भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३०२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


थे, फिर भी ध्यानवृत्तियोंमें विघ्न पड़नेके कारण उनका अन्तःकरण अत्यन्त व्याकुल हो गया और शरीर तुच्छ तृष्णा-नदीके तटवर्ती तरङ्गोंके थपेड़ोंसे चञ्चल हो उठा। इस प्रकार जब वे मुनि संकटापन्न हो गये, तब विक्षिप्तचित्त होकर उस पर्वतपर भ्रमण करने लगे।

रघुकुलभूषण राम ! तदनन्तर धर्मात्मा उद्दालक बहुत अन्वेषणके पश्चात् प्राप्त हुई गन्धमादनकी एक रमणीय गुहामें प्रविष्ट हुए। यहाँ उन्होंने न मुरझाये हुए कोमल पत्तोंका एक आसन बनाया, जिसके चारों ओर पुष्पोंके गुच्छे शोभा पा रहे थे। उस आसनके ऊपर उन्होंने एक सुन्दर मृगचर्म फैला दिया। तत्पश्चात् शुद्ध अन्तःकरणवाले उद्दालक अपने मनकी वृत्तियोंको सूक्ष्म बनाते हुए उस आसनपर विराजमान हुए। वहाँ उन्होंने उत्तराभिमुख होकर दोनों एड़ियोंसे अण्डकोषोंको दबाकर ज्ञानीकी भाँति सुदृढ़ पद्मासन लगाया। वे विषयोंकी ओर दौड़ते हुए अपने मनरूपी मृगको वासनाओंसे हटाकर निर्विकल्प समाधिमें स्थित होना चाहते थे, इसलिये विचार करने लगे—

'अरे मूर्ख मन ! इन सांसारिक वृत्तियोंसे तेरा क्या प्रयोजन है ? क्योंकि बुद्धिमान् लोग ऐसी क्रियाके लिये चेष्टा नहीं करते, जो परिणाममें दुःखदायिनी हो। जो शान्तिप्रद उपरतिरूपी रसायनको छोड़कर विषयभोगोंके पीछे दौड़ता है, वह मानो मन्दार-वनका परित्याग करके विषवृक्षोंसे भरे हुए जंगलकी ओर जा रहा है। तू चाहे पातालमें चला जा अथवा ब्रह्मलोकमें ही क्यों न पहुँच जा किंतु शान्तिप्रद उपरतिरूपी अमृतके बिना तुझे निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती। रे मन ! तू सैकड़ों भोगाशाओंसे परिपूर्ण होनेके कारण इस प्रकार समस्त दुःखोंका प्रदाता बना हुआ है, अतः इन दुःखदायिनी भोगाशाओंका सर्वथा परित्याग करके अत्यन्त सुन्दर परम ऐकान्तिक कल्याणस्वरूप परमात्माको प्राप्त कर ले। ये उत्पत्ति-विनाशमयी विचित्र कल्पनाएँ तो तुझे भयानक दुःख देनेवाली ही हैं, इनसे कभी सुखकी प्राप्ति नहीं हो सकती। अरे मूर्ख ! तू व्यर्थ बहिर्मुखतारूप उत्थानसे वृद्धिको प्राप्त हुई श्रोत्रेन्द्रियके वशीभूत होकर सांसारिक रसिक-गानका अनुसरण करनेवाली बुद्धिवृत्ति-द्वारा व्याधके वीणा-गीत आदिसे मोहित हुए मृगके समान विनाशको मत प्राप्त हो। मन्दबुद्धे ! जैसे हथिनीके स्पर्शसुखका लोभी गजेन्द्र शिकारियोंद्वारा बाँध लिया जाता है, उसी तरह तू भी सुन्दरी युवतीके स्पर्श-सुखका अनुभव करनेके लिये उन्मुख हुई बुद्धिवृत्तिसे केवल दुःखके लिये ही त्वगिन्द्रियका आश्रय लेकर बन्धनमें मत पड़। रे अंधे ! परिणाममें दुःख देनेवाले स्वादिष्ट अन्नोंकी अभिलाषासे रसनेन्द्रियताको प्राप्त होकर बंसीमें लगे हुए चारेके लोभी मत्स्यकी भाँति तू अपना विनाश मत कर। मूढ ! तू युवती स्त्री, बालक, बालिका आदि नाना प्रकारके सुन्दर दृश्योंको देखनेमें तत्पर हुई चक्षुरिन्द्रियका अवलम्बन करके प्रकाशके लोलुप फतिंगेके समान जलनको मत प्राप्त हो। जैसे गन्धलोलुप