संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
दानवराज बलिको देखा, जो मौनभावसे ध्यानमग्न होकर बैठे थे। क्षणभर विश्राम करके शुक्राचार्यने बड़े प्रेमसे बलिकी ओर देखा और विचार करके वे इस निश्चयपर पहुँचे कि बलिका संसाररूपी भ्रम नष्ट हो गया है। तत्पश्चात् गुरुने उस दैत्यमण्डलीसे कहा—'दैत्यो ! ये
ऐश्वर्यशाली बलि अपनी विचारधारासे ही विशुद्ध परमपदको प्राप्त होकर सिद्ध हो गये हैं। यही अतिशय शान्तमय परमानन्द है। दानव-शिरोमणियो ! ये इसी तरह समाधिमें स्थित हो अपने परमानन्दस्वरूप आत्मामें नित्य स्थितिको प्राप्त हों और निर्विकार परमपदका साक्षात्कार करें। दानवो ! जैसे थके हुए पुरुषको विश्राम मिले, उसी प्रकार ये बलि भी चित्तकी भ्रान्तिसे रहित हो परम विश्रामको प्राप्त हुए हैं। इनका संसाररूपी कुहरा (अज्ञान) शान्त हो गया है; अतः इस समय तुमलोग इनसे बातचीत न करो। जैसे भूतलपर रात्रिके अन्धकार एवं निद्रा आदिके शान्त होनेपर दिनमें सूर्यकी किरणोंका समुदाय प्राप्त होता है, उसी प्रकार इनका अज्ञानयुक्त भ्रम दूर हो जानेपर अब इन्हें अपना ही प्रकाश प्राप्त हुआ है। समय आनेपर ये स्वयं ही इस समाधिसे जाग उठेंगे। दानवनायको ! तुम सब लोग अपने स्वामीके कार्य करो। ये राजा बलि एक सहस्र वर्षपर समाधिसे उठेंगे।
गुरुदेवके ऐसा कहनेपर दैत्योंने हर्ष, अमर्ष और दुःखसे उत्पन्न हुई चिन्ताको त्याग दिया तथा पहलेकी व्यवस्थाके अनुसार बलिकी राज्य-सभाका सुदृढ संगठन करके वे सभी असुर यथाधिकार अपने-अपने कार्यमें संलग्न हो गये। तत्पश्चात् पन्नग भूतलको, नागराज रसातलको, ग्रह अन्तरिक्षको, देववृन्द स्वर्गको, पर्वत और दिक्पाल अपनी-अपनी दिशाओंको, वनचर जीव अपनी कन्दराओंको और आकाशचारी प्राणी आकाशको चले गये !
(सर्ग २७-२८)