भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 302

उपशम-प्रकरण ] * अनधिकारीको दिये गये उपदेशकी व्यर्थता और जीवन्मुक्तके स्वरूपका वर्णन * २६५


यह मनका ही विकार है । जो पुरुष उस मनको वशमें नहीं कर सकता, वह अध्यात्मशास्त्रके उपदेशका पात्र नहीं है। उस पुरुषकी बुद्धि चारों ओरसे विषयोंमें ही आरूढ़ है और उतनेसे ही वह अपनेको परिपूर्ण मानती है, इसीलिये परमात्माकी ओर अभिमुख नहीं होती, सूक्ष्म वस्तुके विचारमें भी समर्थ नहीं हो पाती। इसीलिये उसमें आध्यात्मिक शास्त्रका उपदेश पानेकी योग्यता नहीं होती। (सर्ग १३)


अनधिकारीको दिये गये उपदेशकी व्यर्थता, मनको जीतने या शान्त करनेकी प्रेरणा तथा तत्त्वबोधसे ही मनके उपशमका कथन; तृष्णाके दोष, वासनाक्षय और जीवन्मुक्तके स्वरूपका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस भूतलपर जो मनुष्य पशु-पक्षियोंके समानधर्मा होकर आहार, निद्रा और मैथुन आदिमें ही लगे हुए हैं, उन्हें उपदेश देना उचित नहीं। भला, वनमें ठूंठे काठके निकट कथाका तात्पर्य कहनेसे कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा ? जिन्होंने अपने मनको विषयोंमें फैला रखा है, उन मनुष्योंमें और पशुओंमें क्या अन्तर है ? पशु रस्सीसे बाँधकर खींचे जाते हैं और मूढ़चेता मनुष्य आसक्तिके कारण मनके द्वारा विषयोंकी ओर घसीटे जाते हैं। जिन लोगोंने अपने मनको नहीं जीता है, उन्हें सब ओरसे दुःखदायिनी दशाएँ प्राप्त होती हैं। रघुनन्दन ! जिन्होंने अपने चित्तपर विजय प्राप्त कर ली है, उनके दुःख उत्तम विचारके द्वारा दूर किये जा सकते हैं। इसलिये जिसे ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान हो चुका है, वह ज्ञानी पुरुष उनके दुःखका मार्जन करनेमें प्रवृत्त हो। इस त्रिगुणात्मक मायामय प्रपञ्चका आश्रय लेना बन्धनमें ही डालनेवाला है। यदि इसका त्याग कर दिया जाय तो यह भव-बन्धनसे छुटकारा दिला सकता है। 'मैं' और 'यह' दोनों ही नहीं हैं इस प्रकार चिन्तन करते हुए तुम अनन्त आकाशके समान विशाल हृदयवाले आत्माके रूपमें प्रतिष्ठित हो पर्वतके समान अविचल-भावसे स्थित हो जाओ । यह सम्पूर्ण जगत् परमात्मा ही है, ऐसे ज्ञानका अन्त:करणमें उदय होनेपर कहाँ चित्त है, कहाँ चेत्य है और क्या चेतन है ? मैं चिन्मय ब्रह्म हूँ, जीव नहीं; क्योंकि वास्तवमें एकमात्र परब्रह्म परमात्माके सिवा जीव नामक कोई अलग पदार्थ नहीं है। यही चित्तकी शान्ति है और इसीको परम सुख कहते हैं। रघुनन्दन ! यह संसार परमात्माका ही स्वरूप है, ऐसा निश्चय हो जानेपर निस्सदेह चित्तकी कोई अलग सत्ता नहीं रह जाती। इस प्रकार परमार्थ-तत्त्वका बोध होनेसे यह जगत् परमात्मा ही है, ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाता है। उस दशामें जैसे सूर्यके प्रकाशसे अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी तरह मन भलीभाँति गल जाता है। जबतक मनरूपी सर्प इस शरीरमें विद्यमान है, तबतक महान् भय बना रहता है। योगसे उसको मार भगानेपर भयके लिये अवसर ही कहाँ रह जाता है ?

श्रीराम ! तृष्णा विष-लताके समान है। यह बढ़ते हुए महान् मोहको देनेवाली और भयंकर है। वह मनुष्यको केवल मूर्च्छा (अज्ञान) ही देती है (ज्ञान-जनित सुख नहीं)। वर्षा ऋतुकी अँधेरी रातके समान मनमें अनन्त विकार (भय आदि) उत्पन्न करनेवाली यह तृष्णा जब-जब प्रकट होती है, तब-तब महामोह प्रदान करती है। रघुनन्दन ! संसारमें जो दुरन्त, दुर्जर और महान् दुःख हैं, वे तृष्णारूपिणी विष-लताके ही फल हैं। तृष्णासे पीड़ित मनुष्यमें दीनता प्रत्यक्ष देखी गयी है। वह मन मारे रहता है, उसका तेज नष्ट हो जाता है, वह बहुत नीचे गिर जाता है। वह मोहग्रस्त होता, रोता और गिरता रहता है। निश्चय ही जहाँ तृष्णारूपिणी काली रात नष्ट हो गयी है, वहाँ शुद्ध