भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उपशम-प्रकरण ] * सिद्धोंके उपदेशको सुनकर राजा जनकका अपने आन्तरिक निश्चयको प्रकट करना * २७७

सिद्धोंके उपदेशको सुनकर राजा जनकका एकान्तमें स्थित हो संसारकी नश्वरता एवं आत्माके विवेक-विज्ञानको सूचित करनेवाले अपने आन्तरिक उद्गार एवं निश्चयको प्रकट करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उन सिद्धगणोंके मुखसे निकले हुए उन उपदेशात्मक गीतों (वचनों) को सुनकर राजा शीघ्र ही निर्वेदको प्राप्त हो गये । वे अपने साथके सब लोगोंको घरकी ओर खींचते हुए उस उपवनसे चले और समस्त परिवारको अपने-अपने स्थानपर छोड़कर अकेले ही अपने ऊँचे महलपर चढ़ गये । वहाँ लोककी वर्तमान अवस्थाओंका अवलोकन करते हुए वे व्याकुल हो इस प्रकार अपना उद्गार प्रकट करने लगे—'हाय ! बड़े दुःखकी बात है कि जन्म, जरा, रोग और मरण आदिके कारण समस्त लोकोंकी जो अत्यन्त कष्टप्रद चञ्चल दशाएँ हैं, उन्हींमें मैं वशपूर्वक लोट-पोट रहा हूँ—आवागमनके चक्करमें पड़ा हुआ हूँ । जिस कालका कभी अन्त नहीं होना, उसका एक अत्यन्त अल्पतम अंश मेरा जीवन है । उस क्षणिक जीवनमें मैं आसक्त हो रहा हूँ, अपने मनको बाँधे रखता हूँ । केवल जीवन-कालतक रहनेवाला मेरा यह राज्य कितना है ? कुछ भी तो नहीं है ! परंतु इतनेसे ही संतुष्ट होकर मैं मूर्ख मनुष्यके समान क्यों निश्चिन्त बैठा हूँ ?—मुझे अपनी इस मूढ़तापर दुःख क्यों नहीं होता ? इस जगत्‌में ऐसी कोई वस्तु है ही नहीं, जो सत्य हो, रमणीय हो, उदार हो और किसीसे उत्पन्न न होकर नित्य निर्विकाररूपसे स्थित हो । फिर मेरी बुद्धि यहाँ किसमें लगे ?—कहाँ शान्ति प्राप्त करे ? जो वस्तु दूरस्थ कही जाती है, वह भी वास्तवमें दूर नहीं है; क्योंकि वह मेरे मनमें वर्तमान है । ऐसा निश्चय करके मैं बाह्य पदार्थोंकी भावना (चिन्तन) का त्याग कर रहा हूँ । प्रतिवर्ष, प्रतिमास, प्रतिदिन और प्रतिक्षण जो दुःखसे भरे हुए सांसारिक सुख बारबार उत्पन्न होते हैं, वे वास्तवमें दुःखरूप ही हैं । आज जो बड़े-बड़े लोगोंके सिरमौर बने हुए हैं वे ही कुछ दिनोंमें नीचे गिर जाते हैं । ऐ मेरे अभागे चित्त ! फिर इस जगत्‌की महत्तामें तुम्हारा यह कैसा विश्वास है ? यद्यपि मैं बुद्धिमान् हूँ, तो भी जैसे सूर्यदेवके समक्ष उनके प्रकाशको ढक लेनेवाला काला मेघ आ जाता है, उसी प्रकार मेरे सामने यह आत्माके प्रकाशको छिपा देनेवाला मोह सहसा कहाँसे आ गया ? ये महान् भोग मेरे कौन हैं ? ये भाई-बन्धु भी मेरे कौन हैं ? जैसे बालक मिथ्या ही भूतके भयसे व्याकुल हो उठता है, उसी प्रकार मैं इनमें ममतारूपी झूठे सम्बन्धकी कल्पना करके व्याकुल हो रहा हूँ ।

'मैं इन भोगों और सम्बन्धियोंमें स्वयं ही यह आस्था क्यों बाँध रहा हूँ ? यह आस्था तो जरा और मृत्युकी सहेली है—उनकी प्राप्ति करानेवाली है । साथ ही सदा उद्वेगमें डाले रखनेवाली है । यह भोगों और बन्धु-बान्धवोंकी सम्पत्ति चली जाय या भलीभाँति स्थिर होकर रहे, इसके प्रति मेरा क्या आग्रह है ! जलमें उठनेवाले बुद्बुदकी शोभा जैसे मिथ्या होता है, उसी तरह यह