संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 343, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ें३०४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तन्तुसे ही नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह तुमलोग भी स्वतः उद्भूत तृष्णाद्वारा विनष्ट हो रहे हो। वासना ही तुमलोगोंको एक जगह बाँधनेमें हेतु है— ठीक उसी तरह, जैसे छिद्रोंमें पिरोयी हुई रज्जु मोतियोंके बन्धनमें कारण होती है। वस्तुतः तो यह वासना कल्पनामात्रसे ही उद्भूत हुई है, अतः यह सत्य नहीं है; क्योंकि संकल्पका त्याग कर देनेसे यह विनष्ट हो जाती है।
"यह चेतन आत्मा सर्वव्यापक सच्चिदानन्दरूप है, अतः इसका जन्म अथवा मरण नहीं होता। फिर कैसे इसकी मृत्यु हो सकती है अथवा कैसे किसीके द्वारा यह मारा जा सकता है। इसका जीवनसे तो कोई प्रयोजन है नहीं; क्योंकि यह सर्वात्मा ही सबका जीवन है। यदि शुद्ध चेतन आत्मा ही सबका जीवन है तो उसे इस जीवनसे कब कौन-सी दूसरी अप्राप्त वस्तु प्राप्त होगी, जिसके लिये उसे जीवनकी इच्छा हो ? जिसका अपनी देहमें अहंभाव है, वही भाव-अभावरूप जन्म-मरणके बन्धनमें पड़ता है; परंतु आत्मन् ! तुम्हारेमें तो देहाहंभाव है नहीं, इसलिये तुम्हें भाव-अभावरूप जन्म-मरण कहाँसे प्राप्त होंगे। अहंकार तो व्यर्थ मोहरूप है, मन मृगतृष्णाके समान है और पदार्थसमूह जड है; ऐसी दशामें अहंभाव किसको हो ? शरीर रक्त-मांसमय है, विवेक-विचारद्वारा मनका विनाश हो गया है और चित्त आदि सभी जड हैं, फिर देहमें अहंभावना किसको कैसे हो ? सभी इन्द्रियाँ नित्य अपने-अपने व्यापारमें संलग्न हैं और जड पदार्थ अपने स्वरूपमें स्थित हैं; फिर किसको और कैसे अहंभाव हो ? गुणोंकी कार्यरूपा इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयोंमें बरत रही हैं, प्रकृति गुणसाम्यावस्थारूप अपने स्वभावमें स्थित है और सच्चिदानन्द ब्रह्म अपने आपमें ही पूर्णरूपसे विराजमान है; फिर देहमें अहंभावना किसको और कैसे हो ? इस प्रकार इस भूतलपर जो कुछ स्थित है, वह सब ब्रह्मस्वरूप ही है। वह 'सत्' (ब्रह्म) मैं ही हूँ और वह 'तत्' (ब्रह्म) भी मैं ही हूँ; फिर मैं व्यर्थ ही शोक क्यों करूँ। जब केवल एक ही सर्वव्यापक विशुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मारूप परमपद सर्वत्र व्याप्त हो रहा है, तब अहंकाररूपी कलङ्ककी उत्पत्ति कहाँसे हो सकती है। वास्तवमें तो पदार्थ-सम्पत्ति है ही नहीं, एकमात्र सर्वव्यापक विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान हो रहा है। अथवा यदि पदार्थ-सम्पत्तिकी सत्ता मान भी लें तो उसके साथ किसीका सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। वस्तुतः तो अहंकाररूपी महान् भ्रम असत्-मिथ्या है; किंतु इसका प्रादुर्भाव होनेपर यह सारा जगत् 'यह मेरा है, यह उसका है' यों व्यर्थ ही विपर्यासको प्राप्त हुआ है। यह आश्चर्यमय अहंकार परमात्माके तत्त्वका यथार्थ ज्ञान न होनेके कारण ही उत्पन्न हुआ है। उस परमात्मतत्त्वके ज्ञात हो जानेपर तो इसका उसी प्रकार विनाश हो जाता है, जैसे सूर्यके तापसे हिमकणिका गल जाती है। इससे सिद्ध हुआ कि परमात्माके अतिरिक्त और किसीकी भी सत्ता नहीं है; इसलिये 'सर्वं ब्रह्म' इस प्रकारका जो मेरा अनुभवसिद्ध तत्त्व है, उसीका मैं चिन्तन करूँगा। मैं तो यही उत्तम समझता हूँ कि आकाशके नीलिमाके सदृश उत्पन्न हुए इस अहंकाररूपी महाभ्रमको ऐसे भुला दिया जाय जिससे पुनः कभी इसका स्मरण ही न हो। मैं चिरकालसे प्राप्त हुए इस मूलाविद्यासहित अहंकाररूपी महाभ्रमका सर्वथा त्याग करके शान्तात्मा होकर विशुद्ध परमात्मामें ही स्थित रहूँगा, जैसे शरत्कालीन आकाश अपने निर्मल स्वभावमें स्थित रहता है। यह अहंभाव जब बढ़ जाता है, तब अनर्थ-परम्पराओंकी सृष्टि करता है, पापका विस्तार करता है और संतापको बढ़ाता है। मरणादि पारलौकिक दुःख पुनर्जन्मतक भोगना पड़ता है एवं जीवन आदि ऐहलौकिक कष्ट मरणपर्यन्त रहता है और वर्तमान कालके पदार्थ विनाशशील हैं; अतः यह दुःखवेदना घोर कष्टप्रद है। दुर्बुद्धिजनोक्त 'यह मुझे मिल गया, अब इसे प्राप्त करूँगा' इस प्रकारकी