संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
कहाँ तो नन्दनवनकी प्रफुल्लित रमणीय वनस्थली और कहाँ संतप्त मरुस्थल ! उसी प्रकार कहाँ तो ये पारमार्थिक शान्त दिव्य ज्ञानदृष्टियाँ और कहाँ देह एवं विषय-भोगोंमें अहंता-ममताबुद्धि ! अर्थात् इनमें आकाश-पातालका अन्तर है । इस त्रिलोकीमें राज्य पाकर भी वास्तविक सुख लेशमात्र भी नहीं मिलता, किंतु मूर्खताके कारण ही मनुष्य उसे चाहता है । उधर जो सर्वव्यापक, स्वस्थ, सम, निर्विकार और सर्वरूप है, उस चेतनका आश्रय ग्रहण करनेसे सम्पूर्ण वास्तविक आनन्द सदा-सर्वदा प्राप्त होता रहता है । ये जो कोई भी विषयी मनुष्य मोहरूपी जालमें आ फँसे हैं, उनके गिरनेका प्रधान कारण उनकी संकल्प-कल्पना ही है । इसी प्रकार मेरे पितामह आदि पूर्वजोंने भी जो संकल्प-समूहोंसे आवृत और विषयरूपी गर्तमें गिरनेवाले थे, इस बाधारहित परमानन्दस्वरूप आत्मपदका अनुभव नहीं किया । इसीलिये वे भूतलपर इने-गिने दिनोंतक ही स्फुरित होकर गड्ढेमें गिरे हुए क्षुद्र मच्छरोंकी भाँति विनष्ट हो गये । सभी जीव इच्छा और द्वेषसे उत्पन्न हुए सुख-दुःखादि द्वन्द्वरूपी मोहसे युक्त होनेके कारण पृथ्वीके छिद्रमें छिपे हुए कीटोंकी समताको प्राप्त हो गये हैं; परन्तु जिसकी अनुकूल और प्रतिकूल कल्पनारूपी मृगतृष्णा सच्चिदानन्द परमात्माके ज्ञानरूपी मेघसे शान्त हो चुकी है, उसीका जीवन धन्य है ।
'ॐ'* ही जिस सच्चिदानन्द ब्रह्मका सर्वोत्तम नाम है और जो समस्त विकारोंसे सर्वथा रहित है, वह परमात्मा ही भूतलके समस्त पदार्थोंके रूपमें विराजमान है ।* ज्योतिःस्वरूप वह परमात्मा ही सूर्य आदिके अंदर स्थित होकर अपनी सत्ता-स्फूर्तिसे उन्हें प्रकाशित करता है । वही अग्निको उष्णतायुक्त करता है और जलको रसमय बनाता है । भयरहित वह परमात्मा स्वयं ही प्रकट होता है और ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त समस्त जगत्को अपनी सत्ता-स्फूर्तिसे घुमाता रहता है । वह स्थाणुसे भी बढ़कर नित्य अचल और आकाशसे भी बढ़कर नित्य निर्लेप है । इसीका सदा अन्वेषण, स्तवन और ध्यान करना चाहिये । समस्त प्राणियोंके शरीरोंके अंदर उनके हृदयकमलमें स्थित यह परमात्मा अत्यन्त सुलभ है; क्योंकि हृदयकी थोड़ी-सी भी सच्ची पुकारसे यह तत्क्षण सम्मुख प्रकट हो जाता है । यह परमात्मदेव सभी शरीरोंमें उसी प्रकार व्याप्त है, जैसे पुष्पोंमें सुगन्ध, तिलकणोंमें तेल और रसयुक्त पदार्थोंमें माधुर्य । परन्तु हृदयमें विद्यमान रहनेपर भी यह चेतन विवेक-विचारके अभावके कारण जाना नहीं जा सकता; विचारणाके द्वारा ही उस परमेश्वरका ज्ञान होता है । उसे भलीभाँति जान लेनेपर प्रियजनके समागमकी तरह परमानन्दकी प्राप्ति होती है । अतिशय आनन्द प्रदान करनेवाले परमात्मारूपी उस परमप्रेमी बन्धुका दर्शन होनेपर ऐसी ऐसी बुद्धियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनके प्रभावसे साधकका परमात्मासे कभी वियोग नहीं होता । उसके सांसारिक स्नेहके समस्त बन्धन टूट जाते हैं, काम-क्रोध आदि सारे शत्रु विनष्ट हो जाते हैं और तृष्णाएँ मनको चञ्चल नहीं कर पातीं । यही परमात्मा आकाशमें शून्यता, वायुमें स्पन्दन, तेजस्वी पदार्थोंमें प्रकाश, जलमें उत्तम मधुरता, पृथ्वीमें कठोरता, अग्निमें उष्णता, चन्द्रमामें शीतलता और सृष्टिसमूहमें सत्तारूपसे स्थित है ।
अज्ञानरूपी शत्रुने मेरे विवेक-धनका अपहरण करके उसका सर्वनाश कर डाला था और वह इतने कालतक मुझे कष्ट देता रहा; परंतु इस समय स्वतः उत्पन्न हुई सर्वोत्तम विष्णु-कृपासे मुझे परम तत्त्वका ज्ञान हो गया है, जिससे मैंने उस अज्ञानका परित्याग कर दिया है ।
* 'ओमिति ब्रह्म—ॐ ब्रह्म है', 'ओमितीदं सर्वम्—ॐ यह सब कुछ है', 'एतद् वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः—सत्यकाम ! यह पर और अपर ब्रह्म है, जो यह ओंकार है ।'