संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उस बालवपुके उदरभागमें यह घनीभूत सारी सृष्टि पूर्णतया समायी हुई है। वे भगवान् नित्य निरन्तर विराजमान, जन्म-वृद्धि आदि विकारोंसे रहित तथा विशाल (सर्वत्र व्यापक) हैं।
नूतन खिले हुए नाभि-कमलके परागसे जिनका वक्षःस्थल गौरवर्णका प्रतीत होता है, जिनका वामाङ्ग लक्ष्मीजीके दीप्तिमान् देहसे विभूषित है, जो सायंकालिक अरुण किरणके समान लाल अङ्गराग धारण करते हैं तथा सुवर्णके समान रंगवाले रेशमी पीताम्बरसे जिनका श्रीविग्रह परम सुन्दर दिखायी देता है, उन भगवान् श्रीनारायणकी मैं शरण लेता हूँ।
दैत्यरूपिणी कमलिनीपर तुषारपात करनेके लिये जो हेमन्त और शिशिरके समान हैं, देवरूपिणी नलिनीको विकसित करनेके लिये सदा उदित रहनेवाले सूर्यबिम्बके सदृश हैं तथा ब्रह्मारूपी कमलके उद्भवके लिये जो जलसे भरे हुए तड़ागके तुल्य हैं, उपासकोंके हृदय-कमलमें निवास करनेवाले उन भगवान् श्रीहरिका मैं आश्रय लेता हूँ।
जो त्रिभुवनरूपी कमलके विकासके लिये सूर्यके सदृश हैं, अन्धकारकी भाँति बुद्धिको आच्छादित करनेवाले मोह या अज्ञानका निवारण करनेके लिये उत्तम एवं प्रज्वलित दीपकके तुल्य हैं, जिनमें जड़तारूपिणी मायाका अभाव है, जो सदा अपने स्वरूपको प्रकाशित करते हैं अथवा नित्य दिव्य प्रकाश जिनका रूप है, उन चिन्मय आत्मतत्त्वस्वरूप तथा सम्पूर्ण जगत्की सारी पीड़ाओंको हर लेनेवाले श्रीहरिकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार बहुत-सी गुणवाग्रियोंसे युक्त स्तुति-ऋचाओंद्वारा पूजित हुए असुर-विनाशक तथा नील कमलदलके समान श्याम भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होकर प्रीतियुक्त भक्त दैत्यराज प्रह्लादसे बोले। (सर्ग ३२-३३)
प्रह्लादको भगवान्द्वारा वर-प्राप्ति, प्रह्लादका आत्मचिन्तन करते हुए परमात्माका साक्षात्कार करना और उनका स्तवन करते हुए समाधिस्थ हो जाना, तत्पश्चात् पातालकी अराजकताका वर्णन और भगवान् विष्णुका प्रह्लादको समाधिसे विरत करनेका विचार
श्रीभगवान्ने कहा—दैत्यकुलशिरोमणि प्रह्लाद ! तुम तो गुणोंके आकर हो, अतः जन्म-मरणरूपी दुःखकी निवृत्तिके लिये तुम पुनः अपना अभीष्ट वर माँग लो।
प्रह्लाद बोले—भगवन् ! आप समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें विराजमान होकर उनके इच्छानुसार फल प्रदान करनेवाले हैं; अतः विभो ! आप जिस वस्तुको सबसे श्रेष्ठ समझते हों, वही मुझे देनेकी कृपा कीजिये।
श्रीभगवान्ने कहा—निष्पाप प्रह्लाद ! जबतक तुम्हें ब्रह्मतत्त्वकी प्राप्ति न हो जाय, तबतक तुम सम्पूर्ण संशयोंकी पूर्णतया शान्ति तथा सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप फलके लिये विचारपरायण बने रहो।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! दैत्यराज प्रह्लाद-से ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। उन विष्णुदेवके अन्तर्हित हो जानेपर प्रह्लादने पूजाके अन्तमें मणि-रत्नोंसे सुशोभित पुष्पाञ्जलि समर्पित की। उस समय उनका चित्त अत्यन्त प्रसन्न था। वे एक श्रेष्ठ आसनपर पद्मासन लगाकर बैठ गये और स्तोत्रपाठ