भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 303

२६६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

पक्षके चन्द्रमाकी भाँति सत्कर्म ही बढ़ते हैं। जिस पुरुषरूपी वृक्षमें तृष्णारूपी घुन नहीं लगे हैं, उसमें सदा पुण्यरूपी फूल खिलते हैं, और वह विकासशील अवस्थाको प्राप्त होता है। तृष्णाद्वारा ये सब लोग सूतमें बँधे हुए पक्षीके समान देश-विदेशमें मटकाये जाते, शोकसे जर्जर किये जाते और अन्ततोगत्वा मारे जाते हैं। जैसे हिरन तिनकोंसे आच्छादित हुए गड्ढेके ऊपर रक्खी हुई हरी-हरी घासकी शाखाको चरनेके लिये जाकर उस गड्ढेमें गिर जाता है, उसी प्रकार तृष्णाका अनुसरण करनेवाला मूढ़ मनुष्य नरकमें गिरता है। बुढ़ापा कितना ही बढ़ा हुआ क्यों न हो, वह नेत्रोंको क्षणभरमें उतना जीर्ण (अंधा) नहीं बनाता, जितना हृदयमें रहनेवाली पिशाचीके समान तृष्णा बना देती है। जिसका आकार सम्पूर्ण दुःखोंसे भरा हुआ है और जो जगत्के लोगोंके जीवनका नाश करनेवाली है, उस तृष्णाको क्रूर सर्पिणीके समान दूरसे ही त्याग देना चाहिये।

दूसरोंको मान देनेवाले कमलनयन श्रीराम ! वासनाका त्याग ज्ञेय और ध्येयके भेदसे दो प्रकारका बताया जाता है। सबको ब्रह्मरूपसे समान समझकर मनुष्य ममतासे रहित हो जिस वासनाक्षयका सम्पादन करके शरीरका त्याग करता है, वह ज्ञेय नामक वासनाक्षय कहा गया है। जो अहङ्कारमयी वासनाका त्याग करके लोकसंग्रहोचित व्यवहारमें संलग्न रहता है, वह ध्येय नामक वासनाक्षयसे युक्त हुआ पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। रघुनन्दन ! मूल अज्ञानके सहित सङ्कल्परूप वासनाका त्याग करके जो शान्तिको प्राप्त हुआ है, उस जीवन्मुक्त पुरुषको ज्ञेय नामक वासनात्यागसे सम्पन्न समझ। जनक आदि महात्मा पुरुष ध्येय नामक वासनात्यागका सम्पादन करके जीवन्मुक्त हो लोकसंग्रहके लिये व्यवहारमें स्थित हुए हैं। ज्ञेय नामक वासनात्यागको सम्पन्न करके शान्तिको प्राप्त हुए विदेहमुक्त पुरुष परावरस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित होते हैं। रघुनन्दन ! पूर्वोक्त दोनों ही त्याग समान हैं। दोनों ही प्रकारके त्यागवाले पुरुष मुक्त-पदपर प्रतिष्ठित हैं। ये दोनों ही ब्रह्मभावको प्राप्त हैं और दोनों ही चिन्ता एवं तापसे छुटकारा पा चुके हैं। एक (ध्येय नामक वासनाक्षयसे युक्त) पुरुष इस देहके रहते हुए ही जीवन्मुक्त होकर शोक और चिन्तासे रहित हो जाता है। और (दूसरा ज्ञेय नामक वासनाक्षयसे युक्त) पुरुष देहत्यागके अनन्तर मुक्त (ब्रह्मके स्वरूपमें स्थित) होता है (उसे विदेहमुक्त कहते हैं)। जो समयानुसार निरन्तर प्राप्त होनेवाले सुखों और दुःखोंमें हर्ष और शोकके वशीभूत नहीं होता, वही इस लोकमें मुक्त कहा जाता है। जिस पुरुषका इष्ट वस्तुओंमें राग और अनिष्ट वस्तुओंमें द्वेष नहीं होता, वह मुक्त कहलाता है। जिस पुरुषका अहंता-ममताको लेकर ग्रहण और त्यागरूप संकल्प क्षीण हो गया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। हर्ष, अमर्ष, भय, क्रोध, काम और कायरताकी दृष्टियोंसे जो रहित है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! महर्षि वसिष्ठ जब इतना उपदेश दे चुके, तब दिन बीत गया, सूर्य अस्ताचलको चले गये। उस सभाके सभी सदस्य मुनिको नमस्कार करके सायंकालिक उपासनाके निमित्त स्नान करने चले गये और रात बीतनेपर सूर्यकी किरणोंके उदयके साथ ही फिर उस सभाभवनमें आ गये।

(सर्ग १४-१६)


जीवन्मुक्तिकी प्राप्ति करानेवाले विभिन्न प्रकारके निश्चयों तथा सब कुछ ब्रह्म ही है, इस पारमार्थिक स्थितिका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जो विदेहमुक्त हैं, वे वाणीके विषय नहीं होते (शरीर त्यागकर साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हो जानेकेकारण उनकी महिमातकवाणीकी पहुँच नहीं हो पाती। इसलिये उनकी स्थितिका वर्णन नहीं