भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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उपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्य पूजा * २८७


प्रकार उनका मन कान्ताओंमें नहीं रमता था, शास्त्रीय बातोंकी चर्चाके सिवा अन्य लोकचर्चाओंमें उनका मन नहीं लगता था। नाशवान् दृश्य पदार्थोंसे उनकी आसक्ति सर्वथा दूर हो गयी थी। भगवान् विष्णुने क्षीरसागर-रूपी मन्दिरमें रहते हुए ही अपनी सर्वव्यापिनी परम दिव्य बुद्धिके द्वारा प्रह्लादकी उस उच्चतम स्थितिको जान लिया। तदनन्तर भक्तोंको आह्लाद प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णु पाताल-मार्गसे प्रह्लादके उस भवनमें पधारे, जिसमें वे अपने इष्टदेवकी पूजा किया करते थे। कमलनयन भगवान् विष्णुको आया हुआ जानकर दैत्यराज प्रह्लादने पहलेकी अपेक्षा दुगुनी वैभवशालिनी सामग्रीसे सुशोभित पूजा-विधिद्वारा उनका आदर-सत्कारपूर्वक पूजन किया। तत्पश्चात् पूजागृहमें पधारे हुए भगवान्

श्रीहरिको प्रत्यक्ष विराजमान देख परम प्रीतियुक्त हुए प्रह्लादने भक्तिभावसे परिपुष्ट हुई वाणीद्वारा उनका स्तवन आरम्भ किया।

प्रह्लाद बोले—जो त्रिभुवनरूपी रत्नको सुरक्षित रखनेके लिये मनोहर कोषागार हैं, उपासकोंके सारे पापोंको हर लेनेवाले हैं, अज्ञानान्धकारसे परे परम प्रकाश-स्वरूप हैं, अशरणको शरण देनेवाले तथा शरणागत-पालक हैं, उन अजन्मा, अच्युत, परमेश्वर श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ।

जो प्रफुल्ल नील कमलदल तथा नील मणिके समान श्याम सुन्दर कान्तिसे सुशोभित हैं, जिनके श्याम विग्रहके लिये शरद् ऋतुके निर्मल आकाशके मध्यभागसे उपमा दी जाती है, भ्रमर, अन्धकार, काजल और अञ्जनके समान नील आभासे जिनके श्रीअङ्ग प्रकाशित होते हैं तथा जो अपने हाथोंमें कमल, चक्र एवं गदा धारण करते हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

जो परम निर्मल हैं, जिनके कोमल अङ्ग अलिकलाप (भ्रमर-राशि)-के समान श्याम हैं, जिनके हाथमें श्वेत दलवाले अधखिले कमलके समान शङ्ख शोभा पाता है, जिनके नाभि-कमलमें वेदमन्त्रोंकी ध्वनिरूप गुञ्जारवसे युक्त ब्रह्मारूपी भ्रमर विराजमान हैं तथा जो अपने भक्तजनोंके हृदय-कमल-दलमें निवास करते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ।

भगवान्के श्वेत नख-समूह जहाँ तारोंके समान छिटके हुए हैं, जहाँ मधुर मुस्कानकी ज्योत्स्नासे उज्ज्वल मुखरूपी पूर्ण चन्द्रमण्डलका प्रकाश छा रहा है तथा हृदयस्थित कौस्तुभ मणिकी किरणोंका समूह जहाँ आकाश-गङ्गाकी छटा छिटका रहा है, उन सर्व-व्यापी श्रीहरिरूपी शरत्कालिक निर्मल आकाशकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

प्रलयकालमें अक्षयवटके पत्रपर शयन करनेवाले शिशुरूप बालमुकुन्दकी मैं शरण लेता हूँ। बालरूप होनेपर भी उनका अनन्त कल्याणमय दिव्य गुणगणोंसे सुशोभित शरीर बहुत पुराना (वृद्ध) है। उनके