संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९४ * अविच्छिन्नसच्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
निश्चय ही हम मर्यादारहित दस्युओंके अत्याचारसे भयानक उस पातालमें जाकर दैत्यराज प्रह्लादको समाधिसे विरत करेंगे और इस सम्पूर्ण जगत्को पूर्ववत् स्वस्थ बनायेंगे। (सर्ग ३४-३८)
भगवान् विष्णुका पातालमें जाना और शङ्खध्वनिसे प्रह्लादको प्रबुद्ध करके उन्हें तत्त्वज्ञानका उपदेश देना, प्रह्लादद्वारा भगवान्का पूजन, भगवान्का प्रह्लादको दैत्यराज्यपर अभिषिक्त करके कर्त्तव्यका उपदेश देकर क्षीरसागरको लौट जाना, आख्यानका उत्तम फल, जीवन्मुक्तोंके व्युत्थानका हेतु और पुरुषार्थकी शक्तिका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—वत्स राम ! यों विचारकर सर्वात्मा भगवान् श्रीहरि शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म और लक्ष्मी आदि पार्षदोंके साथ अपने नगर क्षीरसागरसे चल पड़े। वे उसी क्षीरसागरके तलेके छिद्रसे निकलकर प्रह्लादके नगरमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने स्वर्णमय महलके मध्यमें स्थित असुरराज प्रह्लादको देखा। भगवान् विष्णुके तेजसे प्रभावित होकर वहाँका सारा दैत्य-समुदाय धूलकी तरह उड़कर उसी प्रकार अदृश्य हो गया, जैसे सूर्यकी किरणोंसे भयभीत होकर उलूक छिप जाते हैं। तब अपने परिवारसहित श्रीहरिने दो-तीन प्रधान-प्रधान असुरोंको साथ लेकर प्रह्लादके महलमें प्रवेश किया। उस समय वे गरुड़की पीठपर सवार थे। लक्ष्मीजी उनपर चँवर डुला रही थीं। वे शङ्ख, चक्र, गदा आदि अपने (सजीव) आयुधोंसे घिरे हुए थे, और देवर्षि तथा मुनि उनकी वन्दना कर रहे थे। वहाँ पहुँचकर भगवान् विष्णुने 'महात्मन् ! समाधिका त्याग करके उठो' यों कहते हुए अपना पाञ्चजन्य शङ्ख बजाया, जिसकी ध्वनिसे सारी दिशाएँ गूँज उठीं। विष्णु-भगवान्के बलपूर्वक फूँकनेसे उस शङ्खसे ऐसा घोर शब्द प्रकट हुआ, जो प्रलयकालमें एक साथ परिक्षुब्ध हुए मेघों और सागरोंकी गर्जनाके समान वेगशाली था। उस शब्दसे भयभीत होकर असुर-समूह भूमिपर गिर पड़े और विष्णुभक्त भयरहित होकर आनन्दपूर्वक हर्ष मनाने लगे। प्रह्लादके शरीरमें प्राण और अपानका संचार होनेसे नाडिविवरोंमें संवेदन आरम्भ हो गया।
फिर तो जैसे वायुसे पीड़ित होकर कमल चञ्चल हो जाता है, उसी तरह उनका शरीर स्पन्दनयुक्त हो गया तथा नेत्र, मन, प्राण और शरीर—सभी विकसित हो गये। इस अवसरपर भगवान् श्रीहरिने ज्यों ही 'जागो' ऐसा कहा, त्यों ही वह सचेत हो गया। तब कल्पके आदिमें जैसे त्रिलोकेश्वर भगवान् कमलयोनि ब्रह्मासे कहते हैं, उसी प्रकार श्रीहरिने प्रह्लादसे—जिसके नेत्र प्रफुल्लित हो गये थे, जिसे 'मैं प्रह्लाद हूँ' ऐसी पहचान हो चुकी थी और जिसकी पूर्वस्मृति सुदृढ़ हो गयी थी—यों कहना प्रारम्भ किया—
'साधो ! अब उठो, शीघ्र उठो और इस विशाल दैत्य-राज्यलक्ष्मीका तथा अपने स्वरूपका स्मरण करो। अनघ ! तुम तो जीवन्मुक्त हो, अतः राज्यशासन करते हुए ही उद्वेगरहित होकर अपने इस शरीरको कल्पान्तपर्यन्त कर्मोंमें प्रेरित करते रहो। प्रलयके समय जब इस शरीरका नाश हो जायगा, तब तुम निरतिशय सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें निवास करोगे—ठीक उसी तरह, जैसे घटके फूट जानेपर घटाकाश महाकाशमें विलीन हो जाता है। तुम्हारी यह शुद्ध देह कल्पान्ततक स्थिर रहनेवाली है, लोकके ऊँच-नीच व्यवहारोंका अनुभव कर चुकी है और जीवन्मुक्तिसे सुशोभित है। मैं गरुडपर सवार होकर स्वेदज, अण्डज, जरायुज, उद्भिज्ज—चारों प्रकारके प्राणियोंसे व्याप्त तथा सूर्य आदिके प्रकाशसे उद्भासित दसों दिशाओंमें विचरता रहता हूँ। ऐसी परिस्थितिमें तुम इस शरीरका