भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२५८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भोग आदि सम्पत्ति, जो इस रूपमें उपस्थित हुई है, मिथ्या ही है। प्राचीन नरेशोंके वे महान् वैभव, वे भोग और वे अच्छे-अच्छे स्नेही बन्धु-बान्धव आज कहाँ हैं? वे सब इस समय स्मृतिपथको प्राप्त हो गये हैं—अब उनका केवल स्मरणमात्र यहाँ शेष रह गया है। वे स्वरूपतः विद्यमान नहीं हैं। इस दृष्टान्तको सामने रखते हुए वर्तमान भोग आदि सम्पत्तिपर भी क्या आस्था हो सकती है ? पूर्ववर्ती भूमिपालोंके वे धन कहाँ हैं ? पूर्वकल्पोंमें ब्रह्माजीने जिनकी सृष्टि की थी, वे जगत् कहाँ चले गये ? जब पहलेका सब कुछ नष्ट हो गया, तब आजके इन वैभव-भोगोंपर मेरा यह कैसा विश्वास है ? जैसे जलमें अनन्त बुद्बुद उठते और विलीन होते हैं, उसी तरह लाखों इन्द्र कालके गालमें चले गये, तो भी मैं इस जीवनमें आस्था बाँधे बैठा हूँ! साधु पुरुष मेरी इस मूढ़ता-पर हँसेंगे। करोड़ों ब्रह्मा चले गये। कितनी ही सृष्टि-परम्पराएँ आयीं और चली गयीं। असंख्य भूपाल धूलके समान उड़ गये। फिर मेरे इस तुच्छ जीवनपर क्या आस्था हो सकती है ? यह, वह और मैं—यह तीन प्रकारकी कल्पना असत्यरूप ही है। अहंकाररूपी पिशाचसे ग्रस्त हुए मनुष्यकी भाँति मैं क्यों अबतक मूर्खके समान विचारशून्य होकर बैठा रहा ? मैं इस व्याप्त हुई कालकी सूक्ष्म रेखासे प्रतिक्षण नष्ट होनेवाली अपनी आयुको देखता हुआ भी नहीं देखता ! यद्यपि दिन-पर-दिन निरन्तर अब भी आते-जाते रहते हैं; फिर भी आजतक एक दिन भी ऐसा नहीं देखा, जिसमें मुझे नित्य एक सत्य परमात्मवस्तुका साक्षात्कार हुआ हो। मैं कष्टसे भी अत्यन्त कष्टको प्राप्त हुआ, एक दुःखसे दूसरे महान् दुःखमें फँसता गया; परंतु आज भी इस जगत्के भोगोंसे विरक्त नहीं हुआ। जिन-जिन सुन्दर वस्तुओंमें मैंने दृढ़तापूर्वक स्नेह बाँधा, वे सब-की-सब नष्ट होती दिखायी दीं। फिर इस संसारमें उत्तम वस्तु क्या है ? मनुष्य जगत्के जिन-जिन पदार्थोंमें आस्था बाँधता है—विश्वास करता है, उन-उन पदार्थोंमें उस मनुष्यके दुःखका प्रादुर्भाव बारंबार देखा गया है। मूढ़ मनुष्य बाल्यावस्था में एकमात्र अज्ञानसे पीड़ित रहता है, युवावस्था में कामदेवके बाणोंसे घायल रहता है तथा अन्तिम अवस्था में स्त्री आदि कुटुम्बके पालन-पोषणकी चिन्तासे जलता रहता है। भला, अपने उद्धारका साधन वह कब करे ? दुर्बुद्धि पुरुष इस उत्पत्ति-विनाश-शील, रसहीन, विषम दुर्दशाओंसे दूषित तथा असार संसारमें क्या सार वस्तु देख रहा है ! कोई सामर्थ्यशाली पुरुष राजसूय और अश्वमेध आदि सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी अधिक-से-अधिक महाकल्पपर्यन्त उपभोगमें आनेवाले स्वर्गको ही पाता है, जो महाकालकी दृष्टिसे उसका एक अत्यन्त अल्पतम अंश है। स्वर्गसे अधिक जो अनन्त, नित्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्म है, उसकी प्राप्ति उसे नहीं होती। कौन-सा वह स्वर्ग है और इस पृथ्वीपर या पातालमें कौन-सा ऐसा प्रदेश है, जहाँ दुष्ट अमरियोंकी भाँति ये आपत्तियाँ जीवको अभिभूत नहीं करतीं। ये आधियाँ (मानसी व्यथाएँ) अपने ही चित्तरूपी बिलमें रहनेवाले सर्प हैं और ये व्याधियाँ शरीररूपी स्थलके खुदे हुए क्षुद्र जलाशय हैं। इनका निवारण कैसे किया जा सकता है।

'सत् (वर्तमानकालिक दृश्य) के सिरपर असत्ता (विनाशशीलता) बैठी है। रमणीय पदार्थोंके मस्तक-पर अरम्यता विराज रही है और सुखोंके माथेपर दुःख चढ़े हुए हैं। भला, इनमें कौन-सी ऐसी एकमात्र सत्य वस्तु है, जिसका मैं आश्रय लूँ ? (तात्पर्य यह कि ये सभी वस्तुएँ मिथ्या हैं) अज्ञानसे मोहित क्षुद्र प्राणी जन्म लेते और मरते हैं। यह पृथ्वी उन्हीं लोगोंसे ठसा-ठस भरी है। जो साधुओंसे भी बढ़कर साधु हैं, ऐसे महापुरुष इस संसारमे दुर्लभ हैं। नील कमलके समान मनोहर और भ्रमरके समान चञ्चल नेत्रवाली जो उत्कृष्ट प्रेमसे विभूषित विलासिनी वनिताएँ हैं, वे भी क्षणभङ्गुर होनेके कारण उपहासके ही योग्य हैं। संसारमें रमणीयसे