भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 344

उपशम-प्रकरण ] * उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन * ३०५


संतापदायिनी पीडा कभी शान्त नहीं होती । अहङ्कारका समूल विनाश हो जानेपर संसाररूपी वृक्ष सूख जाता है । उसकी उत्पादनशक्ति विनष्ट हो जाती है, जिससे वह पाषाणकी भाँति पुनः अङ्कुर उत्पन्न करनेमें असमर्थ हो जाता है ।

देहरूपी वृक्षको अपना निवासस्थान बनाकर रहने-वाली तृणारूपी काली नागिनें हृदयमें विवेक-विचाररूपी गरुड़का आगमन होते ही न जाने कहाँ लुप्त हो जाती हैं । जब विश्व असत्य सिद्ध हो जाता है, तब उससे उत्पन्न होनेवाला सारा-का-सारा भेद-व्यवहार असत्य हो जाता है । इस प्रकार व्यवहारके असत्य हो जानेपर 'अहं'-'त्वं' का भेद-व्यवहार सत्य कैसे रह सकता है । तरङ्गकी भाँति क्षणभङ्गुर एवं विनाशोन्मुख इस देहमें जिनकी आस्था सुदृढ़ हो गयी है, उन दुर्बुद्धियोंका परमार्थसे पतन हो जाता है, क्योंकि देह आदि समस्त वस्तुएँ सर्वत्र उत्पत्तिके पूर्व और विनाशके पश्चात् नहीं रहतीं, केवल मध्यमें ही इनका प्राकट्य दृष्टिगोचर होता है । फिर उनकी मिथ्या स्थिरतामें आस्था कैसी । अर्थात् इन देह आदि विनाशी पदार्थोंको सत्य मानकर उनमें नहीं फँसना चाहिये । जब मन पूर्णतया इस निर्णयपर पहुँच जाता है कि यह जो कुछ विशाल दृश्यमण्डल है, वह सारा का-सारा अवास्तविक है, तब वह अमन—मनके व्यापारसे शून्य हो जाता है । तदनन्तर 'यह अवास्तविक है' ऐसा मनमें दृढ़ निश्चय हो जानेपर सारी भोग-वासनाएँ उसी प्रकार क्षीण हो जाती हैं, जैसे हेमन्त ऋतुमें वृक्षोंकी मञ्जरियाँ झड़ जाती हैं । वास्तवमें न तो कोई किसीका स्वाभाविक शत्रु है और न कोई किसीका स्वाभाविक मित्र ही है; किंतु जो सुख पहुँचानेवाला है, वह मित्र कहा गया है और जो दुःखप्रद हैं, वे शत्रु कहलाते हैं । इसलिये अब मैं मनरूपी वनको, जो सङ्कल्परूपी वृक्षोंसे व्याप्त तथा तृणारूपी लताओंसे आच्छादित है, छिन्न-भिन्न करके विस्तृत मुक्तिरूपी भूमिमें जाकर सुख-पूर्वक विचरण करूँगा । इस प्रकार मनके पूर्णतया क्षीण हो जानेपर रक्त-मांस आदि धातुओंका संघातस्प यह मेरा अनिष्टकारी शरीर चाहे रहे अथवा नष्ट हो जाय, इससे कोई हानि नहीं है । अतः मनका विनाश करना ही आवश्यक है । मैं देह नहीं हूँ—इस विषयमें मैं एक युक्ति बतलाता हूँ, सुनो ! यदि देहको ही आत्मा मान लिया जाय तो मरनेपर शरीरके सभी अङ्गोंके वर्तमान रहनेपर भी मुर्दा शरीर व्यवहार क्यों नहीं करता ? इससे सिद्ध हुआ कि देह आत्मा नहीं है । मैं तो नित्य अविनाशी ज्योतिःस्वरूप हूँ और इस देहसे अतीत हूँ । न तो मैं अज्ञानी हूँ, न मुझे कोई दुःख है, न अनर्थ है और न दुःखका कोई कारण ही है । अब तो यह शरीर रहे अथवा न रहे, इससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है; मैं तो संतापरहित हुआ नित्य स्थित हूँ । मुझे उस परम पदस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति हो चुकी है; इसलिये मैं सबसे उत्कृष्ट, केवल—शुद्धस्वरूप, विक्षेपरहित, शान्तरूप अंशांशीभावसे रहित, अपने आपमें परिपूर्ण, निष्क्रिय एवं इच्छारहित ब्रह्मस्वरूप हूँ । स्वच्छता, प्रभावशालिता, सत्ता, सुहृदयता, सत्यभाषण, यथार्थ ज्ञान, आनन्द-रूपता, शान्ति, सदा मृदुभाषिता, पूर्णता, उदारता, सत्यस्वरूपता, कान्तिमत्ता, एकाग्रता, सर्वात्मकता, निर्भयता और द्वैतके विकल्पका अभाव—ये सभी गुण मुझ आत्मनिष्ठके हृदयको अत्यन्त प्रिय लगनेवाले हैं । चूँकि सर्वरूप परमात्मामें सभी कुछ सर्वदा एवं सर्वथा सम्भव है इसलिये सभी विषयोंके प्रति मेरी इच्छा-अनिच्छा और सुख-दुःख क्षीण हो गये हैं । अब मेरा मोह विनष्ट हो गया है, मन अमनीभावको प्राप्त हो गया है और चित्तके संकल्प-विकल्प दूर हो गये हैं; अतः मैं शान्तस्वरूप परमात्मामें रमण कर रहा हूँ ।

(सर्ग ५०-५३)