भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 750 में से

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पृष्ठ 346

उपशम-प्रकरण ] * महर्षि उद्दालककी साधना, तपस्या और परमात्मप्राप्तिका कथन * ३०७


इस प्रकार जब इस महालोकस्वरूप परब्रह्ममें स्थित हुए उद्दालकका बहुत-सा समय व्यतीत हो गया, तब उन्होंने बहुसंख्यक आकाशचारी सिद्धों तथा देवताओंको भी देखा। तदनन्तर जो इन्द्र और सूर्यका पद प्रदान करनेकी सामर्थ्य रखती थीं, ऐसी बहुत-सी विचित्र सिद्धियाँ भी अप्सराओंसे घिरी हुई वहाँ चारों ओरसे आ पहुँचीं; परंतु उद्दालक मुनिने उन सिद्धियोंको बच्चोंके खिलौनोंकी तरह समझकर उनका कुछ भी आदर नहीं किया, क्योंकि उनका मन क्षोभरहित और बुद्धि गम्भीर थी। इस प्रकार सिद्धि-समूहोंका अनादर करके वे छः महीनेतक उस आनन्द-मन्दिररूप समाधिमें स्थित रहे—ठीक उसी तरह, जैसे उत्तरायणके छः मासतक सूर्य उत्तर दिशाकी ओर रहते हैं। इतने समयतक उद्दालक मुनिको जीवन्मुक्त-पदकी प्राप्ति हो गयी। तब वहाँ उनके समीप सिद्धोंका दल, देवताओंका समुदाय, साध्यगण, ब्रह्मा और शंकर आदि उपस्थित हुए। परमात्माकी प्राप्ति ही वह परम पद है, वही परम शान्त गति है, वही शाश्वत कल्याणस्वरूप मङ्गलमय पद है। जिसे वहाँ विश्राम करनेका अवसर प्राप्त हो गया, उसे भ्रम पुनः बाधा नहीं पहुँचा सकता। संत पुरुष उस परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करके इस विनाशीशील बाह्य दृश्य प्रपञ्चमें उसी प्रकार नहीं रमते, जैसे चैत्ररथ नामक रमणीय उद्यानमें पहुँचे हुए जन खैरके वनमें जानेकी इच्छा नहीं करते। उद्दालक मुनिने सिद्धियोंको दूर हटा दिया था। वे छः मासतक समाधिमें स्थित रहनेके पश्चात् जब पुनः समाधिसे विरत होकर जागे, तब उन्हें अपने सम्मुख कुछ परम तेजस्विनी रमणियाँ दीख पड़ीं, जो चन्द्रबिम्बके समान सुन्दर शरीरवाली, स्नेहमयी और प्रणाम करनेकी लालसासे युक्त थीं। साथ ही कतार-के-कतार दिव्य विमान भी दृष्टिगोचर हुए, जो गौर वर्णवाले मन्दारपुष्पोंके परागसे धूसरित भ्रमरों और चँवरोंसे सुशोभित थे तथा जिनपर पताकाएँ फहरा रही थीं। दूसरी ओर उन्होंने जिनके करकमलोंमें कुशाकी पवित्री धारण करनेसे चिह्न पड़ गये थे, उन हमारेजैसे मुनियोंको और विद्याधरियोंसहित श्रेष्ठ विद्याधरोंको भी देखा। उन सबने उन महात्मा उद्दालक मुनिसे कहा—'भगवन्! हम आपको प्रणाम कर रहे हैं। आप अनुग्रहपूर्ण दृष्टिसे हमारी ओर देखिये। मुने! आइये और इस विमानपर चढ़कर स्वर्गलोकको पधारिये; क्योंकि जगत्‌की भोग-सम्पत्तियोंकी चरम सीमा स्वर्ग ही तो है। विभो! यहाँ चलकर आप कल्पपर्यन्त अपने अभीष्ट भोगोंका समुचित रूपसे उपभोग कीजिये; क्योंकि समस्त तपस्याएँ स्वर्गादिरूप फलका उपभोग करनेके लिये ही होती हैं। भगवन्! ये विद्याधरोंकी ललनाएँ हार और चँवर धारण किये आपके पास खड़ी हैं, इनपर दृष्टिपात कीजिये; क्योंकि धर्म और अर्थका सार काम है तथा कामकी सारभूता सुन्दरी युवतियाँ हैं। जैसे मञ्जरियाँ वसन्त ऋतुमें ही उत्पन्न होती हैं, उसी तरह ये वराङ्गनाएँ स्वर्गमें ही मिलती हैं।'

यों कहनेवाले उन सर्व विद्याधर और ऋषि-मुनि आदि अतिथियोंका यथोचित आदर-सत्कार करके उद्दालक मुनि निर्भ्रान्त एवं निष्कम्प भावसे बैठे रहे। उनकी बुद्धि तो गम्भीर थी ही; अत उन्होंने न तो उस विभूतिका अभिनन्दन किया और न तिरस्कार ही किया अर्थात् उदासीन बने रहे तथा 'भो सिद्धगण! आपलोग जाइये' यों कहकर वे अपने समाधिरूप कार्यमें संलग्न हो गये। तदनन्तर सिद्धगण कुछ दिनोंतक उद्दालक मुनिकी, जो भोगोंकी आसक्तिसे रहित और अपने धर्ममें निरत थे, प्रणाम, स्तुति-प्रशंसा आदिद्वारा उपासना करके अपने-आप चले गये। तब जीवन्मुक्त अवस्थाको प्राप्त हुए मुनि स्वेच्छानुसार वनप्रान्तों तथा मुनियोंके आश्रमोंमें सुखपूर्वक विचरते रहे। उस समयसे उद्दालकमुनि परमपदके प्राप्त होनेपर पर्वतोंकी कन्दराओंमें ध्यान आदि लीलाएँ करते हुए निवास करने लगे।

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