संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादको भगवान्द्वारा वर-प्राप्ति, प्रह्लादका आत्मचिन्तन * २९१
प्रयत्न किया, परन्तु वे नहीं जगे। तब उस राजारहित नगरमें बलवान् दैत्य लुटेरोंकी तरह स्वेच्छानुसार लूट-पाट करने लगे, जिससे उद्विग्न होकर अन्य दैत्य अपनी अभीष्ट दिशाओंमें भाग गये। उस अराजकताके कारण पाताललोक चिरकालके लिये मात्स्यन्यायसे* अस्त-व्यस्त और मर्यादारहित हो गया। वहाँ बलवानोंने दुर्बलोंके नगर छीन लिये। मर्यादाके क्रमका सर्वथा विनाश हो गया। सभी लोग स्त्रियोंको पीड़ा पहुँचाने लगे। पुरुषोंके प्रलाप और रोदनके शब्द चारों ओर व्याप्त हो गये। लोगोंने एक दूसरेके वस्त्र छीन लिये। नगरका मध्यभाग खंडहरके रूपमें परिणत हो गया और क्रीड़ोद्यान नष्ट-भ्रष्ट हो गये। सारा राज्य व्यर्थके अनर्थोंसे पीड़ित हो गया। दिशाएँ धूलसे व्याप्त हो गयीं। अन्न, फल और बन्धु-बान्धवोंका अभाव हो गया। इस प्रकार आकस्मिक उत्पातसे विवश होकर सारा असुर-समुदाय चिन्ताग्रस्त हो गया। उस समय वह असुर-मण्डल भयसे उद्विग्न हो गया था। वहाँ स्त्रियों, धन, मन्त्र और युद्ध मर्यादा-हीन हो गये थे। जिनके धन और स्त्रियोंका अपहरण हो गया था, उनका करुण-क्रन्दन चारों ओर गूँज रहा था, जिससे वह दैत्य-समाज कलियुग आनेपर लूट-पाट करनेवाले क्रूर लुटेरों-सा जान पड़ता था।
राघव ! तदनन्तर एक बार शेषशय्यापर विराजमान शत्रुसूदन श्रीहरि, जो लीलापूर्वक सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हैं, देवताओंकी प्रयोजन-सिद्धिके लिये अपनी बुद्धिसे सांसारिक स्थितिका निरीक्षण करने लगे। पहले उन्होंने मन-ही-मन स्वर्गलोकका अवलोकन करके तत्पश्चात् भूतलवासियोंके आचरणोंका निरीक्षण किया। फिर वे मनसे ही शीघ्र दैत्योंद्वारा सुरक्षित पाताललोकमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि दानवराज प्रह्लाद अटल समाधिमें स्थित हैं, जिससे अमरावतीपुरीमें सम्पत्तिकी भरपूर वृद्धि हो गयी है। तब जो शेषशय्यापर पद्मासन लगाकर बैठे थे तथा जिनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा सुशोभित हो रहे थे, उन भगवान् नारायणके मनमें ऐसा विचार उत्पन्न हुआ कि मैं रसातलमें जाकर दानवराज प्रह्लादको उसके कर्ममें पहलेकी तरह उसी प्रकार स्थापित करूँगा, जैसे वसन्त ऋतु वृक्षको पुनः उसकी पूर्व दशामें ला देती है। यदि मैं प्रह्लादके अतिरिक्त किसी दूसरेको दानवराजके पदपर स्थापित करता हूँ तो वह निश्चय ही देवताओंपर आक्रमण कर देगा। साथ ही प्रह्लादका यह अन्तिम शरीर परम पावन है। वह इसी शरीरसे कल्पपर्यन्त यहाँ निवास करेगा; क्योंकि परमेश्वरकी नियति देवीने ऐसा ही निश्चित किया है कि प्रह्लादको इसी शरीरसे यहाँ एक कल्पतक रहना चाहिये। इसलिये मैं वहाँ जाकर दैत्यराज प्रह्लादको ही जगाऊँगा, जिससे वह जीवन्मुक्तोंकी समाधिमें स्थित होकर दैत्याधिपत्यको ग्रहण करे।
* बलवान् बड़ा मत्स्य अपनेसे छोटे निर्बल मत्स्योंको निगल जाता है, इसीको 'मात्स्यन्याय' कहते हैं।
सं० यो० व० अं० १९—