैसे कलोल करती हुई चञ्चल तरङ्गे समुद्रमें ही विलीन हो जाती हैं, उसी तरह भोगतृष्णाएँ कब मेरे अंदर ही शान्त हो जायँगी ? कब मैं परमपदमें विश्राम-को प्राप्त हुई अपनी बुद्धिद्वारा ‘यह कार्य करके पुनः इस दूसरे कार्यको भी करना है’ ऐसी व्यर्थ कल्पनाका भीतर-ही-भीतर उपहास करूँगा ? मेरे मनमें स्थित हुए भी विकल्प-समूह कमलदलपर पड़े हुए जलकी तरह सम्बन्धरहित होकर कब चित्तसे विलग हो जायँगे ? अर्थात् संकल्प-विकल्पोंका अभाव कब होगा ? मैं उन्मत्त होकर बहनेवाली तृष्णा-नदीको, जो बहुसंख्यक भीषण

तरङ्गोंसे युक्त है, अपनी परमोत्कृष्ट बुद्धिरूपी नौकासे कब पार कर जाऊँगा ? मैं जगत्के प्राणियोंद्वारा की जानेवाली इस बाह्य प्रवृत्तिको, जो मिथ्या तथा चित्तको व्यग्र कर देनेवाली है, बालकोंकी क्रीड़ाके समान समझकर कब उसका उपहास करूँगा ? मेरा मन, जो विकल्पोंसे विक्षिप्त तथा हिंडोलेकी तरह चञ्चल है, कब शान्ति लाभ करेगा ? मेरा अन्तःकरण परमात्माके समान आकारवाला, सौम्य और सम्पूर्ण पदार्थोंकी स्पृहासे रहित होकर कब शान्तिको प्राप्त होगा ? वह दिन कब होगा, जब मैं अपनी शान्त हुई कल्पनाओंवाली बुद्धिद्वारा बाहर-भीतरसहित इस सम्पूर्ण विश्वको सच्चिदानन्द-रूपसे देखता हुआ अनुभव करूँगा ? कब मैं इष्ट और अनिष्ट तथा हेय और उपादेयसे रहित एवं स्वयंप्रकाश-स्वरूप परमपदमें स्थित होकर अपने अन्तःकरणमें परम शान्तिको प्राप्त होऊँगा ? ऐसा सुअवसर कब आयेगा, जब मैं किसी पर्वतकी कन्दरामें निर्विकल्प-समाधिद्वारा मनके व्यापारसे रहित होकर शिलाकी भाँति निश्चल हो जाऊँगा ? मौनव्रत धारण करके अविचल ध्यानमें निमग्न हुए मेरे मस्तकपर वनकी चिड़ियाँ कब घोंसला बनायेंगी ?’

यों चिन्तापरवश हुए उद्दालक मुनिने वनमें स्थित होकर बारंबार ध्यानका अभ्यास किया, परंतु विषय उनके बंदरके समान चञ्चल चित्तको अपनी ओर खींच ले जाते थे; जिससे प्रसन्नता प्रदान करनेवाली समाधिस्थिरता उन्हें न मिल सकी। उनका मन कभी-कभी विषयासक्त हो जाता था; उस अवस्थामें वह अपने हृदयान्तर्वर्ती तमोगुणका त्याग करके भयभीत पक्षीकी भाँति वहाँसे भाग निकलता था। कभी वह बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंके चिन्तनका परित्याग करके तमोगुणमें लीन होकर निद्रारूपी लंबे कालतक रहनेवाली स्थितिको प्राप्त हो जाता था। यद्यपि वे प्रतिदिन भयानक गुफाओंमें बैठकर अपने मनको ध्यानमग्न करनेमें तत्पर

३०२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


थे, फिर भी ध्यानवृत्तियोंमें विघ्न पड़नेके कारण उनका अन्तःकरण अत्यन्त व्याकुल हो गया और शरीर तुच्छ तृष्णा-नदीके तटवर्ती तरङ्गोंके थपेड़ोंसे चञ्चल हो उठा। इस प्रकार जब वे मुनि संकटापन्न हो गये, तब विक्षिप्तचित्त होकर उस पर्वतपर भ्रमण करने लगे।

