संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
ध्यानस्थ होनेपर उनका कभी एक दिनमें, कभी एक मासमें, कभी एक वर्षमें और कभी-कभी तो कई वर्षोंमें उस ध्यान-समाधिसे व्युत्थान होता था। उस समयसे लेकर उद्दालक मुनि व्यवहारमें तत्पर रहते हुए भी चिन्मय परमात्मामें एकीभावसे स्थित होकर परम समाहित-चित्त बने रहते थे। यों चिन्मय परमात्मतत्त्वमें एकीभावके दृढ़ अभ्याससे महान् चिन्मय विज्ञानानन्दघन परमात्माको प्राप्त करके उन मुनिकी सर्वत्र समदृष्टि हो गयी, जैसे सूर्यका तेज भूतलपर सर्वत्र समभावसे पड़ता है। इस प्रकार समस्त विक्षेपोंका उपशमन होनेके कारण परम पदकी प्राप्तिसे उनका चित्त जब शान्त हो गया, उनकी जन्म-मरणरूपी फाँसी कट गयी और वे संशय तथा चञ्चलतासे रहित हो गये, तब वे शरत्कालीन आकाशके समान शान्त, सर्वव्यापक, तेजस्वी, प्रकाशमय, चित्त-रहित विशुद्धस्वरूप चिन्मय परमात्माको प्राप्त हो गये।
श्रीरामजीने पूछा—ऐश्वर्यशाली गुरो! आप आत्मज्ञान-रूपी दिनके लिये सूर्यरूप हैं, अतः अब यह बतलाने-की कृपा करें कि सत्ता-सामान्यका क्या लक्षण है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! दृश्य वस्तु है ही नहीं—इस प्रकारकी दृढ़ भावनासे चित्त जब सर्वथा क्षीण हो जाता है, तब उस सामान्यस्वरूप चेतनकी सबमें सामान्यभावसे व्यापक स्वतःसिद्ध सत्तामात्र ही सत्ता-सामान्य अवस्था होती है। जब चैतन्य समस्त दृश्य पदार्थोंसे रहित होकर परमात्मामें विलीन हो जाता है, तब उसकी निराकार आकाशकी भाँति अत्यन्त निर्मल सत्ता-सामान्यता होती है। जब चैतन्य बाह्य एवं अभ्यन्तरसहित यह जो कुछ है, उन सबका अपलाप करके स्थित हो, उस समय उसकी सत्ता-सामान्य अवस्था समझनी चाहिये। जब साधक सम्पूर्ण दृश्यप्रपञ्चको अपने वास्तविक स्वरूपसे स्वप्रकाशात्मक सत्ता-सामान्यस्वरूप परमात्मा ही अनुभव करता है, तब उसकी सत्ता-सामान्यतावस्था जाननी चाहिये। यह परम दृष्टि तुर्यातीत पदके सदृश है, अतः यह सदेहमुक्त और विदेहमुक्त दोनोंके लिये सदा समान है। निष्पाप राम ! यह दृष्टि ज्ञानसे प्रादुर्भूत होती है, अतः यह केवल तुर्यातीत ज्ञानी महापुरुषको समाधि-अवस्था एवं व्युत्थान-अवस्था—दोनोंमें होती है, किंतु अज्ञानीको कभी नहीं होती। यह सत्ता-सामान्य पदवी समस्त भयोंका विनाश करनेवाली है। इसका आश्रय लेकर उद्दालक मुनि दैवेच्छानुसार प्रारब्ध कर्मोंका क्षय होनेतक जगत्में स्थित रहे। वे पर्वतकी गुफामें पत्तोंके आसनपर नेत्रोंको आधा मूँदकर पद्मासनसे बैठे थे। उस समय वे महात्मा चित्रलिखित-से निश्चल होकर शरद्-ऋतुके निर्मल आकाशमें सम्पूर्ण कलाओंसे परिपूर्ण चन्द्रमाके समान विशुद्ध और सम हो गये। उनके सारे संकल्प-विकल्प जाते रहे। वे निर्विकार एवं समस्त पापों और विषय-भोगोंकी उपाधिसे रहित होनेके कारण अभिराम हो गये। उन्हें उस चिन्मय परम आनन्दकी प्राप्ति हुई, जहाँसे सारे सांसारिक सुख प्रादुर्भूत होते हैं तथा जिसकी समतामें इन्द्रका ऐश्वर्य भी समुद्रमें तिनकेके समान है। तदनन्तर वे विप्रवर उद्दालक, जो अनन्त आकाशोंमें व्याप्त रहनेवाली दिशाओंको भी व्याप्त करनेवाला, सदा समस्त वस्तुओंसे पूर्ण, भुवनोंका भरण-पोषण करनेवाला, बड़े भाग्यसे एव उत्तम जनोंद्वारा सेवा करनेयोग्य, वाणीसे परे, अनन्त, सबका आदि और सत्यस्वरूप है, उस परम विज्ञानानन्दघन परमात्मामें तद्रूप हो गये। जो विवेकद्वारा स्फुरित हुए आनन्दरूपी विकसित पुष्पोंसे सुशोभित है, उद्दालककी वह चञ्चलतारहित पवित्र चित्तवृत्तिरूपिणी कल्पलता जिसके हृदय-काननमें उगकर विस्तारको प्राप्त हो जाती है, वह संसार-काननमें विहार करता हुआ भी सत्यस्वरूप परमात्माके आश्रयरूपा छायासे कभी वियुक्त नहीं होता, अपितु उसका सर्वोत्कृष्ट मोक्षफलसे सम्बन्ध जुड़ जाता है। इसलिये कल्याणकामी मनुष्यको उद्दालककी चित्तवृत्तिरूपा लताको हृदयमें रोपकर उसका विस्तार करना चाहिये।