संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * चित्तकी शान्तिके उपायोंका युक्तियोंद्वारा वर्णन * २६३
नौका चलानेकी कलामें शिक्षित हुआ केवट ही नौकासे नदीके पार पहुँचता है, अशिक्षित केवट नहीं। जैसे समुद्रकी भँवरमें चक्कर काटती हुई नौका उसपर चढ़े हुए लोगोंको विपत्तिमें डाल देती है, उसी प्रकार राग, द्वेष, लोभ आदि असन्मार्गमें लगायी गयी अशुद्ध बुद्धि संसारमें भटककर मनुष्यको आपत्तिमें डाल देती है और वही बुद्धि यदि विवेक, वैराग्य आदि सन्मार्गमें लगायी जाय तो वह मनुष्यको भवसागरसे पार कर देती है। जैसे कवच बाँधकर युद्ध करनेवाले योद्धाको बाण पीड़ित नहीं करते, उसी प्रकार विवेकशील, मूढ़तारहित एवं पवित्र बुद्धिवाले पुरुषको तृष्णावर्गके काम, लोभ आदिसे उत्पन्न हुए क्रोध, द्वेष और मोह आदि दोष बाधा नहीं पहुँचाते। रघुवीर! इस लोकमें प्रज्ञारूपी नेत्रसे यह सारा जगत् ठीक-ठीक दिखायी देता है। उस यथार्थदर्शी पुरुषके पास न तो सम्पत्तियाँ आती हैं और न विपत्तियाँ ही। जैसे सूर्यको ढकनेवाला जलमय विस्तृत काला मेघ वायुसे छिन्न-भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार अहंकाररूपी मत्त मेघ जो परमात्मारूपी सूर्यपर आवरण डालनेवाला है, पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिरूपी वायुसे बाधित हो जाता है। परमात्माकी प्राप्तिरूप अनुपम उन्नत पदमें पहुँचनेवाले पुरुषको पहले सत्सङ्ग और विवेक-वैराग्यद्वारा इस बुद्धिका ही शोधन करना चाहिये—ठीक उसी तरह, जैसे धान्य आदिकी वृद्धि चाहनेवाला किसान सबसे पहले पृथ्वीको ही हलसे जोतकर शुद्ध बनाता है। (सर्ग १२)
चित्तकी शान्तिके उपायोंका युक्तियोंद्वारा वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन! बिना जीती हुई मनसहित इन्द्रियाँ शत्रुके समान हैं। इन्हें तबतक बारंबार जीतकर परमात्मामें लगानेका प्रयत्न करे, जबतक अन्तःकरण स्वयं ही परमात्माके ध्यानमें एकाग्र होकर शुद्ध एवं प्रसन्न न हो जाय। इस प्रकारके साधनसे नित्य प्रसन्न, सर्वव्यापी, दिव्यस्वरूप, देवेश्वर परमात्माका स्वतः साक्षात्कार हो जाता है और ऐसा होनेपर सारी दुःख-दृष्टियाँ नष्ट हो जाती हैं। उस सगुण-निर्गुणरूप परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार होनेपर हृदयग्रन्थिरूपी कुदृष्टियाँ जो मोहरूपी बीजकी मुट्ठियाँ और नाना प्रकारकी आपत्तियोंकी दृष्टियाँ हैं, नष्ट हो जाती हैं। नित्य आन्तरिक विचारवाले और जगत्को क्षणभङ्गुर देखनेवाले पुरुषका अन्तःकरण राजा जनकके अन्तःकरणकी तरह समय आनेपर अपने-आप ही शुद्ध हो जाता है। संसारसे भयभीत हुए पुरुषोंके लिये सच्चिदानन्दघन परमात्माके ध्यानरूप परम पुरुषार्थको छोड़कर न दैव शरण देनेवाला है न कर्म, न धन आश्रय देनेवाला है न भाई-बन्धु (अपने उद्धारके लिये इनमेंसे कोई भी आश्रय लेने योग्य नहीं है, केवल एकमात्र परमात्मा ही शरण लेने योग्य है)।
तात! जो लोग विवेक, वैराग्य, विचार, उपासना और धर्मपालन आदि उत्तम कार्योंमें भाग्यके अधीन रहते हैं तथा मिथ्या विपरीत कल्पनाएँ करते रहते हैं, उनकी मन्दमति विनाशकी ओर ले जानेवाली है; अतः उसका अनुसरण नहीं करना चाहिये। उत्तम विवेकका आश्रय ले अपने आत्माका अपने ही द्वारा अनुभव करके परम वैराग्यसे पुष्ट हुई पवित्र एवं सूक्ष्म बुद्धिरूप नौकाद्वारा संसार-सागरको पार करे। श्रीराम! यह मैंने तुमसे आकाशसे गिरनेवाले फलके समान शीघ्रतापूर्वक होनेवाली ज्ञान-प्राप्तिका वर्णन किया है। यह ज्ञान अज्ञानरूपी वृक्षको काट डालनेवाला तथा निरतिशय सुख प्रदान करनेवाला है। वाञ्छित (मनके अनुकूल) और अवाञ्छित (मनके प्रतिकूल) वस्तुकी आशङ्कारूपिणी चञ्चल वानरियाँ जिस चित्तरूपी वृक्षपर कूद-फाँद मचाये रहती हैं, उसमें सौम्यता (शान्ति) कहाँसे आ सकती है।
निष्कामता, निर्भयता, स्थिरता, समता, ज्ञान, निरीहता, निष्क्रियता, सौम्यता, निर्विकल्पता, धैर्य, मैत्री,
सं० यो० व० अं० १०—