रघुकुलभूषण राम ! तदनन्तर धर्मात्मा उद्दालक बहुत अन्वेषणके पश्चात् प्राप्त हुई गन्धमादनकी एक रमणीय गुहामें प्रविष्ट हुए। यहाँ उन्होंने न मुरझाये हुए कोमल पत्तोंका एक आसन बनाया, जिसके चारों ओर पुष्पोंके गुच्छे शोभा पा रहे थे। उस आसनके ऊपर उन्होंने एक सुन्दर मृगचर्म फैला दिया। तत्पश्चात् शुद्ध अन्तःकरणवाले उद्दालक अपने मनकी वृत्तियोंको सूक्ष्म बनाते हुए उस आसनपर विराजमान हुए। वहाँ उन्होंने उत्तराभिमुख होकर दोनों एड़ियोंसे अण्डकोषोंको दबाकर ज्ञानीकी भाँति सुदृढ़ पद्मासन लगाया। वे विषयोंकी ओर दौड़ते हुए अपने मनरूपी मृगको वासनाओंसे हटाकर निर्विकल्प समाधिमें स्थित होना चाहते थे, इसलिये विचार करने लगे—

'अरे मूर्ख मन ! इन सांसारिक वृत्तियोंसे तेरा क्या प्रयोजन है ? क्योंकि बुद्धिमान् लोग ऐसी क्रियाके लिये चेष्टा नहीं करते, जो परिणाममें दुःखदायिनी हो। जो शान्तिप्रद उपरतिरूपी रसायनको छोड़कर विषयभोगोंके पीछे दौड़ता है, वह मानो मन्दार-वनका परित्याग करके विषवृक्षोंसे भरे हुए जंगलकी ओर जा रहा है। तू चाहे पातालमें चला जा अथवा ब्रह्मलोकमें ही क्यों न पहुँच जा किंतु शान्तिप्रद उपरतिरूपी अमृतके बिना तुझे निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती। रे मन ! तू सैकड़ों भोगाशाओंसे परिपूर्ण होनेके कारण इस प्रकार समस्त दुःखोंका प्रदाता बना हुआ है, अतः इन दुःखदायिनी भोगाशाओंका सर्वथा परित्याग करके अत्यन्त सुन्दर परम ऐकान्तिक कल्याणस्वरूप परमात्माको प्राप्त कर ले। ये उत्पत्ति-विनाशमयी विचित्र कल्पनाएँ तो तुझे भयानक दुःख देनेवाली ही हैं, इनसे कभी सुखकी प्राप्ति नहीं हो सकती। अरे मूर्ख ! तू व्यर्थ बहिर्मुखतारूप उत्थानसे वृद्धिको प्राप्त हुई श्रोत्रेन्द्रियके वशीभूत होकर सांसारिक रसिक-गानका अनुसरण करनेवाली बुद्धिवृत्ति-द्वारा व्याधके वीणा-गीत आदिसे मोहित हुए मृगके समान विनाशको मत प्राप्त हो। मन्दबुद्धे ! जैसे हथिनीके स्पर्शसुखका लोभी गजेन्द्र शिकारियोंद्वारा बाँध लिया जाता है, उसी तरह तू भी सुन्दरी युवतीके स्पर्श-सुखका अनुभव करनेके लिये उन्मुख हुई बुद्धिवृत्तिसे केवल दुःखके लिये ही त्वगिन्द्रियका आश्रय लेकर बन्धनमें मत पड़। रे अंधे ! परिणाममें दुःख देनेवाले स्वादिष्ट अन्नोंकी अभिलाषासे रसनेन्द्रियताको प्राप्त होकर बंसीमें लगे हुए चारेके लोभी मत्स्यकी भाँति तू अपना विनाश मत कर। मूढ ! तू युवती स्त्री, बालक, बालिका आदि नाना प्रकारके सुन्दर दृश्योंको देखनेमें तत्पर हुई चक्षुरिन्द्रियका अवलम्बन करके प्रकाशके लोलुप फतिंगेके समान जलनको मत प्राप्त हो। जैसे गन्धलोलुप