संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * राजा जनककी जीवन्मुक्तरूपसे स्थिति तथा विशुद्ध विचारके माहात्म्यका वर्णन * २६१
सुन्दर चित्त ! इस चञ्चल संसारसृष्टिको और शान्तिके सुखको विचारकी तराजूमें रखकर तौलो। यदि तुम्हें संसारकी सृष्टिमें ही सार प्रतीत हो तो इसीका आश्रय लो; नहीं तो शान्तस्वरूप ब्रह्ममें स्थित हो जाओ। मेरे अच्छे मन ! पहिलेसे अविद्यमान यह दृश्य-प्रपञ्च उत्पन्न हो जाय अथवा यह वर्तमान दृश्य नष्ट हो जाय, तुम इसके गुणों और अवगुणोंसे—उदय और नाशसे हर्ष-विषादरूप विषमताको न प्राप्त होओ। इस दृश्य वस्तु संसारके साथ तुम्हारा थोड़ा-सा भी सम्बन्ध नहीं है। इसका रूप है ही नहीं। ऐसे मिथ्या दृश्य जगत्से तुम्हारा इस तरहका सम्बन्ध हो ही कैसे सकता है। सुन्दर चित्त ! यदि यह दृश्य जगत् असत् है और तुम सत्य हो तो तुम्हीं बतलाओ, सत् और असत्में, जीवित और मृतमें कैसे सम्बन्ध स्थापित हो सकता है ? चित्त ! यदि तुम और दृश्य जगत् दोनों ही सत् और सदा साथ रहनेवाले हो, तब तुम्हारे लिये हर्ष और विषादका अवसर ही कहाँ है ? इसलिये इस विशाल आन्तरिक व्यथाका त्याग करो। आत्मानन्दको, जो मौन होकर सो रहा है, विवेक-वैराग्यसे जगाओ और इस अमङ्गलमयी स्थिति—चञ्चलताको छोड़ो। अरे शठ चित्त ! जड़ दृश्यरूप इस संसारमें ऐसी कोई उन्नत और उत्तम वस्तु नहीं है, जिसकी प्राप्ति होनेसे तुम्हें परम परिपूर्णता प्राप्त हो जाय। इसलिये अभ्यास और वैराग्यके बलसे अत्यन्त धीरताका आश्रय ले चञ्चलताको त्याग दो।' (सर्ग १०-११)
राजा जनककी जीवन्मुक्तरूपसे स्थिति तथा विशुद्ध विचार एवं प्रजाके अद्भुत माहात्म्यका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उस समय इस प्रकार विचार करके धीरबुद्धि राजा जनक अपने राज्यके सारे काम-काज सँभालने लगे। फिर उन्हें मोह नहीं हुआ (उनके मनमें ममता और आसक्ति नहीं जागी)। उनका मन कहीं हर्षके स्थानोंमें किञ्चिन्मात्र भी उल्लासको प्राप्त नहीं हुआ। जैसे केवल सुषुप्तिमें स्थिति हो, उस प्रकार सदा ही विक्षेपरहित एवं शान्तभावसे स्थिर रहा। तबसे लेकर उन्होंने न तो दृश्य जगत्को मनसे ग्रहण किया और न उसका त्याग ही किया। केवल वर्तमान संसारमें वे निःशङ्क होकर स्थित रहे। इस प्रकार आत्मविवेकके अनुसंधानसे राजा जनकका परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान अनन्त एवं अत्यन्त विशुद्ध हो गया। सम्पूर्ण भूतोंके आत्मस्वरूप परमात्माको जानने तथा आत्माकी अनन्तताका अनुभव करनेवाले राजाने चिन्मय परमात्मामें स्थित सारे पदार्थोंको आत्मभूत देखा—अपने आत्माके रूपमें अनुभव किया। वे न तो अनुकूल वस्तुको पाकर हर्षसे उल्लसित हुए और न कभी प्रतिकूल वस्तुको पाकर शोकसे आतुर ही हुए। सब कुछ प्रकृतिका व्यवहार होनेके कारण वे