भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 750 में से

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उपशम-प्रकरण ] * प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्य पूजा * २८५

प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्य पूजा, उसके प्रभावसे समस्त दैत्योंको वैष्णव हुआ देख विस्मयमें पड़े हुए देवताओंका भगवान्‌से इसके विषयमें पूछना, भगवान्‌का देवताओंको सान्त्वना दे अदृश्य हो प्रह्लादके देवपूजा-गृहमें प्रकट होना और प्रह्लादद्वारा उनकी स्तुति

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार विचार करके भावनाद्वारा अपने शरीरको साक्षात् नारायण-का स्वरूप बनाकर प्रह्लादने उन असुरारि श्रीहरिकी पूजाके लिये फिर इस प्रकार चिन्तन आरम्भ किया—'मैं भावना-दृष्टिसे देख रहा हूँ कि ये भगवान् विष्णु दूसरा शरीर धारण करके मेरे भीतरसे बाहर आकर खड़े हैं, गरुड़की पीठपर बैठे हैं, चतुर्विध शक्तियोंसे सम्पन्न हैं। इनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा आदि शोभा पा रहे हैं। भगवान्‌के श्रीअङ्ग सुन्दर श्याम कान्तिसे सुशोभित हैं। इनके चार भुजाएँ हैं। चन्द्रमा और सूर्य ही इनके नेत्र हैं। ये अद्भुत शोभासे सम्पन्न हैं। कान्तिमान् नन्दक नामक खड्गसे अपने भक्तजनोंको आनन्द प्रदान करते हैं। इनके हाथमें कमल शोभा दे रहा है। नेत्र । दे रहे हैं। ये शार्ङ्गधनुष धारण करते हैं और महान् तेजसे सम्पन्न हैं। इनके पार्षद इन्हें सब ओरसे घेरे हुए हैं। इसलिये मैं शीघ्र ही भावनाभावित समस्त सामग्रियों-से सुशोभित मानसिक पूजाद्वारा इनका पूजन आरम्भ करता हूँ। इसके बाद बाहरी उपकरणोंसे युक्त और अनेक प्रकार-के रत्नोंसे परिपूर्ण विशाल पूजाका भी आयोजन करके इन महान् देव नारायणकी पूजा-अर्चा करूँगा।'

ऐसा विचारकर प्रह्लादने विविध पूजा-सामग्रियोंके सम्भारसे युक्त मनके द्वारा कमलापति माधवका पूजन आरम्भ किया। रत्नसमूहोंसे जटित नाना प्रकारके पात्रों-द्वारा अभिषेक करके भगवान्‌के श्रीअङ्गोंमें उन्होंने चन्दन आदिका अनुलेप किया। फिर नाना प्रकारके धूप-दीप निवेदन किये, भाँति-भाँतिके वैभवशाली आभूषण पहनाये, मन्दार-पुष्पोंकी मालाएँ धारण करायीं, सुवर्णमय कमलोंकी राशि भेंट की, कल्पवृक्षकी लताओं तथा रत्नोंके गुच्छ (गुलदस्ते) अर्पित किये, दिव्य वृक्षोंके पल्लव तथा नाना प्रकारके फूलोंके हार उपहारमें दिये, किंकिरात, बक, कुन्द, चम्पा, नीलकमल, लालकमल, कुमुद, काश, खजूर, आम, पलाश, अशोक, मैनफल, वेठ, कनेर, किरातक, कदम्ब, बकुल, नीम, सिन्दुवार, जूही, पारिभद्र, गुग्गुल और बिन्दुक आदिके यथायोग्य पत्र-पुष्प एवं फल अर्पित किये। प्रियङ्गु, पाट, पाटल धातुपाटल, आम, अमड़ा, गव्य, हरें और बहेड़े भेंट किये। शाल, ताल और तमालके लता, फूल एवं पल्लव चढ़ाये, कोमल-कोमल कलिकाएँ अर्पित कीं, सहकार, कुङ्कुम, केतक, शतपत्र और इलायचीकी मञ्जरियाँ अर्पित कीं। फिर नैवेद्य, ताम्बूल, आरती और पुष्पाञ्जलि आदि सभी सुन्दर-सुन्दर उपचारोंको सादर समर्पित किया। अन्तमें अपने आपको श्रीहरिके चरणोंमें भेंट कर दिया। इस प्रकार जगत्‌के सारे वैभवोंसे भव्य प्रतीत होनेवाली पूजन-सामग्री एवं उच्चकोटिकी भक्तिसे प्रह्लादने अन्तःपुरमें अपने स्वामी भगवान् विष्णुका मानसिक पूजन किया।

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