संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 336, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * भगवान् विष्णुका पातालमें जाना और प्रह्लादको तत्त्वज्ञानका उपदेश देना * २९७
सभी स्तुति कर रहे थे। तब सुरासुरवन्दित भगवान् मधुसूदन उनसे इस प्रकार बोले।
श्रीभगवान्ने कहा—निष्पाप प्रह्लाद ! जबतक सुमेरुगिरि, पृथ्वी तथा सूर्य और चन्द्रमाका मण्डल कायम रहेगा, तबतक तुम राज्य करोगे और तुम्हारे समस्त गुणोंकी प्रशंसा होगी। तुम राग, भय और क्रोधसे रहित होकर इष्ट-अनिष्ट फलोंका परित्याग करके समतायुक्त बुद्धिसे इस राज्यका भलीभाँति पालन करो। शत्रु-प्रजा आदिके ऊपर निग्रह-अनुग्रह आदि यथावसर प्राप्त हुई दृष्टियोंसे देश, काल और क्रियाके अनुरूप प्राप्त हुए कर्तव्यका तुम न्यायपूर्वक पालन करो और राग-द्वेष आदि विषमताका त्याग करके समबुद्धि बने रहो। आत्मा देहसे अतिरिक्त है—इस भावसे लाभ-हानिमें सम तथा इदंता ममतासे रहित कार्य करते हुए भी तुम इस जगत्में बन्धनको नहीं प्राप्त होओगे। जगद् व्यवहारको तो तुमने देख ही लिया है और उस अनुपम परमपदका अनुभव भी तुम्हें प्राप्त हो गया है। इस प्रकार तुम्हें देश-कालानुरूप सभी वस्तुएँ ज्ञात हैं। अब दूसरा और क्या उपदेश दिया जाय। अर्थात् व्यवहार और परमार्थ—दोनोंमें तुम कुशल हो, अतः अब तुम्हें उपदेशकी आवश्यकता नहीं है। राग, भय और क्रोधसे रहित तुम्हारे राजा होनेपर अब देवताओं-द्वारा प्राप्त दुःख न तो असुरोंमें टिक सकेगा और न उनका संहार ही कर सकेगा। आजसे देवताओं और दानवोंका युद्ध नहीं होगा, जिससे जगत् स्वस्थ हो जायगा।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—वत्स राम ! प्रह्लादसे ऐसा कहकर कमलनयन भगवान् नारायण देवता, किन्नर और मनुष्योंके साथ उस दैत्यसदनसे चल पड़े। उस समय प्रह्लाद आदि असुर पीछेसे उनपर अञ्जलि भर-भरकर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे, जिससे गरुडके पंखका पिछला भाग पुष्पोंसे आच्छादित हो गया। इस प्रकार क्रमश चलते हुए वे क्षीरसागरके तटपर जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने देवगणोंको विदा कर दिया और स्वयं शेषशय्यापर स्थित हो गये। इस प्रकार शेषशय्यापर विष्णु, स्वर्गलोकमें देवताओंसहित इन्द्र और पातालमें दानवराज प्रह्लाद—तीनों संतापरहित होकर स्थित हुए। श्रीराम ! प्रह्लादकी ज्ञान-प्राप्ति सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाली तथा अमृतके समान शीतल है। उसका वर्णन मैंने तुम्हें सुना दिया। संसारमें जो मनुष्य—चाहे वे घोर-से घोर पातकी ही क्यों न हों—विवेकपूर्वक उसका विचार करेंगे, वे शीघ्र ही परमपदको प्राप्त हो जायँगे। अज्ञान ही पाप कहलाता है और उस अज्ञानका नाश विवेकपूर्वक विचार करनेसे होता है; इसलिये पापका समूल विनाश करनेवाले विचारका परित्याग नहीं करना चाहिये। प्रह्लादकी इस सिद्धिका विवेक-पूर्वक विचार करनेवाले लोगोंके पूर्वके सात जन्मोंमें किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं—इसमें संशय नहीं है।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! महामनस्वी प्रह्लादका मन तो परमपदमें तल्लीन था, वह पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि सुनकर कैसे प्रबुद्ध हुआ? यह बतानेकी कृपा करें।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—निर्दोष स्वरूपवाले राम ! लोकमें दो प्रकारकी मुक्ति होती है—एक सदेहमुक्ति अर्थात् जीवन्मुक्ति और दूसरी विदेहमुक्ति। इन दोनोंका विभाग इस प्रकार है, सुनो। जिस अनासक्त बुद्धिवाले पुरुषकी इष्टानिष्ट कर्मोंके ग्रहण-त्यागमें अपनी कोई इच्छा नहीं रहती अर्थात् जिसकी इच्छाका सर्वथा अभाव हो गया है, ऐसे पुरुषकी स्थितिको तुम जीवन्मुक्त-अवस्था—सदेहमुक्ति समझो। फिर देहका विनाश होनेपर पुनर्जन्मसे रहित हुई वही जीवन्मुक्ति विदेहमुक्ति कही गयी है। श्रीराम ! जिन्हें विदेहमुक्तिकी प्राप्ति हो गयी है, वे फिर जन्म धारण करके दृश्यताको नहीं प्राप्त होते—ठीक उसी तरह, जैसे भुना हुआ