संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उसमें सदा ही समचित्त एवं विकारशून्य होकर रहे। तभीसे लोकमें सगुण-निर्गुण परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करनेवाले और समस्त प्राणियोंको सम्मान देनेवाले वे राजा जनक परमात्माके यथार्थ ज्ञानमें निपुण हो जीवन्मुक्त हो गये। वे लोगोंको प्राणोंके समान प्रिय थे और विदेह देशका राज्य करते हुए कभी हर्ष और विषादके वशीभूत हो संतप्त नहीं होते थे। सुषुप्तावस्थामें स्थितकी भाँति राजा जनककी राग-द्वेष आदि समस्त वासनाएँ सम्पूर्ण पदार्थोंसे सर्वथा निवृत्त हो गयी थीं। वे न कभी भूतकी चिन्ता करते और न भविष्यका अनुसंधान। वर्तमान कालका ही वे प्रसन्नतापूर्वक अनुसरण करते थे। कमलनयन श्रीराम ! अपने परमात्मविषयक विवेकपूर्ण विचारधारा ही राजा जनकको पानेयोग्य परब्रह्म परमात्म-रूप वस्तुकी पूर्णतया प्राप्ति हो गयी।
अपने चित्तसे तबतक परमात्मतत्त्वका विचार करते रहना चाहिये, जबतक विचारोंकी सीमाका अन्त (परमात्माका यथार्थ ज्ञानरूप फल) प्राप्त न हो जाय। महापुरुषोंके सङ्गसे निर्मलतारूप अभ्युदयको प्राप्त हुए चित्तके विवेकपूर्वक शुद्ध विचारसे जो परमात्मरूप परमपद प्राप्त होता है, वह न तो गुरुके उपदेशसे, न शास्त्रार्थसे और न पुण्यसे ही प्राप्त होता है। श्रीराम ! अपने मित्रके तुल्य स्थिर, शुद्ध एवं तीक्ष्ण बुद्धिसे जो उत्तम पद प्राप्त होता है, वह दूसरी किसी क्रियासे नहीं होता। जिस पुरुषकी पूर्वापरका विचार करनेवाली कुशाग्र एवं तीक्ष्ण प्रज्ञारूपी दीपशिखा प्रज्वलित है, उसे कभी अज्ञानरूपी अन्धकार क्लेश नहीं पहुँचाता। महामते ! दुःखरूपी उत्ताल तरङ्गोंसे व्याप्त जो विपत्तिरूपिणी दुस्तर सरिताएँ हैं, उनको तीक्ष्ण और विशुद्ध बुद्धिरूपी नौकाद्वारा ही पार किया जाता है। जैसे वायुका हल्का-सा झोंका भी निस्सार तिनकेको उड़ा देता है, उसी प्रकार प्रज्ञाहीन मूढ़ पुरुषको थोड़ी-सी आपत्ति भी शोकाकुल कर देती है।
शत्रुमर्दन श्रीराम ! तीक्ष्ण और विशुद्ध प्रज्ञासे युक्त पुरुष दूसरोंकी सहायता तथा शास्त्राभ्यासके बिना भी संसार-समुद्रसे अनायास ही पार हो जाता है। जैसे फलकी प्राप्तिके लिये सींचने और संरक्षण आदिके द्वारा अंगूर आदिकी लताको बढ़ाया जाता है, उसी प्रकार शास्त्रोंके अभ्यास और सत्पुरुषोंकी संगतिसे पहले प्रज्ञाको बढ़ाना चाहिये अर्थात् बुद्धिको पवित्र एवं तीक्ष्ण बनाना चाहिये। जैसे चन्द्रमण्डल संसारके अन्धकारको दूर करनेवाली चाँदनीको उत्पन्न करता है, उसी प्रकार निष्काम कर्मरूपी वृक्ष, जिसका शुद्ध तीक्ष्ण प्रज्ञाबल ही महान् मूल है परम रसमय परमात्माकी प्राप्तिरूप फलको उत्पन्न करता है। लोग धन-सम्पत्ति आदि बाह्य पदार्थोंके उपार्जनके लिये जैसा प्रयत्न करते हैं, वही यत्न पहले विशुद्ध बुद्धिकी अभिवृद्धिके लिये करना चाहिये। बुद्धिकी मन्दता समस्त दुःखोंकी चरम सीमा है, विपत्तियोंका सबसे बड़ा भंडार है और संसाररूपी वृक्षोंका बीज है; अतः उसका यत्नपूर्वक विनाश करना चाहिये।
रघुनन्दन ! न दानोंसे, न तीर्थोंसे और न तपस्यासे ही भयंकर संसार-सागरको पार किया जा सकता है। केवल पवित्र एवं अविचल बुद्धिरूपी जहाजका आश्रय लेनेसे ही उसके पार पहुँचा जा सकता है। पृथ्वीपर विचरनेवाले मनुष्योंको भी जो दैवी सम्पत्ति प्राप्त होती है, वह शुद्ध एवं अविचल प्रज्ञामयी लतासे उत्पन्न हुआ स्वादिष्ट फल है। जिन सिंहोंने अपने पंजोंसे मत्त गजराजोंके कुम्भस्थल विदीर्ण कर डाले थे, वे भी सियारोंद्वारा बुद्धि-बलसे इस तरह पराजित हुए हैं, जैसे सिंहोंसे हरिन। विवेकी पुरुषके हृदयरूपी कोशागारमें स्थित यह पवित्र प्रज्ञा चिन्तामणिके समान है। यह कल्पलताकी भाँति मनोवाञ्छित फल देती है। श्रेष्ठ पुरुष पवित्र और अविचल प्रज्ञाके द्वारा संसार-सागरसे पार हो जाता है, किंतु अधम मानव उसमें डूब जाता है। क्यों न