भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 348

उपशम-प्रकरण ] * महर्षि उद्दालककी साधना, तपस्या और परमात्मप्राप्तिका कथन * ३०९


रघुकुलभूषण राम ! संसारसे वैराग्य, जप-ध्यानके अभ्यास, सत्-शास्त्रोंके विचारपूर्वक अध्ययन, पवित्र और तीक्ष्ण बुद्धि, सद्गुरुके उपदेश और यम-नियमोंके पालनसे परमात्माकी प्राप्तिरूप विशुद्ध परमपदकी प्राप्ति होती है अथवा केवल विशुद्ध और तीक्ष्ण प्रज्ञासे ही परमपद मिल जाता है; क्योंकि जो बुद्धि सम्यक् प्रकारसे ज्ञानयुक्त, तीक्ष्ण और दोषरहित है, वह सम्पूर्ण साधनोंके बिना भी यथार्थ ज्ञानद्वारा जीवको अविनाशी परमपदकी प्राप्ति करा देती है।

श्रीरामजीने पूछा—भूत और भविष्यके ज्ञाता भगवन् ! कोई ज्ञानी पुरुष व्यवहार करता हुआ भी समाधिस्थके सदृश विश्रामको प्राप्त हुआ रहता है और कोई एकान्तका आश्रय लेकर ध्यान-समाधिमें स्थित रहता है। इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है ? यह मुझे बतलानेकी कृपा करें।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—वत्स राम ! जो इस सत्त्वादि गुणोंके समाहाररूप दृश्य जड संसारको अनात्मरूप ( अनित्य और मिथ्या ) देखता है, उस पुरुषकी जो यह परम शान्तिस्वरूप अन्तःशीतलता है, वही समाधि कहलाती है। मनके रहनेपर दृश्य पदार्थोंके साथ सम्बन्ध होता है — ऐसा निश्चय करके जो मनसे रहित होकर परम शान्तिको प्राप्त हो चुका है, ऐसा कोई पुरुष तो व्यवहारमें लगा रहता है और कोई ध्यान-समाधिमें तल्लीन हो जाता है। यदि उनके अन्तःकरणमें परम शान्तिरूप शीतलता है तो वे दोनों ही सुखी हैं; क्योंकि जो अन्तःकरणकी शीतलता है, वह अनन्त साधनरूप तपस्याओंका फल है। इसलिये जो ज्ञानी व्यवहारपरायण है और जिसने ज्ञान प्राप्त करके वनका आश्रय ले लिया है, वे दोनों ही सर्वथा समान हैं; क्योंकि उन दोनोंको ही सम्पूर्ण सन्देहोंसे रहित परम पदकी प्राप्ति हो गयी है। रघुनन्दन ! चित्तमें जो कर्तापनका अभाव है, वह उत्तम समाधान है और वही मङ्गलमय परमानन्द-पद है। उसीको तुम केवल चिन्मयभाव समझो। जो मन वासनाओंसे रहित हो गया है, वह स्थिर कहा गया है, वही ध्यान-समाधि है, वही केवल चिन्मयभाव है और वही अविनाशी परम शान्ति है। जिसके मनकी वासनाएँ क्षीण हो चुकी हैं, वह पुरुष सर्वोत्कृष्ट परमपदकी प्राप्तिके योग्य कहा जाता है; क्योंकि वासनाशून्य मनवाला पुरुष कर्तापनसे रहित हो जाता है, अतः उसे परमपदकी प्राप्ति होती है। जिस साधनसे मनुष्यकी जगद्विषयिणी आस्था पूर्णतया शान्त हो जाती है और उसका अन्तःकरण शोक, भय और एषणाओंसे रहित हो जाता है तथा आत्मा अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित हो जाता है, उस साधनको समाधि कहते हैं। जिन गृहस्थोंके चित्त अच्छी प्रकार समाहित हो चुके हैं तथा जिनके अहङ्कार आदि दोष शान्त हो गये हैं, उनके लिये घर ही निर्जन वनस्थलियोंके समान है। समाहित मन और बुद्धिशाले तुम्हारे-जैसे प्राणियोंके लिये इस जगत्में घर और वन एक-से हैं। राजकुमार राम ! जिसका चित्त अहंता, ममता, रागादि दोषरूप महामेघसे रहित होकर शान्त हो चुका है, उसके लिये जनसमूहोंसे व्याप्त नगर भी सुनसान अरण्य-जैसे लगते हैं; परंतु शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले रघुनन्दन ! जिसका चित्त अहन्ता, ममता, राग आदि वृत्तियोंसे युक्त होनेके कारण उन्मत्त बना रहता है, उसके लिये निर्जन वन भी प्रचुर जनोंसे परिपूर्ण नगर-जैसे ही हैं।

जो मनुष्य समाधि-कालमें परमात्माको सम्पूर्ण भावों और पदार्थोंसे अतीत तथा व्यवहारकालमें सम्पूर्ण भावोंको परमात्माका स्वरूप समझता है, वह समाहित कहा जाता है। जिसका मन सदा अन्तर्मुख बना रहता है, वह सोते, जागते और चलते हुए भी ग्राम, नगर और देशको जंगल-जैसा ही समझता है। यद्यपि यह सारा जगत् प्राणियोंसे परिपूर्ण है, तथापि नित्य अन्तर्मुखी स्थितिवाले पुरुषके लिये सर्वथा अनुपयोगी होनेके कारण यह आकाशकी तरह शून्य हो जाता है। जिन पुरुषोंके