संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * बलिका पिताके दिये हुए ज्ञानोपदेशके स्मरणसे संतोष * २७७
प्राणियोंको पददलित कर दिया, तो भी इससे मुझे कौन-सा सुन्दर लाभ मिला ? परलोकमें, इस लोकमें तथा अन्य स्वर्ग आदिमें इधर-उधर, बारंबार वे ही पहलेकी अनुभव की हुई वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं। कहीं कोई अपूर्व (नूतन) वस्तु नहीं है । पातालमें, भूलोकमें और स्वर्गमें सार पदार्थ क्या है—सुन्दरी स्त्रियाँ, रत्न एवं मणिमय प्रस्तर आदि । परंतु काल इन सबको क्षणभरमें निगल जाता है । आजसे पहले इतने समयतक मैं पूरा मूर्ख बना रहा जो तुच्छ सांसारिक वस्तुओंकी इच्छासे देवताओंके साथ द्वेष करता रहा । जो मनकी कल्पनामात्रा है, उस जगत् नामकी महती मानसिक व्यथाका त्याग न करनेसे कौन-सा पुरुषार्थ सिद्ध होता है ? इसमें महात्मा पुरुषका क्या अनुराग होगा ? अहो ! बड़े दुःखकी बात है कि अज्ञानरूपी मदसे मत्त हुए मैंने दीर्घकालतक अनर्थमें ही अर्थ-बुद्धि करके स्वयं ही उसका सेवन किया । अत्यन्त चञ्चल तृष्णावाले मुझ मूर्खने तीनों लोकोंमें केवल अपने पश्चात्तापको बढ़ानेके लिये अबतक क्या नहीं किया ? अब मैं आश्रित जनोंपर सदा प्रसन्न रहनेवाले गुरुदेव भगवान् शुक्राचार्यका चिन्तन करता हूँ । उनकी वाणीद्वारा उपदेश पाकर मैं अनन्त प्रभावशाली विज्ञानानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें स्थित होऊँगा; क्योंकि महात्माओंके उपदेश-वाक्य अक्षय वस्तुको फलरूपमें उत्पन्न करते हैं—अविनाशी तत्त्वका बोध करा देते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! बलवान् बलिने ऐसा सोचकर आँखें बंद कर लीं और विज्ञानानन्दघन ब्रह्मस्वरूप आकाशमें स्थित कमलनयन शुक्राचार्यका चिन्तन किया । तब परमात्माके ध्यानमें नित्य तत्पर रहनेवाले शुक्राचार्यने सर्वव्यापी ब्रह्मके स्वरूपमें स्थित और चित्तके द्वारा परमात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले अपने शिष्य बलिके विषयमें यह जान लिया कि वह अपने नगरमें तत्त्वज्ञानकी इच्छा रखकर गुरुसे मिलना चाहता है । यह जानकर प्रभु शुक्राचार्यजी, जो सर्वगत अनन्त चेतन परमात्मामें स्थित हैं, अपने आपको बलिकी रत्ननिर्मित खिड़कीके पास ले आये अर्थात् वे बलिके यहाँ स्वयं उपस्थित हो गये । वहाँ राजा बलिने रत्नमय अर्घ्य देकर, मन्दारवृक्षके पुष्पोंकी राशियाँ चढ़ाकर और चरणोंमें मस्तक झुकाकर इन शुक्राचार्यका पूजन किया । जब वे रत्नमय अर्घ्य ग्रहण करके पूर्णतया पूजित तथा मन्दारवृक्षके फूलोंद्वारा निर्मित मुकुटसे विभूषित होकर बहुमूल्य आसनपर विराजमान हो गये, तब बलिने अपने उन गुरुदेवसे इस प्रकार कहा ।
बलि बोले—भगवन् ! जैसे नवोदित सूर्यकी प्रभा संध्या-वन्दन आदि कर्म करनेके लिये लोगोंको प्रेरित करती है, उसी प्रकार आपके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुई मेरी यह बुद्धि मुझे आपके सामने कुछ कहनेके लिये प्रेरित कर रही है । प्रभो ! मैं महान् मोह प्रदान करनेवाले भोगोंसे विरक्त हूँ, इसलिये ऐसे परम तत्त्वको जानना चाहता हूँ, जो अपने ज्ञानमात्रसे महान् मोहका नाश कर दे।
शुक्राचार्य बोले—सर्वदानवराजेन्द्र ! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ ? मैं आकाशमें जानेके लिये उद्यत हूँ; इसलिये संक्षेपसे सार तत्त्व बता रहा हूँ, सुनो ! इस संसारमें एकमात्र चेतन ही है । यह सब जगत् भी चेतनमात्र—चिन्मय ही है । तुम भी चिन्मय, मैं भी चिन्मय और ये लोक भी चिन्मय हैं। अर्थात् जो कुछ भी दिखायी देता है, वह सब एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है—यह समस्त सिद्धान्तोंका सार है । यदि तुम श्रद्धालु हो तो इस निश्चयसे तुम सब कुछ प्राप्त कर सकते हो; और यदि तुममें श्रद्धा नहीं है तो तुम्हें