संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन * ३०१
संसाररूपी रोगको देखकर भयभीत हो उठी। तब वे किसी समय एकान्तमें बैठकर इस प्रकार विचार करने लगे—
‘जिसमें विश्राम प्राप्त हो जानेपर शोकका अत्यन्ताभाव हो जाता है तथा जिसे पा लेनेपर पुनर्जन्म नहीं होता, वह प्राप्त करने योग्य प्रधान वस्तु क्या है ! मैं मननरहित परम पवित्र पदमें चिरकालके लिये कब विश्रामको प्राप्त होऊँगा ? जैसे कलोल करती हुई चञ्चल तरङ्गे समुद्रमें ही विलीन हो जाती हैं, उसी तरह भोगतृष्णाएँ कब मेरे अंदर ही शान्त हो जायँगी ? कब मैं परमपदमें विश्राम-को प्राप्त हुई अपनी बुद्धिद्वारा ‘यह कार्य करके पुनः इस दूसरे कार्यको भी करना है’ ऐसी व्यर्थ कल्पनाका भीतर-ही-भीतर उपहास करूँगा ? मेरे मनमें स्थित हुए भी विकल्प-समूह कमलदलपर पड़े हुए जलकी तरह सम्बन्धरहित होकर कब चित्तसे विलग हो जायँगे ? अर्थात् संकल्प-विकल्पोंका अभाव कब होगा ? मैं उन्मत्त होकर बहनेवाली तृष्णा-नदीको, जो बहुसंख्यक भीषण
तरङ्गोंसे युक्त है, अपनी परमोत्कृष्ट बुद्धिरूपी नौकासे कब पार कर जाऊँगा ? मैं जगत्के प्राणियोंद्वारा की जानेवाली इस बाह्य प्रवृत्तिको, जो मिथ्या तथा चित्तको व्यग्र कर देनेवाली है, बालकोंकी क्रीड़ाके समान समझकर कब उसका उपहास करूँगा ? मेरा मन, जो विकल्पोंसे विक्षिप्त तथा हिंडोलेकी तरह चञ्चल है, कब शान्ति लाभ करेगा ? मेरा अन्तःकरण परमात्माके समान आकारवाला, सौम्य और सम्पूर्ण पदार्थोंकी स्पृहासे रहित होकर कब शान्तिको प्राप्त होगा ? वह दिन कब होगा, जब मैं अपनी शान्त हुई कल्पनाओंवाली बुद्धिद्वारा बाहर-भीतरसहित इस सम्पूर्ण विश्वको सच्चिदानन्द-रूपसे देखता हुआ अनुभव करूँगा ? कब मैं इष्ट और अनिष्ट तथा हेय और उपादेयसे रहित एवं स्वयंप्रकाश-स्वरूप परमपदमें स्थित होकर अपने अन्तःकरणमें परम शान्तिको प्राप्त होऊँगा ? ऐसा सुअवसर कब आयेगा, जब मैं किसी पर्वतकी कन्दरामें निर्विकल्प-समाधिद्वारा मनके व्यापारसे रहित होकर शिलाकी भाँति निश्चल हो जाऊँगा ? मौनव्रत धारण करके अविचल ध्यानमें निमग्न हुए मेरे मस्तकपर वनकी चिड़ियाँ कब घोंसला बनायेंगी ?’
यों चिन्तापरवश हुए उद्दालक मुनिने वनमें स्थित होकर बारंबार ध्यानका अभ्यास किया, परंतु विषय उनके बंदरके समान चञ्चल चित्तको अपनी ओर खींच ले जाते थे; जिससे प्रसन्नता प्रदान करनेवाली समाधिस्थिरता उन्हें न मिल सकी। उनका मन कभी-कभी विषयासक्त हो जाता था; उस अवस्थामें वह अपने हृदयान्तर्वर्ती तमोगुणका त्याग करके भयभीत पक्षीकी भाँति वहाँसे भाग निकलता था। कभी वह बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंके चिन्तनका परित्याग करके तमोगुणमें लीन होकर निद्रारूपी लंबे कालतक रहनेवाली स्थितिको प्राप्त हो जाता था। यद्यपि वे प्रतिदिन भयानक गुफाओंमें बैठकर अपने मनको ध्यानमग्न करनेमें तत्पर