संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 316, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण] * राजा बलिका शुक्राचार्यके दियेहुए उपदेशपर विचार करते-करते समाधिस्थ हो जाना * २७९
अर्थभूत तुरीय परमात्माका चिन्तन करने लगे और चुपचाप समाधिस्थ हो गये। उस समय बलिके सारे संकल्प शान्त हो गये, समस्त कल्पनाएँ विलीन हो गयीं। उनके भीतर किसी प्रकारकी शङ्का नहीं रह गयी। वे ध्याता, ध्येय और ध्यानसे रहित हो गये। उनकी बुद्धिसे चेत्य, चिन्तक और चिन्तनकी त्रिपुटी दूर हो गयी। वे निर्मल और वासनाशून्य हो वायुरहित स्थानमें रक्खे हुए दीपककी लौके समान निश्चल हो गये। वे महान् पद (परमात्मा) को प्राप्त हो गये थे। उनका मन सर्वथा शान्त हो गया था। वे वहाँ रत्ननिर्मित वातायन (खिड़की) में दीर्घकालतक उसी तरह अविचल भावसे बैठे रहे, मानो प्रस्तरमें खुदी हुई मूर्ति हों।
रघुनन्दन! तदनन्तर बलिके अनुचर दानवलोग स्फटिकमणिके बने हुए उनके महलकी ऊँची अट्टालिकापर क्षणभरमें चढ़ गये। डिम्भ आदि धीर मन्त्री, कुमुद आदि सामन्त, सुर आदि राजा, वृत्त आदि सेनापति, हयग्रीव आदि सैनिक, चाक्राज आदि भाई-बन्धु, लहुक आदि सुहृद्, वल्लुक आदि लाड़ लड़ानेवाले सखा, हाथमें भेंट लेकर उपस्थित हुए कुबेर, यम और इन्द्र आदि देवता, सेवाका अवसर चाहनेवाले यक्ष, विद्याधर और नाग उस समय बलिकी सेवाके लिये उस स्थानपर आ पहुँचे। इनके सिवा त्रिलोकीके भीतर निवास करनेवाले अन्य बहुत-से सिद्ध भी आये। उनके पास आकर उन सबके मुकुट प्रणामके लिये झुक गये। उन सबने बड़े आदरके साथ राजा बलिको देखा, वे ध्यानमें मौन हो समाधिस्थ हो गये थे और चित्रलिखित पुरुषकी भाँति निष्कम्पभावसे बैठे थे। उस अवस्थामें उनका दर्शन करके अवश्य-कर्तव्य प्रणाम आदि कर चुकनेपर वे महान् असुर पहले तो उन्हें निष्प्राण समझकर विषादमें डूब गये, परंतु उनके मुखपर छायी हुई प्रसन्नता देख विस्मित हुए। तत्पश्चात् रोमाञ्च आदि आनन्दके चिह्न देखकर वे स्वयं भी आनन्दमग्न हो गये। परंतु उस समय अपना कोई रक्षक न देखकर वे भयके कारण शिथिल होने लगे। फिर दानव मन्त्रियोंने यह विचार किया कि अब यहाँ हमारे लिये कौन-सा कर्तव्य प्राप्त है। यह विचार आते ही उन्होंने सर्वज्ञ पुरुषोंमें श्रेष्ठ दैत्यगुरु शुक्राचार्यका स्मरण किया। स्मरण करते ही दैत्योंनें देखा, भृगुनन्दन शुक्र अपने तेजस्वी शरीरसे वहाँ उपस्थित हैं। असुरोंने उनकी पूजा की, फिर वे गुरुके उच्च सिंहासनपर विराजमान हुए। तदनन्तर शुक्राचार्यने