भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 325
२८६* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तदनन्तर दानवराज प्रह्लादने सुप्रसिद्ध देवमन्दिरमें बाह्य वैभवोंसे परिपूर्ण पूजनके उपचारोंद्वारा भगवान् जनार्दनकी पूजा की। मानस-पूजनमें बताये गये क्रमसे ही बाह्य पदार्थोंके अर्पणद्वारा बारंबार परमेश्वर श्रीहरिका पूजन करके दानवराज प्रह्लादको बड़ा संतोष हुआ। तभीसे प्रह्लाद प्रतिदिन पूर्ण भक्तिभावसे परमेश्वरकी पूजा करने लगे। फिर तो उस नगरके सभी दैत्य उसी दिनसे भव्य वैष्णव बन गये; क्योंकि राजा ही आचारका कारण होता है। (सजा सदाचारी हो तो प्रजा भी सदाचारपरायण होती है।) शत्रुसूदन श्रीराम ! फिर तो आकाशवर्ती देवलोकमें यह बात फैल गयी कि सारे दैत्य द्वेष छोड़कर भगवान् विष्णुके भक्त हो गये हैं। रघुनन्दन ! यह सुनकर इन्द्र आदि देवता और मरुद्गण बड़े विस्मित हुए कि दैत्योंने भगवान् विष्णुकी भक्ति कैसे अपनायी। आश्चर्यमें डूबे हुए देवता अन्तरिक्षवर्ती स्वर्गलोकको छोड़कर क्षीरसागरमें शेषनागकी शय्यापर विराजमान भगवान् श्रीहरिके पास गये । वहाँ बैठे हुए भगवान्‌से उन्होंने दैत्योंका सारा समाचार कह सुनाया और इस अपूर्व आश्चर्य तथा विस्मयसे भरे हुए स्वभाव-परिवर्तनका कारण पूछा।

देवता बोले—भगवन् ! यह क्या बात है ? जो दैत्य सदा ही आपके विरोधी रहे, वे ही आपकी भक्तिमें कैसे तन्मय हो गये ? कहाँ तो वे अत्यन्त दुराचारी दानव और कहाँ आप भगवान् जनार्दनके प्रति उत्तम भक्ति। कहाँ तो पामरोचित कार्य करनेवाला, सदा निन्दित कर्मोंमें निरत और हीन जातिवाला बेचारा दानव-समाज और कहाँ आप भगवान् विष्णुकी उत्तम भक्ति।

श्रीभगवान् बोले—देवताओ ! तुम विषादमें न पड़ो। शत्रुदमन प्रह्लाद भक्तिमान् हो गये हैं। यह उनका अन्तिम जन्म है। अब वे मोक्षके अधिकारी हो गये हैं। इसके बाद ये दानव प्रह्लाद गर्भवास नहीं कर सकते। जैसे भूना हुआ बीज अङ्कुर नहीं उत्पन्न कर सकता, उसी प्रकार ज्ञानाग्निसे दग्ध हुए कर्म बन्धन-कारक नहीं हो सकते। श्रेष्ठ देवगण ! तुमलोग अपने-अपने विचित्र लोकोंमें पधारो। प्रह्लादकी यह गुणवत्ता (उनकी यह भगवद्भक्ति) तुम्हें दुःख देनेवाली नहीं हो सकती।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देवताओंसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये और देवताओंका समुदाय स्वर्गलोकको लौट गया। तबसे प्रह्लादके प्रति देवताओंकी मित्रता हो गयी । भक्त प्रह्लाद इसी प्रकार प्रतिदिन मन, वाणी और क्रियाद्वारा देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी पूजा करने लगे। पूजामें तत्पर रहनेवाले प्रह्लादके हृदयमें समय पाकर विवेक, आनन्द, वैराग्य और विभूति आदि गुण बढ़ने लगे। जैसे पक्षी सूखे हुए वृक्षको पसंद नहीं करते, उसी प्रकार प्रह्लादने भोग-समूहोंका अभिनन्दन नहीं किया—भोगोंकी ओरसे उनकी रुचि हट गयी। जैसे मृग जनसमुदायसे भरी हुई भूमिमें प्रसन्न नहीं होता, उसी