संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मननशीलता, संतोष, मृदुता और मधुरभाषिता—ये गुण हेय और उपादेयसे रहित ज्ञानी पुरुषमें बिना किसी वासनाके रहते हैं। जैसे बहते हुए जलको बाँधसे रोका जाता है, उसी प्रकार निकृष्ट विषयोंकी ओर दौड़ते हुए मनको विवेक-वैराग्यके बलसे विषयोंकी ओरसे लौटाये अर्थात् चित्तकी बहिर्मुख वृत्तिको विवेक वैराग्यद्वारा अन्तर्मुखी करे। श्रीराम ! मोह संसारको भूलकर फिर नहीं प्रस्फुटित होता और संसार चित्तको भुलाकर फिर नहीं अङ्कुरित होता। खड़े होते, चलते, सोते, जागते, कहीं निवास करते, उछलते और गिरते-पड़ते यह 'दृश्य-प्रपञ्च असत् ही है' ऐसा मनमें निश्चय करके इसके प्रति आस्थाका परित्याग कर देना चाहिये। रघुनन्दन ! समताका भलीभाँति आश्रय ले प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन करते हुए अप्राप्तका चिन्तन न करके निर्द्वन्द्व हो इस लोकमें विचरना चाहिये । श्रीराम ! तुम्हीं सर्वज्ञ, तुम्हीं अजन्मा, तुम्हीं सबके आत्मा और तुम्हीं महेश्वर हो। तुम अपने चैतन्यस्वभावसे कभी च्युत नहीं होते, तथापि तुमने इस प्रकार इस संसार-का विस्तार किया है । जिसने सद्रूप आत्मदृश्यमें परमार्थ सत्स्वरूपताकी भावना करके सब ओरसे दूसरी भावनाका परित्याग कर दिया, वह पुरुष हर्ष, क्रोध और विषाद आदिसे होनेवाले दोषोंसे नहीं बँधता । जो राग-द्वेषसे मुक्त है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझता है तथा संसारकी वासनाओंका त्याग कर चुका है, ऐसा योगी युक्त कहलाता है । वह जो कुछ करता, खाता, देता और नष्ट करता है, उन सब क्रियाओंमें उसकी अहंभावना नहीं होती तथा वह सुख-दुःखमें भी समान भाव रखता है । जो इष्ट और अनिष्टकी भावनाका त्याग करके प्राप्त हुए कार्यको कर्तव्य समझकर ही उसमें प्रवृत्त होता है, उसका कहीं भी पतन नहीं होता । महामते ! यह जगत् चेतनमात्र ही है—इस प्रकारके निश्चयवाला मन जब भोगोंका चिन्तन त्याग देता है, तब वह शान्तिको प्राप्त हो जाता है ।
वास्तवमें तो न मन है, न बुद्धि है और न यह शरीर ही है; केवल एकमात्र आत्मा ही सदा विद्यमान है । आत्मा ही यह सम्पूर्ण जगत् है और आत्मा ही कालक्रम है । वह विशुद्ध आत्मा आकाशसे भी सूक्ष्म होनेके कारण प्रतीत न होनेपर भी ध्रुव सत्य है । सूक्ष्म होनेके कारण प्रत्यक्ष प्रतीत न होनेपर भी यह आत्मा नित्य सत्य चेतनरूप है, अतएव सब प्रकारके लक्षणोंसे अतीत शुद्ध आत्मा केवल अपने अनुभवसे ही जाना जाता है। जहाँ केवल परमात्माकी चेतनता है, वहाँ उसी तरह मनका क्षय हो जाता है, जैसे प्रकाशमें अन्धकारका नाश हो जाता है। अतः उस आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये वैराग्यसे, प्राणायामके अभ्याससे, विवेक-विचारसे, दुर्व्यसनोंके विनाशसे तथा परमार्थ-तत्त्वके बोधसे प्राणवायुका निरोध करना चाहिये । जड़ तथा स्वरूप-हीन होनेके कारण मन सदा ही मरा हुआ है । किन्तु आश्चर्य है कि उस मरे हुए मनके द्वारा ही लोग मारे जा रहे हैं । चक्रके समान घूमती हुई यह मूर्खताकी परम्परा बड़ी विचित्र है। अहो ! महामायावी मयासुरका भी निर्माण करनेवाली यह माया अत्यन्त अद्भुत है, जिसके कारण अत्यन्त चञ्चल चित्तके द्वारा भी यह लोक अभिभूत हो रहा है । जब मूर्खता आती है, तब पुरुष सभी आपत्तियोंका भाजन हो जाता है । भला, अज्ञानीपर कौन-सी आपत्ति नहीं आती । देखो, अज्ञानने ही मूर्खता-से इस सृष्टिको उत्पन्न किया है । हाय ! बड़े क्लेशकी बात है कि यह सृष्टि दुर्बुद्धिके कारण मूर्खताके वशमें पड़ी हुई उसके द्वारा पीड़ित हो रही है, तथापि यह जीव असत्का अनुवर्तन करके उत्तरोत्तर दुःख उठानेके लिये ही इस सृष्टिको उपलब्ध करता है । मैं समझता हूँ, यह मूर्खतामयी सृष्टि अत्यन्त सुकुमार-अविचार-मात्रसे सिद्ध है। अतएव एकमात्र विचारसे ही इसका बाध किया जा सकता है । श्रीराम ! इस मूर्खलोकमयी सृष्टिके रूपमें असद्रूप मन ही प्रकट हुआ है अर्थात्