संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
महर्षि माण्डव्य बोले- राजन् ! जैसे सूर्यकी किरणोंके स्पर्शसे कुहरेका विनाश हो जाता है, उसी तरह वैराग्य, श्रवण-मनन-निदिध्यासनरूप अभ्यासादि निजी प्रयत्नसे तथा आत्मस्थितिरूप उपायसे मनकी यह कायरता पूर्णतया नष्ट हो जाती है। आत्मविषयक विवेक-विचार करनेसे ही मनके भीतरी संतापका शमन होता है—ठीक उसी तरह, जैसे शरद्ऋतुके आगमनमात्रसे विशाल मेघमण्डल विलीन हो जाता है। इसलिये तुम मन ही-मन विचार करो—ये जो पुत्र, मित्र आदि अपने सम्बन्धी हैं तथा अपने शरीरमें रहनेवाली इन्द्रियाँ हैं, वे तत्त्वतः कौन हैं और कैसी हैं? मैं कौन हूँ? कैसा हूँ? यह दृश्य जगत् क्या है ? प्राणियोंके जन्म-मरण कैसे होते हैं? यों हृदयमें विचार करनेसे तुम्हें परमोत्कृष्ट महत्ता प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार जब परमात्म-तत्त्वका यथार्थ अनुभव कर लेनेपर तुम संतुष्ट हो जाओगे, तब जैसे संतान संतुष्ट हुए पिताकी कृपाका पात्र होती है, उसी तरह वे सभी सम्पत्तिशाली राजा-महाराजा तुम्हारे कृपापात्र हो जायँगे। सज्जनशिरोमणे ! परमात्माकी प्राप्तिरूप महत्ताके प्राप्त कर लेनेपर तुम्हारा चित्त जागतिक विषय-भोगोंमें उसी प्रकार नहीं डूबेगा, जैसे गायके खुरके गढ्ढेके जलमें हाथी नहीं डूबता। तुम्हारे अन्त:करणमें केवल दृश्यका अवलम्बन करनेवाली वासनारूपा दीनता छायी हुई है, अभी उसी दीनताके कारण तुम कीड़ेकी भाँति भोगोंमें पच रहे हो। जो सर्वात्मिका बुद्धिसे सब देशमें, सब कालमें, सभी प्रकारोंसे सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्चका परित्याग कर देता है, उसे सर्वरूप परमात्मा अपने-आप उपलब्ध हो जाते हैं; किंतु जबतक सम्पूर्ण दृश्योंका पूर्णतया त्याग नहीं हो जाता, तबतक परमात्मा-का साक्षात्कार होना दुर्लभ है; क्योंकि सभी अवस्थाओं-का परित्याग कर देनेपर जो शेष रहता है, वही परमात्मा कहा गया है। राजन् ! अन्यान्य कार्योंका परित्याग करके आत्मा जिस विषयकी प्राप्तिके लिये स्वयं सब प्रकारसे यत्न करता है, उसीको पाता है; उससे भिन्न कुछ नहीं मिलता। इसलिये अपने आत्मा-का साक्षात्कार करनेके लिये सभी विषयोंका परित्याग कर देना चाहिये; क्योंकि सब कुछ त्याग देनेपर अन्तमें जो दृष्टिगोचर होता है, वही परमपद है।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! महर्षि माण्डव्य राजा सुरघुको यो उपदेश देकर अपने उसी रुचिर आश्रमकी ओर चले गये, जहाँ मुनियोंका जमघट लगा रहता था। उन मुनिश्रेष्ठके चले जानेपर राजा सुरघु किसी दोषरहित एव एकान्त स्थानमें जाकर अपनी बुद्धिसे यों विचार करने लगा—'वस्तुतः स्वयं मैं कौन हूँ ? मै मेरु पर्वत तो हूँ नहीं और न मेरुगिरि मेरा है। न तो मैं जगत् हूँ और न जगत् मेरा है। मैं पर्वत भी नहीं हूँ और न पर्वत मेरे हैं। मैं न पृथ्वी हूँ और न पृथ्वी मेरी है। यह किरात-मण्डल भी मेरा नहीं है और न मैं किरातमण्डल हूँ। केवल अपने संकेतसे ही यह देश मेरा कहा जाता है। लो, मैंने इस संकेतको छोड़ दिया, अतः न तो मैं देश हूँ और न यह देश मेरा है। इस नगरके विषयमें भी इस कल्पनात्यागसे यही निश्चय होता है कि यह पुरी जो पताकाओं और वनश्रेणियोंसे सुशोभित, भृत्यों और उपवनोंसे व्याप्त तथा हाथी, घोड़ों और सामन्तोंसे परिपूर्ण है, वह मैं नहीं हूँ और न यह पुरी मेरी है। जो मिथ्याभूत मान्यतासे सम्बन्ध रखनेवाला और उस मान्यताका विनाश होनेपर नष्ट हो जानेवाला है, ऐसा यह भोग-समुदाय और भार्या आदि कुटुम्ब भी मैं नहीं हूँ और न ये सब मेरे हैं। इसी प्रकार भृत्यों, सेनाओं, वाहनों एवं अन्यान्य नगरोंसे युक्त राज्य मैं नहीं हूँ और न राज्य मेरा है; क्योंकि यह मान्यता तो केवल कल्पित है। इस शरीरमें स्थित मांस और अस्थि भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि ये जड़ हैं। कमलदलपर पड़े