भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 750 में से

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२९८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बीज जमता नहीं है । महाबाहु राम ! प्रह्लादके अन्तःकरणमें शुद्ध सत्त्वमयी वासना स्थित थी, वह शङ्खध्वनि होते ही उद्बुद्ध हो उठी । अपनी उसी वासनासे प्रह्लादको बोध प्राप्त हुआ था । श्रीहरि ही समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं, इसलिये उनके मनमें जैसा संकल्प होता है, वह शीघ्र ही उसी रूपमें मूर्त हो जाता है; क्योंकि परमात्मा ही सबके कारण हैं । भगवान् वासुदेवने ज्यों ही ऐसा संकल्प किया कि प्रह्लाद प्रबुद्ध हो जाय, त्यों ही वह क्षणमात्रमें उठ बैठा । अर्थात् भगवान्‌के संकल्पसे ही प्रह्लाद पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनिसे प्रबुद्ध हो गया । भगवान् वासुदेवने निजी स्वार्थके बिना ही प्राणियोंके कल्याणके हेतु अपने आत्मामें ही जगत्‌की सृष्टिके लिये विष्णुरूपसे शरीर धारण किया है । परमात्माके साक्षात्कारसे शीघ्र ही भगवान् माधवका दर्शन प्राप्त हो जाता है और उन माधवकी आराधनासे शीघ्र ही निर्गुण-निराकार परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है ।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! आप तो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं; अतः आपके शुद्ध वचनरूपी किरणोंसे हम उसी प्रकार आह्लादित हुए हैं, जैसे चन्द्रमाकी रश्मियोंके स्पर्शसे अनाजके पौधे प्रफुल्लित हो जाते हैं । परंतु गुरुदेव ! यदि पुरुषार्थपूर्वक प्रयत्न करनेसे ही सब कुछ प्राप्त हो जाता है तो भगवान् माधवके वरदान बिना प्रह्लाद अपने पुरुषार्थसे ही क्यों नहीं प्रबुद्ध हुआ ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! महामनस्वी प्रह्लाद-ने जिन-जिन पदार्थोंको प्राप्त किया था, वे सभी उसे अपने पुरुषार्थसे ही मिले थे । उनकी प्राप्तिमें दूसरा कोई कारण नहीं है । ( क्योंकि प्रह्लादने परम पुरुषार्थसे जो भक्ति की, उसीसे भगवान्‌ने उनको वर दिया; इसलिये भगवान्‌का वर मिलना भी अपना पुरुषार्थ ही है । ) जो विष्णु है, वही सबका आत्मा है और जो सबका आत्मा है, वही विष्णु है । इस प्रकार पुष्प और उसकी सुगन्धकी भाँति आत्मा और नारायण भिन्न नहीं हैं । पहले-पहल प्रह्लाद नामक आत्मा ही अपने-आप अपनी परम शक्तिसे ही विष्णुभक्तिमें नियुक्त हुआ । फिर उसने आत्मभूत विष्णुमे ही स्वयं यह वर प्राप्त किया और स्वयं ही अपने मनको विचारशील बनाकर स्वयं ही आत्मज्ञान प्राप्त किया । इस प्रकार कभी तो आत्मा अपने आप ही अपनी शक्तिसे प्रबुद्ध हो जाता है और कभी भक्तिरूपी प्रयत्नसे प्राप्त होनेवाले विष्णुरूपसे प्रबोधित किया जाता है । इसलिये किसीको जहाँ-कहीं भी जो कुछ प्राप्त होता है, वह सब उसे अपनी सामर्थ्यरूप प्रयत्नसे ही मिलता है; कहीं भी किसी अन्य कारणसे उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती ।

( सर्ग ३९-४९ )


मायाचक्रका निरूपण, चित्तनिरोधकी प्रशंसा, भगवत्प्राप्तिकी महिमा, मनकी सर्प और विषवृक्षसे तुलना, उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जो भगवत्प्राप्तिके साधनरूप सम्पूर्ण अङ्गोंका उच्छेदक तथा यों वेगपूर्वक घूमता रहता है, उस मायाचक्रका निरोध कैसे किया जाय ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! यह संसाररूपी मायाचक्र नित्य भ्रमणशील तथा भ्रान्तिदायक है। तुम चित्तको इस चक्रकी महानाभि समझो । जब पुरुष प्रयत्नपूर्वक बुद्धिद्वारा इस चित्तको स्तम्भित कर देता है, तब जिसकी नाभि पकड़ ली गयी है, ऐसा यह मायाचक्र शीघ्र ही आगे बढ़नेसे रुक जाता है । इस चित्त-निरोधरूपी युक्ति के बिना आत्माको अनन्त दुःखोंकी प्राप्ति हो रही है, परंतु इस उपर्युक्त दृष्टिके प्राप्त होनेपर तुम सारे-के-सारे दुःखोंको क्षणमात्रमें नष्ट हुआ ही

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