संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * राजा जनकद्वारा संसारकी स्थितिपर विचार और उनका अपने चित्तको समझाना * २५९
भी रमणीय और सुस्थिरसे भी सुस्थिर पदार्थ हैं, किंतु यह सारी पदार्थ-सम्पत्ति अन्ततोगत्वा चिन्ता और दुःखका ही कारण होती है। फिर तुम उसकी इच्छा क्यों करते हो ? वे स्त्री, धन और गृह आदि विचित्र सम्पत्तियाँ यदि चित्तसे आदरणीय हों तो वे भी बहुत प्रयत्नोंसे प्राप्त करने योग्य, दुःखसे रक्षणीय तथा अवश्य विनाशशील होनेके कारण महाविपत्तिरूप ही हैं—ऐसा मेरा मत है। किंतु यदि धन, सम्पत्ति और बन्धुजनोंसे वियोगरूप आपत्तियाँ भी साधुसङ्ग, तपस्या और ज्ञान आदिकी प्राप्ति करा देनेके कारण विचित्र एव कल्याणकारिणी हैं—ऐसा मनमें विश्वास हो जाय तो वे भी विवेक-वैराग्य आदि महान् आरम्भोंसे युक्त सम्पत्तियाँ ही हैं—ऐसा मैं मानता हूँ। समुद्रमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाकी भाँति क्षण-भङ्गुर, मिथ्यारूप, एकमात्र मनका परिणामस्वरूप जो यह जगत् है, इसमें 'यह मेरा है' यह अपूर्व पद-वाक्यरूप अक्षरमाला कहाँसे आयी ? अर्थात् इसमें ममता करना व्यर्थ है। अग्निकी शिखाओंमें आसक्त हुए फतिंगोंकी भाँति मैं देश, काल और वस्तुसे सीमित तथा त्रिविध तापोंसे संतप्त किन सुख-नामक दृष्टियोंमें अनुरक्त हो रहा हूँ ? निरन्तर दग्ध करनेवाली रौरव नरककी आगमें लोटना अच्छा है, परंतु सुख-दुःखके परिवर्तनसे युक्त विषयभोग-रूप संसारमें रहना अच्छा नहीं। संसार ही समस्त दुःखोंकी चरम सीमा कहलाता है। उसके भीतर पड़े हुए शरीरमें सुखकी प्राप्ति कैसे हो सकती है। जो बाह्य आकारमात्रसे रमणीय प्रतीत होनेवाली किंतु विनाशकी प्राप्ति करानेवाली हैं, मनरूपी बंदरकी उन चपलता रूप वृत्तियोंका अनुभव हो जानेपर मैं आजसे ही इनमें रमण नहीं करूँगा। जो सैकड़ों आशारूपी पाशोंसे ओतप्रोत तथा अधोगति, ऊर्ध्वगति एवं संतापको देनेवाली हैं, उन संसारकी वृत्तियोंको मैंने बहुत भोग लिया। अब मैं इनसे विश्राम लेता हूँ। मैं प्रबुद्ध (जगा हुआ) हूँ तथा हर्ष एवं उत्साहसे भरपूर हूँ। अपने पारमार्थिक धनको चुरानेवाले मन नामक चोरको मैंने देख लिया है। अतः अब इसे मैं मारे डालता हूँ; क्योंकि इस मनने चिरकालसे मुझे मारा है—मेरा पतन कराया है। जैसे सूर्यकी धूपसे ओस या पालेके कण गल जाते हैं, उसी तरह मेरा मन यथार्थ ज्ञानद्वारा ब्रह्मतत्त्वमें नित्य-निरन्तर स्थिति प्राप्त करनेके लिये बहुत शीघ्र लयको प्राप्त होगा। सिद्ध महापुरुषोंने नाना प्रकारके उपदेशोंद्वारा मुझे अच्छी तरह बोध करा दिया है। अब मैं परमानन्दरूप परमात्मामें प्रवेश कर रहा हूँ। परमात्मारूपी मणिको पाकर एकान्तमें उसीको देखता हुआ मैं अन्य सारी इच्छाओंको शान्त करके सुखपूर्वक स्थित होऊँगा। 'यह देह मैं हूँ, यह विस्तृत धन-राज्य आदि मेरा है' इस प्रकार अन्तःकरणमें स्फुरित हुए असत्यरूपका यथार्थज्ञानके द्वारा नाश करके अत्यन्त बलशाली मनरूपी शत्रुको ध्यानके अभ्याससे अच्छी तरह मारकर मैं अतिशय शान्तिको प्राप्त हो रहा हूँ।' (सर्ग ९)
राजा जनकद्वारा संसारकी स्थितिपर विचार और उनका अपने चित्तको समझाना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! राजा जनक जब इस प्रकार चिन्तन कर रहे थे, उस समय प्रतिहारने उनके पास जाकर नैत्यिक कार्य करनेके निमित्त उठनेके लिये अनुरोध किया; परंतु राजा