संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भी तृण-तुल्य हो जाता है। परमात्माके तत्त्वको जानने- वाला महापुरुष समस्त प्रकाशोंमें, सभी प्रभावोंमें, समस्त बलवानोंमें, सम्पूर्ण महान् व्यक्तियोंमें तथा सभी उन्नतिशाली मनुष्योंमें परम उन्नत होता है। जिस परमात्माकी प्रभासे सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, मणि और तारे आदि प्रकाशित होते हैं, उस जगदीश्वरका जिन महापुरुषोंको ज्ञान हो गया है, वे भी सूर्यादिकी भाँति जगत्में सुशोभित होते हैं। परंतु श्रीराम ! जो मानव परमात्मविषयक ज्ञानसे हीन हैं, वे पृथ्वीके दरारोंमें रहनेवाले कीड़ों, गदहों एवं अन्य तिर्यग्योनिमें उत्पन्न हुए जीवोंसे भी अत्यन्त तुच्छ माने जाते हैं। आत्मज्ञान- विहीन पुरुषकी सारी चेष्टाएँ दुःखदायिनी होती हैं। वह भूतलपर चलता-फिरता हुआ भी मुर्दा ही है। इसलिये आत्मज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह भोगोंके रसोंमें आसक्त न होते हुए उनके उपभोगके तिरस्कारद्वारा मनको अत्यन्त सूखे हुए पत्तेके समान समयानुसार धीरे-धीरे कृश बना डाले; क्योंकि यह मन अनात्मामें आत्मभाव, देहमात्रमें ऐसी आस्था, पुत्र, कलत्र और कुटुम्बकी ममता, अहंकारके विकास, ममतारूपी मलमें सने रहना, 'यह मेरा है' ऐसी भावना, जरा-मरणरूपी दुःख, व्यर्थ ही उन्नतिको प्राप्त हुए काम-क्रोधादि दोषरूपी सर्पोंके विवररूप संसारकी ममता, आधि-व्याधिकी अभिवृद्धि, संसारकी रमणीयतामें विश्वास, हेयोपादेयके प्रयत्न, स्त्री-पुत्र आदिके प्रति स्नेह तथा रत्नों और स्त्रियोंके आपातकमणीय लाभसे उत्पन्न हुए धनके लोभसे स्थूलताको प्राप्त होता है। यह चित्त सर्पके समान है, जो दुराशारूपी दूधके पीनेसे, भोगरूपी वायुके बलसे, आदरप्रदानसे तथा नाना प्रकारके विषयोंमें संचरण करनेसे मोटा-ताजा हो जाता है। आना और जाना—उत्पत्ति विनाश ही जिनका स्वरूप है तथा जो चित्तकी विषमताको सूचित करनेवाले हैं, ऐसे भीषण भोगोंका उपभोग करनेसे चित्त स्थूलभावको प्राप्त हो जाता है।
राघव ! यह चित्त विषवृक्षके समान है, जो चिरकाल- से शरीररूपी बुरे गड्ढेमें उगा हुआ है। आशाएँ ही इसकी विशाल शाखाएँ और विकल्प ही इसके पत्ते हैं। अनेक प्रकारकी चिन्ताएँ ही इसकी लंबी-लंबी मञ्जरियाँ हैं। कामोपभोगोंके समूह ही इसमें खिले हुए पुष्प हैं। यह जरा-मरण और व्याधिरूपी फलोंके भारसे झुका हुआ है। इस पर्वताकार अद्भुत वृक्षको तुम निःशङ्क होकर हठपूर्वक विवेक-विचाररूपी मजबूत आरेसे काट डालो। जबतक इस चित्तरूपी पिशाचको—जो अज्ञानरूपी विशालवटवृक्षोंपर विश्राम करनेवाला है, तृष्णा-पिशाची जिसकी परिचर्या करती है और जो चेतनरहित सैकड़ों देह धारण करके अपनी कल्पनारूपी अटवीमें चिरकालसे भटक रहा है—विवेक, वैराग्य, गुरुसन्निधि, प्रयत्न और मन्त्र आदि स्वतन्त्र उपायोंद्वारा चेतन जीवात्माके निवास- स्थानरूप अपने हृदयसे हटाया नहीं जायगा, तबतक इस जगत्में आत्मसिद्धिकी प्राप्ति कैसे हो सकती है।
रघुनन्दन ! मेरे वाक्योंके एकमात्र तत्त्वज्ञ तो तुम्हीं हो, इसीलिये केवल मेरे वाक्यार्थोंकी भावनासे तुम्हें सुख मिलना है। वत्स राम ! पूर्वकालमें उद्दालक मुनिको पञ्च महाभूतोंके विचार विमर्शसे जिस प्रकार परमोत्कृष्ट एवं अविनाशी दृष्टि प्राप्त हुई थी, वह वृत्तान्त तुम्हें कहता हूँ; सुनो। प्राचीनकालमें पर्वतराज गन्धमादनके किसी भूभागमें एक ऊँचे शिखरपर एक मुनि निवास करते थे। उनका नाम उद्दालक था। अभी उनकी जवानी नहीं आयी थी। वे स्वाभिमानी और महाबुद्धिमान् थे तथा मौन रहकर घोर तपस्यामें संलग्न थे। पहले तो उनकी बुद्धि मन्द थी। उनमें विवेक-विचार भी नहीं था। उन्हें परमपदरूप शान्तिकी प्राप्ति भी नहीं हुई थी तथा वे परमात्माके तत्त्वसे भी अनभिज्ञ थे; परंतु उनका अन्तःकरण शुभ भावोंसे युक्त था। तदनन्तर तपस्या, नियमपूर्वक शास्त्रार्थ-चिन्तन और अभ्यासके पाकरूप कर्मोंसे उनके हृदयमें विवेक जाग उठा। उनका मन तो शुद्ध था ही, अतः उनकी बुद्धि इस