संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * मायाचक्रका निरूपण, चित्तनिरोधकी प्रशंसा, भगवत्प्राप्तिकी महिमा * २९९
समझो। यह संसार एक महाभयंकर रोग है। चित्त-निरोध ही इस रोगकी परमोत्तम औषध है। इस औषधके अतिरिक्त अन्य किसी प्रयत्नसे उस व्याधिकी शान्ति नहीं होती। जैसे घड़ेके भीतर घटाकाश रहता है, परन्तु घड़ेके नष्ट होनेपर घटाकाश नहीं रह जाता, उसी तरह यह संसार चित्तके अंदर ही है, अतः चित्तका नाश होनेपर संसार भी विनष्ट हो जाता है। यह चित्त जब भूत और भविष्यके पदार्थोंका चिन्तन न करके वर्तमान समयका बाह्य बुद्धिद्वारा अनायास ही उपयोग करने लगता है, उसी क्षण अचित्तताको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि चित्तकी वृत्तियाँ तभीतक रहती हैं जबतक संकल्पकी कल्पना बनी रहती है—ठीक उसी तरह, जैसे जबतक मेघका विस्तार रहता है, तभीतक आकाशमें जलके अणु वर्तमान रहते हैं। संकल्प-कल्पना भी तभीतक रहती है, जबतक चेतन जीवात्मा मनके साथ है। रघुनन्दन ! यदि ऐसी भावना की जाय कि चेतन जीवात्मा मनसे पृथक् है तो जैसे सिद्ध पुरुषोंमें मूल अविद्यासहित वासनाओंका ज्ञानद्वारा जलकर अत्यन्ताभाव हो जाता है, उसी तरह तुम अपने संसारके मूलों—वासनाओंको मूलाविद्यासहित जलकर भस्म हुआ ही समझो। चित्तसे शून्य हुआ चेतन प्रत्यक्चेतनं अर्थात् शुद्ध आत्मा कहा जाता है। वास्तवमें तो निर्मनस्क रहना उसका स्वभाव ही है; क्योंकि उसमें संकल्परूपी मल नहीं है। वह शुद्ध आत्मा ही वास्तवमें सत्यता है; वही कल्याणरूपता सच्चिदानन्द परमात्माकी प्राप्तिरूप अवस्था, सर्वज्ञता और वास्तविक दृष्टि है। किंतु जिस समय उसका विनाशशील मनके साथ संयोग बना रहता है, उस समय उसकी उपर्युक्त स्थिति नहीं रहती; क्योंकि जहाँ मन रहता है, वहाँ उसके संनिकट अनेक प्रकारकी आशाएँ और सुख-दुःख उसी प्रकार सदा आते रहते हैं, जैसे श्मशानभूमिमें कौए मँडराया करते हैं। परंतु जब परमार्थ वस्तुरूप परमात्माके तत्त्वका ज्ञान हो जाता है, तब उस पुरुषके मनके संकल्पमें आशा आदि सम्पूर्ण भावोंकी व्यवस्थापिका संसाररूपी लताका बीज उत्पन्न ही नहीं होता; क्योंकि उस समय उसका मन भुने हुए बीजके समान हो जाता है। शास्त्राध्ययन और सज्जनोंकी संगतिका निरन्तर अभ्यास करनेसे सांसारिक पदार्थोंकी अवास्तविकताका ज्ञान होता है, अर्थात् जगत्के पदार्थ वास्तवमें असत् हैं—ऐसा अनुभव होता है। इसलिये निश्चयपूर्वक परम प्रयत्नके साथ मनको अविवेकसे हटाकर उसे बलात्कारसे शास्त्राध्ययन और सत्पुरुषोंके सङ्गमें लगाना चाहिये; क्योंकि परमात्माका साक्षात्कार होनेमें, शुद्ध आत्मा ही प्रधान कारण है।
श्रीराम ! अपना आत्मा ही अपनेद्वारा अनुभूत दुःखोंको त्याग देनेकी इच्छा करता है, अतएव परमात्माका साक्षात्कार होनेमें एकमात्र शुद्ध आत्मा ही मुख्य हेतु कहा गया है। इसलिये तुम बोलते हुए, त्याग करते हुए, ग्रहण करते हुए तथा आँखोंको खोलते और मींचते हुए भी अचिन्त्य, अनन्त, नित्यविज्ञानानन्दघन परमात्मामें स्थित रहो। इसी प्रकार बाल्य, यौवन और वृद्धावस्थामें, दुःखोंमें, सुखोंमें तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थाओंमें तुम सदा-सर्वदा अपने वास्तविक सच्चिदानन्द-स्वरूपमें बने रहो। जो आत्मज्ञानसम्पन्न एवं अमृतस्वरूप परमार्थ-तत्त्वका अनुभव करनेवाला है, उसके लिये हलाहल विष भी अमृतके समान फलदायक हो जाता है। जिस समय निर्मल एवं अखण्ड चैतन्यका ज्ञान नहीं रहता, उस समय संसाररूपी भ्रमका कारणस्वरूप महामोह वृद्धिको प्राप्त होता है और जब उस निर्मल एवं अखण्ड सच्चिदानन्दघन परमात्मामें दृढ़ स्थिति हो जाती है, तब संसार-भ्रमका कारणभूत मोह सर्वथा विनष्ट हो जाता है। श्रीराम ! जो अद्वितीय आनन्दरूप ब्रह्ममें स्थित होकर अपने विज्ञानानन्दघन स्वरूपका साक्षात्कार करनेवाला है, उसके लिये खादिष्ट रसायन