भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * किरातराज सुरघुका वृत्तान्त—महर्षि माण्डव्यका सुरघुके महलमें पधारना * ३११

तो वह सूर्यतुल्य और बलमें साक्षात् मूर्तिमान् वायुके समान था। उसने नाना प्रकारके राज्यवैभवों तथा विविध धन-सम्पत्तियोंसे गुह्यकाधिपति कुबेरको, ज्ञानसे इन्द्रगुरु बृहस्पति‌को और काव्यगुणोंसे असुर-गुरु शुक्राचार्यको जीत लिया था। वह यथावसर प्राप्त हुए राजकार्योंको निग्रह-अनुग्रहकी व्यवस्थासे उत्साहपूर्वक करता था। तदनन्तर उन राजकार्योंसे उत्पन्न हुए सुख-दुःखोंसे उसकी पारमार्थिक गति उसी प्रकार अभिभूत हो गयी, जैसे जालमें फँसे हुए पक्षीकी गति रुक जाती है। तब वह यों विचार करने लगा—'मैं इन दुखी प्रजाजनोंको कोल्हूमें पेरे जाते हुए तिलोंकी भाँति क्यों बलपूर्वक पीड़ित करता हूँ ? मेरे समान ही इन सभी प्राणियोंको भी तो दुःख होता होगा। अतः अब मेरा इन्हें और अधिक दण्ड देना व्यर्थ है। मैं इन्हें धन-सम्पत्ति प्रदान करूँगा; क्योंकि मेरी तरह सभी लोग धनसे आनन्दित होते हैं। अथवा निग्रहका अवसर प्राप्त होनेपर उसे भी करूँगा; क्योंकि निग्रहके बिना प्रजा अपनी मर्यादामें स्थित नहीं रहती। यह मेरे लिये दण्डनीय है। यह सदा मेरे अनुग्रहका पात्र है। सौभाग्यकी बात है कि आज मैं सुखी हूँ और दुर्भाग्यवश आज मैं दुखी हूँ। यह सब अन्तमें कष्ट-ही-कष्ट है।' पृथ्वीपति सुरघुका मन इस प्रकारके सङ्कल्प-विकल्पोंसे चञ्चल हो गया, जिससे उसे कहीं विश्राम नहीं मिला—जैसे चिरकालकी तृषासे युक्त मन जलके बड़े-बड़े आवर्तोंपर घूमते रहनेपर भी जलके बिना कहीं शान्ति नहीं पाता।

तदनन्तर किसी समय महर्षि माण्डव्य सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए राजा सुरघुके घर पधारे—ठीक उसी तरह, जैसे देवर्षि नारद इन्द्र-भवनमें पदार्पण करते हैं। वे मुनिराज सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता थे, अतएव सन्देहरूपी दुष्ट वृक्षस्तम्भका छेदन करनेके लिये कुठारस्वरूप थे। राजाने उनका पूजन किया और यों पूछा।

सुरघुने कहा—मुने ! जैसे लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका दर्शन करके भक्त परम प्रसन्न होता है, उसी प्रकार आपके शुभागमनसे मुझे परम हर्ष प्राप्त हुआ है। भगवन् ! आप तो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं और चिर-कालसे परमपदमें विश्राम भी कर चुके हैं; अतः जैसे सूर्य अन्धकारका विनाश कर देते हैं, उसी प्रकार आप मेरे संशयका निवारण कीजिये; क्योंकि दुःखके स्वरूप-को पूर्णतया जाननेवाले विज्ञजन संशयको ही महान् दुःख बतलाते हैं। भला, महापुरुषोंके सङ्गसे किसके दुःखका विनाश नहीं होता अर्थात् सभीके दुःख नष्ट हो जाते हैं। प्रभो ! अपने प्रजाजनोंपर मेरे द्वारा किये गये निग्रह और अनुग्रहसे उत्पन्न हुई चिन्ताएँ मुझे उसी प्रकार उत्पीड़ित कर रही हैं, जैसे सिंहके नख हाथीको कष्टमें डाल देते हैं। अतः मुने ! जिस प्रकार मेरी बुद्धिमें सूर्यकी किरणोंके समान समताका उदय हो और विषमता न आने पाये, कृपापूर्वक वैसा ही प्रयत्न कीजिये।