संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन * ३०३
भ्रमर सायंकालमें कमल-कोशमें बंद हो जाता है, उसी प्रकार तेल-फुलेल, इत्र, पुष्प आदि सुगन्धित पदार्थोंकी गन्धके अनुभवकी इच्छासे घ्राणेन्द्रियका आश्रय लेकर तू भी शरीररूपी कमल-कोशके भीतर बँध मत जा। मन्दबुद्धे ! मृग शब्दसे, भ्रमर गन्धसे, पतंगा रूपसे, गजेन्द्र स्पर्शसे और मत्स्य रससे—इस प्रकार ये सब तो केवल एक-एक विषयसे नष्ट हो गये; किंतु तू तो इन पाँचों इन्द्रियोंके विषय-भोगरूप अनर्थोंसे व्याप्त है, अतः तुझे सुख कैसे मिल सकता है। यदि तू सांसारिक दोषोंसे रहित, अतएव शरत्कालीन मेघके समान निर्मल अन्तःकरणकी शुद्धिको प्राप्त होकर समस्त अनर्थोंके मूल अज्ञानका उच्छेद करके शान्तिको प्राप्त होगा तो यह तेरी असीम विजय होगी। जैसे जबतक वर्षा ऋतुके मेघ वर्तमान हैं, तबतक कुहरेकी प्रचुरता रहेगी ही, उसी तरह जबतक घनीभूत अज्ञान मौजूद है, तबतक चित्तकी स्थूलताका रहना निश्चित ही है। तथा ज्यों-ज्यों वर्षाकालीन मेघ क्षीण होते जाते हैं, त्यों-त्यों कुहरेका भी विनाश होता जाता है, उसी प्रकार ज्यों ज्यों अज्ञान क्षीण होता जायगा, त्यों-त्यों चित्तकी भी सूक्ष्मता बढ़ती जायगी।
"असत्स्वरूप मन ! मैं अहंकार और वासनाओंसे रहित निर्विकल्प चिन्मय ज्योतिःस्वरूप हूँ और तू अहंकारका बीजस्वरूप है। अतः तुझसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। 'अहं' रूपसे कौन स्थित है ?—इसका मैंने पैरके अँगूठेसे लेकर सिरतक सर्वत्र अन्वेषण किया; किंतु यह 'अहं' नामक पदार्थ मुझे कहीं उपलब्ध नहीं हुआ। इस शरीरमें यह मांस है, यह रक्त है, ये हड्डियाँ हैं, ये श्वासवायु हैं, फिर यह 'अहं' रूपसे स्थित कौन है ? देहमें स्पन्दनांश तो प्राणवायुओंका है, चेतनांश परमात्माका है तथा जरा-मरण शरीरके धर्म हैं; फिर यह 'अहं' क्या वस्तु है ? रे चित्त ! मांस अहंस पृथक् है, रक्त उससे भिन्न है, हड्डियाँ भी दूसरी हैं, चेतनता उससे अन्य है, स्पन्दन भी उससे अलग है; फिर 'अहं' रूपसे स्थित पदार्थ कौन है ? यह नासिका है, यह जिह्वा है, यह त्वचा है, ये दोनों कान हैं, यह आँख है और यह स्पन्दन है; फिर 'अहं' रूपसे स्थित कौन वस्तु है ? परमार्थरूपसे विचार करनेपर न तो मन अहं है न चित्त अहं है और न वासना ही अहं है। आत्मा तो अहं हो ही नहीं सकता, क्योंकि वह तो केवल शुद्ध चेतन प्रकाशस्वरूप है। वस्तुतः तो इस जगत्में जो कुछ दृष्टिगोचर हो रहा है, सर्वत्र मेरा ही स्वरूप है। अथवा विनाशशील असत् होनेके कारण कोई भी पदार्थ मेरा स्वरूप नहीं है--यही दृष्टि सच्ची है, इससे भिन्न दूसरा कोई क्रम नहीं है। परंतु अज्ञानरूपी धूर्त अहंकारके द्वारा चिरकालसे मुझे उसी प्रकार कष्ट दे रहा है, जैसे जंगलमें कोई ढीठ भेड़िया मृगछौनेको क्लेश पहुँचाये। सौभाग्यकी बात है कि अब मैंने उस अज्ञानरूपी चोरको भलीभाँति जान लिया है। वह मेरे स्वरूपरूपी धनका अपहरण करनेवाला है, अतः अब मैं पुनः उसका आश्रय नहीं ग्रहण करूँगा। यह देहमें अहंतारूपी भावना मृगतृष्णाके सदृश व्यर्थ है। जब ऐसी भावना असत्य ही है, तब 'यह देह अहं है' ऐसा जो भाव है, वह केवल भ्रम ही है। किंतु ज्ञानी महात्मा जो वासनाहीन हो गये हैं, वे भी अपने जीवन-निर्वाहके लिये स्वतः बाह्यरूपसे चक्षु आदि इन्द्रियोंद्वारा कर्मोंमें प्रवृत्त होते ही हैं। उनकी इस प्रवृत्तिमें वासना कारण नहीं है। चित्त ! यदि केवल वासनारहित कर्म किया जाय तो भविष्यमें होनेवाले सुख-दुःखका अनुभव नहीं होता। इसलिये मूर्ख इन्द्रियो ! यदि तुम अपनी अन्तर्वासनाका परित्याग करके सम्पूर्ण कर्म करोगी तो तुम्हें दुःखकी प्राप्ति नहीं होगी। निष्पाप ! जैसे तरङ्ग आदि जलसे भिन्न नहीं हैं, उसी तरह ज्ञानी महात्माकी दृष्टिमें ये वासना आदि सभी पदार्थ आत्मासे पृथक् नहीं हैं; किंतु अज्ञानीकी दृष्टिमें उनकी पृथक् सत्ता है। इन्द्रियरूपी बालको ! जैसे रेशमके कीड़े अपनेद्वारा उत्पन्न हुए