संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ]
- प्रह्लादको भगवान्द्वारा वर-प्राप्ति, प्रह्लादका आत्मचिन्तन * २८९
करते समय अपने हृदयमें यों विचार करने लगे कि आवागमनरूपी संसारका निवारण करनेवाले भगवान्ने मुझे ऐसा उपदेश दिया है कि 'तुम विवेक-विचार-संयुक्त होओ। अतः अब मैं अपने अन्तःकरणमें आत्म विचार करनेमें तत्पर होता हूँ। वृक्ष, तृण और पर्वतोंसे युक्त यह जगत् तो मैं हूँ नहीं; क्योंकि जो बाह्य और अत्यन्त जड है, वह मैं कैसे हो सकता हूँ। अचेतन शरीर भी मैं नहीं हूँ; क्योंकि यह असत् होता हुआ भी प्रकट, जड़ होनेके कारण बोलनेमें असमर्थ, प्राण-वायुओंद्वारा अपने संचरणकालमें ही परिचालित और अल्प कालमें ही विनष्ट होनेवाला है। मैं तो केवल वह शुद्ध चेतन ही हूँ, जो ममताहीन, मननरूप मनके व्यापारसे शून्य, शान्त, पाँचों इन्द्रियोंके भ्रमोंसे रहित और मायाके सम्बन्धसे हीन है। यह जो सबका प्रकाशक, बाहर-भीतर सर्वत्र व्याप्त, अखण्ड, निर्मल और सत्तामात्र है, वह जड़-दृश्यरहित शुद्ध चिन्मय आत्म-स्वरूप ही मैं हूँ। यह आत्मा, जो सर्वव्यापक और विकल्प-
रहित चिन्मय बोधस्वरूप है, वह मैं ही हूँ। यह आत्मा ही जगत्की स्थितिमें निरन्तर अनुभवमें आनेवाले समस्त पदार्थोंका आदि कारण है, परंतु इस आत्माका कोई कारण नहीं है। इसी आत्मासे सारे पदार्थोंका पदार्थत्व उत्पन्न होता है। ये घट-पट आदि आकारवाले सैकड़ों सांसारिक पदार्थ विशाल दर्पणरूप इस चिन्मय शुद्ध आत्मामें प्रतिबिम्बित होते हैं। यह अकेला मैं, जो आदि और अन्तसे रहित तथा सर्वव्यापक हूँ, सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंके अंदर आत्मस्वरूपसे स्थित हूँ। मेरा यह साँवला स्वरूप—जो शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाला तथा सम्पूर्ण सौभाग्योंकी चरम सीमा है, इस जगत्का पालन करता है। जो कमलरूपी आसनपर विराजमान होते हैं और निर्विकल्प समाधिमें स्थित होकर परम सुखका अनुभव करते हैं, उन ब्रह्माके रूपमें मैं ही सदा इस जगत्में उत्पन्न होता हूँ। मैं ही त्रिनेत्र-धारी शिव होकर प्रलयकालमें इस जगत्का संहार करता हूँ। मैं ही इन्द्ररूपसे मन्वन्तरके क्रमसे प्राप्त हुई इस सम्पूर्ण त्रिलोकीका पालन करता हूँ। यह जो कुछ स्थावर-जंगमरूप जगत् दृष्टिगोचर हो रहा है, सम्पूर्ण संकल्पोंसे रहित वह परम शुद्ध चेतन आत्मरूप मैं ही हूँ। जिसमें अनन्त आनन्दका अनुभव प्राप्त होता है तथा जो परम शान्तिसे सुशोभित एवं शुद्ध है, ऐसी यह चिन्मयी दृष्टि सम्पूर्ण दृष्टियोंसे बढ़कर है। जो शाश्वत एवं विज्ञानानन्दघनरूप है, उस उत्तम साम्राज्यका परित्याग करके मुझे इन अनित्य एवं दुःखरूप राज्य-विभूतियोंमें लेशमात्र भी सुखकी प्रतीति नहीं होती; क्योंकि ये विभूतियाँ रमणीय नहीं हैं। ऐसे विज्ञानानन्दघन परम पदको छोड़कर मूर्ख ही तुच्छ विषय-भोगोंमें आसक्त होता है, विवेकशील ज्ञानी नहीं। भला, इस परम दिव्यदृष्टिका त्याग करके कौन मनुष्य घृणा करने योग्य तुच्छ राज्यमें आसक्त होगा। जिन्होंने इस उत्तम दृष्टिका परित्याग करके दुःखरूप क्षणभङ्गुर राज्यमें मन लगाया, वे सब-के-सब वास्तवमें मूर्ख ही थे; क्योंकि