संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
महर्षि उद्दालककी साधना, तपस्या और परमात्मप्राप्तिका कथन; सत्ता-सामान्य, समाधि और समाहितके लक्षण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उद्दालक मुनि अपनी विशाल एवं विशुद्ध बुद्धिसे यों निर्णय करके पद्मासन लगाकर बैठ गये। उस समय उनके नेत्र आधे मुँदे हुए थे। तदनन्तर "जो ॐकारका उच्चारण करता है, उसे परमपदकी प्राप्ति हो जाती है; क्योंकि 'ॐ' यह अक्षर परब्रह्म है।" ऐसा निश्चय करके उन्होंने ॐकारका, जिसकी ध्वनि ऊपरको जा रही थी, उसी प्रकार उच्चस्वरसे उच्चारण किया, जैसे घण्टेके अधोभागमें लटके हुए लटकनको अच्छी तरह पीटनेसे जोरका शब्द होता है। उनके द्वारा उच्चारित प्रणवध्वनि जबतक ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त व्याप्त नहीं हो गयी और जबतक वे सर्व-व्यापक, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्माके अभिमुख नहीं हो गये, तबतक 'ॐ' का उच्चारण करते रहे। प्रणवके अकार, उकार, मकार और बिन्दु—इस प्रकार साढ़े तीन अंश हैं। उनमेंसे प्रथम अंश अकारके उच्चस्वरसे उच्चरित होनेपर जब शरीरके भीतर शब्दके गूँजनेके कारण प्राण पूर्णरूपसे क्षुब्ध हो उठे, तब प्राणवायुको छोड़नेके क्रमने जिसे रेचक कहा जाता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण शरीरको रिक्त कर दिया, जैसे महर्षि अगस्त्यने सागरके जलको पीकर उसे खाली कर दिया था। तत्पश्चात् प्रणवके द्वितीय अंश 'उकार' के उच्चारणके समय ॐकारकी समस्थिति होनेपर प्राणोंका निश्चल कुम्भक नामक क्रम सम्पन्न हुआ। उस समय प्राण न बाहर थे न भीतर, न अधोभागमें थे न ऊर्ध्वभागमें और न दिशाओंमें ही भ्रमण कर रहे थे, बल्कि मन्त्र-शक्तिसे स्तम्भित किये गये जलकी तरह पूर्णतः शान्त थे। तदनन्तर प्रणवके उपशान्ति-प्रद तृतीयांश मकारके उच्चारण-कालमें प्राणवायुको भीतर ले जानेके कारण प्राणोंका पूरक* नामक क्रम घटित हुआ। इस तीसरे क्रममें प्राण जीवात्मामें भावनाद्वारा भावित अमृतके मध्यमें पहुँचकर हिमस्पर्शके समान सुन्दर शीतलताको प्राप्त हो गये।
तदुपरान्त पद्मासनसे बैठे हुए उद्दालक मुनिने उस भावनामय शरीरमें दृढ़ स्थिति करके आलानमें बँधे हुए गजराजकी तरह अपनी पाँचों इन्द्रियोंको देहमें निबद्ध कर दिया। फिर वे निर्विकल्प समाधिके लिये तथा शरत्कालीन निर्मल आकाशकी तरह अपने स्वभावको शुद्ध बनानेके हेतु प्रयत्न करने लगे। जब उद्दालक मुनिको उस समाधिसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो गयी, तब वे दृश्य-प्रपञ्चके विकल्पोंसे रहित होकर उस नित्य अनन्त विज्ञानानन्दघन परमात्मामें तद्रूप हो गये, जो जगत्का अधिष्ठानभूत, शुद्धस्वरूप एवं महान् हैं। वे शरीरसे पृथक् होकर किसी अनिर्वचनीय स्थितिको प्राप्त हो गये और नित्य-सत्य-सम-निर्मलरूप होकर आनन्दसागर परमात्मामें विलीन हो गये। उस समय वे वातरहित स्थानमें रखे हुए दीपककी भाँति कान्तिमान्, चित्र-लिखितके सदृश अटल मनवाले, निस्तरङ्ग समुद्रके समान गम्भीर एवं बरसे हुए निर्जल बादलकी तरह मूक हो गये।
* यद्यपि रेचक, कुम्भक और पूरक समग्र प्रणवके ही साधन प्रसिद्ध हैं; तथापि रेचकमें प्रथम भागका, कुम्भकमे मध्यभागका और पूरकमे चरम भागका विस्तार किया जाता है; क्योंकि कण्ठमे निकलने हुए प्राणवायुका कण्ठस्थानीय अकारभागकी, संकुचित होते हुए ओष्ठोमे उकार भागकी और ओष्ठोके सम्पुटित होनेपर मकारभागकी अभिव्यक्ति होती है। मकारभागकी अभिव्यक्तिके समय प्राणवायु यद्यपि पुनः प्रवेश करता है; तथापि उसमे प्रणवका ही अनुवर्तन होता है; इसलिये उस-उस भागके अवसर-विभागका कथन है, ऐसा समझना चाहिये।