संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 297, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ें२६० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
पूर्ववत् संसारकी विचित्र स्थितिपर ही विचार करते रहे।
राजा बोले—जो सुखदरूपसे स्थित है, यह राज्य कितने दिनका है ? मुझे यहाँ इस क्षणभङ्गुर राज्यसे कोई प्रयोजन नहीं है। यह सभी मायाका मिथ्या आडम्बर है। मैं इसका त्याग करके प्रशान्त महासागरकी भाँति शान्त रहकर एकान्तमें ही स्थित रहूँगा। ऐ मेरे चित्त ! बारंबार भोगोंके आस्वादनमें जो वेगपूर्वक तेरी प्रवृत्ति हो रही है, यह बड़ी घृणित है। इससे तू दूर हो जा। तेरी जो भोग भोगनेकी चतुरता है, उसे जन्म, जरा एवं जडताके समूहरूपी कीचड़की शान्तिके लिये त्याग दे। चित्त ! तू जिन-जिन अवस्थाओंमें भ्रमवश सुख देखता है, उन्हींसे तुझे महान् दुःखकी प्राप्ति होगी । इसलिये इस तुच्छ भोग-चिन्तनसे कोई लाभ नहीं है।
ऐसा विचार करके राजा जनक मौन हो गये । उनके चित्तकी चपलता शान्त हो चुकी थी। इसलिये वे चित्रलिखित पुरुषकी भाँति अचलभावसे स्थित हो गये और पुनः इस प्रकार विचार करने लगे—'मुझे कोई भी क्रिया करनेसे क्या प्रयोजन है और कुछ न करके निष्क्रिय होकर बैठ रहनेसे भी क्या मतलब है ? इस संसारमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो उत्पन्न होकर विनाशको न प्राप्त हो। मिथ्यारूपसे प्रकट हुआ यह शरीर कर्म करे या निष्क्रिय होकर बैठा रहे, सर्वत्र समान-भावसे स्थित हुए मुझ विशुद्ध चेतनकी इससे क्या क्षति होनेवाली है ? मैं न तो अप्राप्त वस्तुकी इच्छा करता हूँ और न प्राप्त वस्तुका त्याग ही । मेरा इस जगत्में न तो कुछ करनेसे प्रयोजन है और न न करनेसे ही । करने या न करनेसे जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह सब असन्मय—विनाशशील ही है । इसलिये यह शरीर उठकर क्रमशः प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन करे। यह निश्चेष्ट होकर क्यों सूख रहा है ?'
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसा विचार करके वे राजा जनक अनासक्त भावसे न्यायतः प्राप्त हुए कर्तव्य कर्मका सम्पादन करनेके लिये उठे । उन्होंने श्रेष्ठ पुरुषोंके समादरपूर्वक उस दिनका सारा कार्य भलीभाँति पूर्ण करके उसी ध्यानरूप विनोदसे अकेले ही रात बितायी । जब रात बीतने लगी, तब विषय-भ्रमसे रहित मनको समरस ( एकाग्र ) करके उन्होंने अपने चित्तको इस प्रकार समझाना आरम्भ किया—'ऐ मेरे चञ्चल चित्त ! यह संसार आत्माके सुखका साधन नहीं है । तुम शमका आश्रय लो । शमसे शान्त ( विक्षेप-रहित ) सारभूत आत्मसुखकी प्राप्ति होती है । जैसे-जैसे तुम विचित्र विकल्पोंका संकल्प करते हो, वैसे-ही-वैसे तुम्हारे विषय-चिन्तनसे यह संसार अनायास ही वृद्धिको प्राप्त होता है । दुष्ट मन ! जैसे वृक्षको सींचनेसे उसमें सैकड़ों शाखाएँ निकल आती हैं, उसी प्रकार तुम भी विषयभोगकी इच्छा करनेसे अनन्त आन्तरिक व्यथाओंसे युक्त हो जाते हो। जन्म तथा संसारकी सृष्टियाँ विषय-चिन्ताओंके विलाससे ही प्रकट हुई हैं; इसलिये तुम नाना प्रकारकी चिन्ताओंका त्याग करके उपशमको प्राप्त होओ—संसारसे उपरत हो जाओ।