संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९२ * अविच्छिन्नसंविदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
ललाटपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले शिवस्वरूप आपको मैं अभिवादन करता हूँ। कमलसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मारूप आपको प्रणाम है। देवराज इन्द्रके रूपमें विराजमान आपकी मैं वन्दना करता हूँ। भगवन् ! हम दोनोंमें जो यह भेद दृष्टिगोचर हो रहा है, वह समुद्रके जल और उसकी तरङ्गके समान केवल झूठी कल्पना ही है। वस्तुतः हम दोनोंमें कोई भेद है ही नहीं। आप सृष्टिकर्ता, सबके साक्षीरूप और अनन्त रूपोंमें प्रकट होनेवाले हैं; आपको पुनः-पुनः नमस्कार है। सबके आत्मरूप और सर्वव्यापी आप परमात्माको बारंबार प्रणाम है। देव ! मिट्टी, काष्ठ, पत्थर और जलमात्र यह सारा जगत् आपके सिवा और कुछ नहीं है। अर्थात् आपका ही स्वरूप है, अतः आपकी प्राप्ति हो जानेपर फिर किसी अन्य वस्तुके प्राप्त करनेकी इच्छा ही नहीं रह जाती। जिसका वेद-वेदान्तके सिद्धान्त, तर्क और पुराणोंके गीतोंद्वारा वर्णन किया गया है, उस परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर फिर वह कैसे विस्मृत हो सकता है। निर्मल परब्रह्म परमात्मरूप आपका साक्षात्कार हो जानेपर देहके वे सुन्दर विषय-भोग भी आज मेरे हृदयको रुचिकर नहीं लग रहे हैं। आप निर्मल दिव्य ज्योतिःस्वरूप हैं। आपसे ही सूर्यमें प्रकाशकता आयी है और शीतल हिमरूप आपसे ही चन्द्रमाको शीतलताकी प्राप्ति हुई है। आपके ही प्रभावसे ये पर्वत गुरुतासे सम्पन्न हुए हैं और आपने ही इन खेचरोंको धारण कर रक्खा है। आपके ही बलसे यह पृथ्वी अटरूपसे स्थित है और आपकी ही सत्तासे आकाश आकाशताको प्राप्त हुआ है। बड़े सौभाग्यकी बात है कि आप मेरे स्वरूपको प्राप्त हो गये हैं और मैं आपके रूपमें परिणत हो गया हूँ; अतः अब मैं आप हूँ और आप मैं हैं। इसलिये देव ! अब हम दोनोंमें भेद नहीं रह गया है अर्थात् हम एकीभावको प्राप्त हो गये हैं। इसमें भी मेरा सौभाग्य ही कारण है। मेरा आत्मा—जो सम, शुद्ध, साक्षीरूप, निराकार और दिशा-काल आदिसे रहित है, उसीमें आप स्थित हैं। आपका स्वरूप सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है। आपके ही अंदर यह संसार-मण्डल था और रहेगा। काष्ठमें व्याप्त हुई आगकी भाँति आप इस शरीरके अंदर स्थित हैं। आप ही सर्वोत्तम अमृत-स्वरूप रस हैं और तेजस्वी पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही पदार्थोंके ज्ञाता और ज्योतियोंके प्रकाश हैं। जैसे सुवर्णमें कड़े, बाजूबंद, केयूर आदि आभूषणोंका आरोप किया जाता है, उसी तरह सांसारिक पदार्थ-समूह आपमें ही आरोपित हैं। आपको प्राप्त कर लेनेपर प्रारब्धानुकूल प्राप्त हुए सुख-दुःखका प्रवाह समूल नष्ट हो जाता है—ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यके प्रकाशको पाकर अन्धकारका अथवा गरमीको पाकर हिमका नाम-निशान मिट जाता है। भगवन् ! यह सारा विश्व आपका ही स्वरूप है, आपकी जय हो। आप शान्तिपरायण, सभी प्रमाणोंसे परे और सम्पूर्ण आगमोंद्वारा जानने योग्य हैं; आपकी बारंबार जय हो।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले प्रह्लाद इस प्रकार परमात्माका चिन्तन करते-करते निर्विकल्प परमानन्दस्वरूप परमात्मामें समाधिस्थ हो गये। अपने महलमें यों समाधि-अवस्थामें पड़े हुए दैत्यवंशी प्रह्लादका बहुत-सा समय व्यतीत हो गया। उस समय यद्यपि असुरश्रेष्ठोंने उन्हें जगानेकी बहुत चेष्टा की, तथापि असमयमें उन महाबुद्धिमान्की समाधि भङ्ग न हुई। यों निश्चल ब्रह्मस्वरूप एवं शान्त हुए प्रह्लाद बाह्यदृष्टिशून्य होकर हजारों वर्षोंतक उस दैत्यनगरीमें समाधिस्थ पड़े रहे। उस समय हिरण्यकशिपु मर चुका था और उसके पुत्र प्रह्लाद समाधिस्थ हो गये थे; अतः जब पातालमें कोई अन्य राजा नहीं रह गया, तब दानवोंको अपने अधिपतिका अभाव खटकने लगा। इसलिये उन्होंने प्रह्लादको समाधिसे जगानेके लिये घोर