भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२७८* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

दिया गया बहुत-सा उपदेश भी राखमें डाली गयी आहुतिके समान व्यर्थ है। चेतनकी जो विषयाकार कल्पना है, वही बन्धन है। उससे छूटना ही मोक्ष कहलाता है। विषयाकाररहित चेतन ही पूर्ण ब्रह्म परमात्मा है, यह समस्त सिद्धान्तोंका सार है। इस सिद्धान्तको ग्रहण करके यदि तुम स्वयं अखण्डाकार वृत्तिसे अपने द्वारा अपने आपका यथार्थ अनुभव करोगे तो अनन्त परमपदस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाओगे। मैं इस समय देवलोकको जाता हूँ। मुझे यहाँपर सप्तर्षि मिले थे। वहाँ देवताओंके किसी कार्यके लिये मुझे रहना होगा।

ऐसा कहकर शुक्राचार्यजी ग्रहसमुदायसे भरे हुए आकाशमार्गसे चले गये। (सर्ग २५-२६)


राजा बलिको शुक्राचार्यके दिये हुए उपदेशपर विचार करते-करते समाधिस्थ हो जाना, दानवोंके स्मरण करनेसे आये हुए दैत्यगुरुका बलिकी सिद्धावस्थाको बताकर उनकी चिन्ता दूर करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! देवताओं और असुरोंकी सभामें श्रेष्ठ माने जानेवाले भृगुनन्दन शुक्राचार्यके चले जानेपर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बलिने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—"भगवान् शुक्राचार्यने यह ठीक ही कहा है कि 'ये तीनों लोक चेतन ही हैं। मैं चेतन हूँ, ये सब लोग चेतन हैं, दिशाएँ चेतन हैं और ये सब क्रियाएँ भी चेतन ही हैं।' वास्तवमें जगत्‌के बाहर और भीतर सब चेतन ही है। चेतनके अतिरिक्त यहाँ कहीं कुछ भी नहीं हैं। इन्द्रियाँ चेतन हैं, शरीर चेतन है, मन चेतन है, उसकी इच्छा चेतन है, भीतर चेतन है, बाहर चेतन है, आकाश चेतन है, समस्त भाव-पदार्थ चेतन हैं तथा इस जगत्‌की स्थिति भी चेतन ही है। अर्थात् जो कुछ भी है, वह एक सच्चिदानन्दघन परमात्माका ही स्वरूप है। वहाँ केवल चेतन-ही-चेतन है, दूसरी कोई कल्पना ही नहीं है। संसारमें जब द्वैतकी सम्भावना ही नहीं है अर्थात् एक चेतन परमात्माके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी सत्ता ही नहीं है, तब कौन किसका शत्रु है और कौन किसका मित्र। बहुत विचारनेसे भी इस विशाल त्रिलोकीके भीतर चेतनके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु सिद्ध नहीं होती। उस अतिशय शुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मामें न द्वेष है न राग, न मन है और न उसकी वृत्तियाँ ही। फिर उस चिन्मय परमात्मामें विकल्पकी कल्पना हो ही कैसे सकती है। मैं सर्वत्र विचरनेवाला, व्यापक, नित्यानन्दमय, विकल्प-कल्पनासे रहित तथा द्वैतसे शून्य सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही हूँ। मैं आकाशके समान सर्वव्याप्त, अनन्त और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हूँ; इसलिये ये सुख-दुःख आदिकी दशाएँ मेरे पास नहीं फटक पातीं।"

इस प्रकार विचार करते हुए ही परम विवेकी दैत्यराज बलि ओंकारसे प्रकट हुए उसकी अर्धमात्रा (मकार