भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादको भगवान्‌द्वारा वर-प्राप्ति प्रह्लादका आत्मचिन्तन * २९१


इस समय मैंने उस परम ज्ञानरूपी मन्त्रके बलसे इस अहंकार-पिशाचको शरीररूपी वृक्षके खोखलेसे बाहर निकाल दिया है, जिससे मेरा यह शरीररूपी महान् वृक्ष अहंकाररूपी यक्षसे रहित होकर परम पवित्र हो गया है और प्रफुल्लित वृक्षके समान सुशोभित हो रहा है। विवेकरूपी धनराशिकी प्राप्तिके कारण जब मेरे दुराशारूपी दोष सर्वथा नष्ट हो गये, तब मेरी अज्ञानरूपी दरिद्रता भी पूर्णतया शान्त हो गयी, अतः अब मैं परमेश्वरके रूपमें स्थित हूँ। भगवान्‌की कृपासे मुझे सम्पूर्ण ज्ञातव्य वस्तुओंका ज्ञान प्राप्त हो गया है और मैंने देखने योग्य सभी दृष्टियोंको देख लिया है। इस समय मुझे वह वस्तु प्राप्त हो गयी है, जिसके पा लेनेपर कुछ भी पाना अवशिष्ट नहीं रह जाता। सौभाग्यकी बात है कि मैं उसी ऊँची एवं विस्तृत पारमार्थिक भूमिको प्राप्त हो गया हूँ, जिसमें अनर्थोंका नाम-निशान नहीं है. विषय-रूपी सर्पोंका अत्यन्त अभाव हो गया है, अज्ञानरूपी कुहरा सर्वथा नष्ट हो गया है, आशारूपी मृगतृष्णा शान्त हो चुकी है, जिसकी सारी दिशाएँ रजोगुणरूपी धूलसे रहित हो गयी हैं और जिसमें शान्तिरूपी शीतल छायावाला वृक्ष लहलहा रहा है। भगवान् विष्णुकी स्तुति, प्रणाम और प्रार्थना करनेसे तथा शम एवं यम-नियमोंके पालनसे मुझे इन सच्चिदानन्दघन परमात्माकी प्राप्ति हुई है और उन्हींकी कृपासे मैंने परमात्माको स्पष्टरूपसे देखा और समझा भी है । वह अविनाशी एवं अहंकाररहित विज्ञानघन परमात्मा भगवान् विष्णुकी कृपावश चिरकालसे मेरी स्मृतिमें सुदृढ़रूपसे स्थित हो गया है, जिससे मेरा मोह पूर्णतया शान्त हो गया है, अहंकाररूपी राक्षस नष्ट हो गया है और मैं दुराशा-रूपी पिशाचिनीसे मुक्त हो गया हूँ; अतः अब मेरा संताप मिट गया है। सबसे बड़े हर्षकी बात तो यह है कि मेरी बहुत-सी दुर्वासनाएँ, जो दुराशाओं तथा दीर्घकालसे दुष्ट देह आदिमें आत्मत्वके अभिमानसे मलिन एवं भयरूपी सर्पोंके लिये हितकारिणी थीं, भगवान्‌के ध्यानसे विनष्ट हो गयी हैं। मैंने सच्चिदानन्द-घन परमात्माका साक्षात्कार कर लिया है और उन्हें भलीभाँति जान भी लिया है। मुझे उनका यथार्थ अनुभव भी हो गया है, इसीलिये उनका नित्य संयोग मुझे प्राप्त है। अब मेरा मन—जिसके विषय-भोग, संकल्प-विकल्प और इच्छाएँ पूर्णतया नष्ट हो गयी हैं, जो अहंकारसे सर्वथा मुक्त है, जिसमें आसक्ति और विषय-भोगोंकी उत्कण्ठा लेशमात्र भी नहीं रह गयी है और जो बाहर-भीतरकी चेष्टाओंसे रहित हो गया है, संसारसे उपराम होकर परमात्मामें लीन हो गया है।

यों समस्त पदोंसे उत्कृष्ट आनन्दरूप परमात्मा चिरकालसे मेरी स्मृतिमें स्थित हुए हैं। भगवन् ! बड़े सौभाग्यसे आप मुझे उपलब्ध हुए हैं, अतः आप परमात्माके लिये मेरा नमस्कार है। प्रभो ! मैं चिरकालसे आपका दर्शन करते हुए प्रणाम करके आलिङ्गन कर रहा हूँ। भला, त्रिलोकीमें आपके अतिरिक्त मेरा परम प्रिय बन्धु और कौन हो सकता है। विश्वको उत्पन्न करनेवाले विभो ! आपने अपनी सत्ता-स्फूर्तिसे सम्पूर्ण विश्वको परिपूर्ण कर रक्खा है, इसी कारण सर्वत्र आपका नित्य अनुभव होता है; अतः आप कहाँ भागकर जा सकते हैं अर्थात् अदृश्य हो सकते हैं। परम प्रिय मित्र ! बहुसंख्यक जन्मोंके व्यवधानके कारण अज्ञानवश हम दोनोंमें जो अन्तर प्रतीत होता था, वह अब उस अज्ञानके नाश होनेसे दूर हो गया है और अभेदरूप समीपता प्राप्त हो गयी है। बड़े सौभाग्यसे मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। आप कृतकृत्य, संसारके कर्ता और सबका भरण-पोषण करनेवाले हैं; आपको बारंबार नमस्कार है। आप संसार-वृक्षके कारण, अविनाशी और विशुद्धात्मा हैं; आपको मेरा प्रणाम है। जिनके हाथोंमें चक्र और कमल सुशोभित होते हैं, उन विष्णु-रूप आपको नमस्कार है।