भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण] * महापुरुषोंके स्वभावका वर्णन तथा अनासक्त-भावसे संसारमें विचरनेका उपदेश * २६७

किया जा सकता)। अतः तुम इस जीवन्मुक्तिका वर्णन सुनो। संसार सत्य है, यह समझते हुए जिसके कारण विषय-भोगोंके भोगनेमें दृढ भावना हो गयी है, ऐसी तृष्णाद्वारा जीवकी जो बाह्य पदार्थमें उसकी सत्ताको लेकर आसक्ति है, उसे आचार्यलोग सुदृढ़ संसार-बन्धन कहते हैं। जीवन्मुक्तोंके शरीरके अन्तःकरणमें 'भोग पदार्थ मिथ्या है' इस निश्चयसे हृदयमें भोग संकल्परहित और बाह्य संसारमें विहार करनेवाली स्फुरणा हुआ करती है। महामते श्रीराम ! 'यह मुझे प्राप्त हो' इस प्रकारकी जो हृदयमें भावना है, उसे तुम तृष्णा और सङ्कल्प नामक शृङ्खला समझो। उस तृष्णाका सत् और असत् सभी पदार्थोंमें सदा त्याग करके जो परम उदार हो गया है, वह महामनस्वी पुरुष जीवन्मुक्ति पदको प्राप्त करता है।

श्रीराम ! विचारवान् पुरुषके हृदयमें चार प्रकारका दृढ़ निश्चय होता है—पहला निश्चय यह है कि 'मैं सिरसे लेकर पैरतक माता-पिताके द्वारा रचा गया हूँ; यह असत् दृष्टि है। इसके कारण मनुष्यको बन्धन प्राप्त होता है। मैं देह-इन्द्रिय आदि सब पदार्थोंसे रहित तथा सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर हूँ,—ऐसा जो दूसरा निश्चय है, वह साधुपुरुषोंको मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला होता है। रघुनन्दन ! 'जगत्के सब पदार्थ मुझ अविनाशी परमात्माके ही स्वरूप हैं' इस तरहका तीसरा निश्चय भी मोक्षकी ही प्राप्ति करानेवाला है। 'अहंकार अथवा यह सारा जगत् सदा आकाशके समान शून्य ही है' ऐसा जो चौथा निश्चय है, वह भी मोक्षकी ही सिद्धिका कारण होता है। इन चार निश्चयोंमें जो पहला है, उसे बन्धनकारक कहा गया है। शुद्ध भावनासे उत्पन्न हुए शेष तीन प्रकारके निश्चय मोक्षदायक बताये गये हैं।

महामते ! मैं आत्मा ही सब कुछ हूँ—इस प्रकारका जो निश्चय है, उसे पाकर ही मेरी बुद्धि फिर कभी विषादको नहीं प्राप्त होती। आत्माकी महिमा ऊपर-नीचे और अगल-बगलमें—सर्वत्र व्यापक है। सब आत्मा ही है, ऐसे आन्तरिक निश्चयसे युक्त पुरुष कभी बन्धनमें नहीं पड़ता। जैसे अपार महासागर पातालतक जलसे भरा हुआ है, वैसे ही ब्रह्मासे लेकर कीट-पतङ्गतक सारा जगत् परमात्मासे परिपूर्ण है। इसलिये एकमात्र ब्रह्म ही नित्य और सत्य है। उससे अतिरिक्त जगत्की कोई सत्ता नहीं है—ठीक वैसे ही जैसे सारा समुद्र जल ही है, उससे भिन्न तरङ्ग आदि कुछ नहीं हैं। जैसे सोनेके कड़े, बाजूबंद और नूपुर आदि सुवर्णसे भिन्न नहीं हैं, उसी तरह वृक्ष, तृण आदि कोटि-कोटि पदार्थ आत्मासे भिन्न नहीं हैं। परमात्ममयी अद्वैतशक्ति ही द्वैत और अद्वैतके भेदसे जगन्निर्माणकी लीलाको करती हुई विस्तारको प्राप्त होती है। वास्तवमें न तो अहंकार है और न यह जगत् ही है। यह सब कुछ केवल निर्विकार शान्त विज्ञानानन्दघन ही प्रकाशित हो रहा है। यह संसार न तो असत् है और न सत् ही है—सदा यही समझना चाहिये। परम, अमृत, अनादि, सब ज्योतियोंको प्रकाशित करनेवाला, अजर, अजन्मा, अचिन्त्य, निष्कल, निर्विकार, सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित, प्राणोंका भी प्राण, समस्त सङ्कल्पोंसे रहित, कारणोंका भी कारण, नित्य उदित, परमात्मा, व्यापक, चिन्मय प्रकाशस्वरूप आकाशमें परिपूर्ण, अनुभवका बीज (कारण), अपने आपमें ही अपने आपका अनुभव करने योग्य, आन्तरिक आनन्दानुभवस्वरूप ब्रह्म ही तुम, मैं और जगत् है। उससे भिन्न कुछ नहीं है। इस प्रकारका निश्चय तुम्हें करना चाहिये। (सर्ग १७)


महापुरुषोंके स्वभावका वर्णन तथा अनासक्त-भावसे संसारमें विचरनेका उपदेश

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! जिनका चित्त एकाग्र है तथा जो काम, लोभ आदि कुदृष्टियोंसे

आहत नहीं हुए हैं, इस संसारमें लीलापूर्वक विचरनेवाले उन महापुरुषोंका निम्नाङ्कित स्वभाव बताया जा रहा है।