भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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३१० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अन्तःकरणमें परम शान्ति प्राप्त हो जाती है, उनके लिये सारा जगत् सदा शान्तिमय हो जाता हैं; परंतु जिनका अन्तःकरण तृष्णाकी ज्वालासे संतप्त होता रहता है, उनके लिये जगत् दावाग्निसे दग्ध होता हुआ-सा प्रतीत होता है; क्योंकि समस्त प्राणियोंके भीतर जैसा भाव होता है, वैसा ही बाहर अनुभव होता है। जो बाहर कर्मेन्द्रियोंद्वारा क्रियाओंका सम्पादन करता हुआ भीतर केवल आत्मामें ही रत रहता है और हर्ष-शोकके वशीभूत नहीं होता, वह समाहित कहा जाता है। जो शान्तबुद्धि पुरुष सर्वव्यापक आत्माका साक्षात्कार करते हुए न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी चिन्ता ही करता है, वह समाहित कहलाता है। जो आकाशकी तरह निर्मल है, शास्त्र और शिष्टाचारके अनुकूल बाह्य चेष्टाओंका सम्यक् प्रकारसे आचरण करता है और हर्ष, अमर्ष आदि विकारोंमें काष्ठ और मिट्टीके ढेलेके समान विकाररहित एवं शान्तस्वभाववाला है तथा जो भयसे नहीं, बल्कि स्वाभाविक ही समस्त प्राणियोंको अपने आत्माके तुल्य और पराये धनको मिट्टीके ढेलेके सदृश देखता है, वही यथार्थ देखता है। जो इस प्रकारके आशयसे सम्पन्न होकर सच्चिदानन्द ब्रह्मरूप परमपदको प्राप्त हो गया है, उसके ऐश्वर्य आदि पदार्थ चाहे पूर्ववत् स्थित रहें, चाहे अभ्युदयको प्राप्त हों, चाहे नष्ट हो जायें, चाहे उसके बन्धु-बान्धव मृत्युको प्राप्त हो जायें, चाहे वह उत्तमोत्तम भोग-सामग्रियोंसे परिपूर्ण तथा कुटुम्बी जनोंसे भरपूर घरमें रहे, अथवा सभी प्रकारके भोगोंसे शून्य विशाल वनमें रहे, चाहे उसके शरीरपर चन्दन, अगुरु और कपूरका अनुलेप किया जाय अथवा वह बड़ी-बड़ी ज्वालाओंसे व्याप्त अग्निमें गिरे, चाहे उसकी आज ही मृत्यु हो जाय अथवा अनेक कल्पोंके बाद हो, वह न तो स्वयं कुछ बनता है और न उस महात्माने कुछ किया ही। अर्थात् वह सभी स्थितियोंमें विकार-रहित समभावसे स्थित रहता है। अहंकार और वासनारूपी अनर्थोंके उत्पन्न होनेसे संविदात्मा पुरुषके जीवनमें नाना प्रकारके सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं; परंतु उस अहंताके पूर्णतया शान्त हो जानेपर चित्तमें ऐसी समता प्राप्त हो जाती है, जैसे रज्जुमें सर्पभ्रान्तिके नष्ट हो जानेपर 'यह सर्प नहीं है' इस ज्ञानसे निर्भयता और प्रसन्नता होती है। ज्ञानी जो कार्य करता है, जो खाता है, जो दान देता है, जो हवन आदि करता है—उन सब कर्मोंको करता हुआ भी वह कुछ नहीं करता एवं न उनमें रत ही रहता है; क्योंकि वह अहंता-ममतासे रहित हो जाता है, इसलिये उसका कर्म करना अथवा न करना एक-सा है। उसका न तो कर्मोंके करनेसे कोई प्रयोजन है और न कर्मोंके न करनेसे ही कोई मतलब है; क्योंकि वह तो यथार्थ ज्ञानके प्रभावसे स्वाभाविक ही परमात्मामें स्थित है। अतः उसके मनमें कामनाओंकी उत्पत्ति उसी प्रकार रुक जाती है, जैसे पत्थरमे मञ्जरियाँ नहीं निकलतीं।

(सर्ग ५४-५७)


किरातराज सुरघुका वृत्तान्त—महर्षि माण्डव्यका सुरघुके महलमें पधारना और उपदेश देकर अपने आश्रमको लौट जाना, सुरघुके आत्मविषयक चिन्तनका वर्णन तथा उसे परमपदकी प्राप्ति

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया जाता है, जो किरात-राज सुरघुका परम विस्मयजनक वृत्तान्त है। पूर्वकालमें हिमालयके शिखरभूत कैलासके मूल देशमें हेमजट नामक किरात निवास करते थे। उनका जो राजा था, उसका नाम सुरघु था। वह उदारचेता एवं शत्रु-नगरोंपर विजय पानेवाला था। विजयलक्ष्मी तो मानो उसकी भुजा ही थी। वह बलवान् तथा प्रजापालनमें दक्ष था। पराक्रममें