भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

लिये सूर्यदेवके समान थे ), बन्धु-बान्धवरूपी फूलोंके विकासके लिये ऋतुराज वसन्तके तुल्य थे, ब्राह्मणरूपी कुमुदोंके लिये शीतरश्मि चन्द्रमा थे और भगवान् विष्णुके समान प्रजावर्गके पालनमें तत्पर रहनेवाले थे। एक दिनकी बात है, वे वसन्त ऋतुमें खिले हुए पुष्पोंसे सुशोभित रमणीय उपवनमें गये। उस मनोरम उद्यानमें अनुचरोंको दूर रखकर राजा पर्वतशिखरपर उगे हुए कुञ्जोंमें विचरण करने लगे। कमलनयन श्रीराम ! वहाँ किसी तमाल-वनके निकुञ्जमें कुछ सिद्ध पुरुष बैठे हुए थे, जो दूसरोंको दिखायी नहीं देते थे। पर्वतों और उनकी कन्दराओंमें विचरनेवाले वे सिद्ध सदा एकान्त स्थानमें निवास करते थे। उनके मुखसे कुछ ऐसे उपदेशात्मक गीत निकले, जो श्रोताके हृदयमें परमात्मभावको जगानेवाले थे। राजाने उन गीतोंको सुना, मानो वे उन्हींपर अनुग्रह करनेके लिये गाये गये थे। उन गीतोंके भाव क्रमशः इस प्रकार हैं—

कुछ सिद्ध बोले—द्रष्टाका नेत्र आदि इन्द्रियोंद्वारा जो दृश्य—विषयके साथ संयोग होता है, उससे जो विषय-सुखकी प्रतीति होती है, उसके द्वारा बुद्धिवृत्तिमें स्वयं सहज आनन्दरूपसे जो निश्चय प्रकट होता है, वही जिसका स्वभाव है तथा जो आत्मतत्त्वके परिशोधसे निरतिशय भूमारूपमें आविर्भूत हुआ है, उस विशुद्ध आत्मा या परमात्माकी हम निश्चय समाधिके द्वारा उपासना करते हैं।

दूसरे सिद्ध बोले—वासनासहित द्रष्टा, दर्शन और दृश्यकी त्रिपुटीको त्याग देनेपर जो विशुद्ध दर्शन या ज्ञानके रूपमें प्रकाशित होता है, उस विशुद्ध आत्माकी हम उपासना करते हैं।

अन्य सिद्धोंने कहा—अस्ति और नास्ति—इन दोनों पक्षोंके बीचमें उनके साक्षीरूपसे जो सदा विद्यमान है, प्रकाशनीय वस्तुओंको प्रकाशित करनेवाले उन परमात्माकी हम उपासना करते हैं।

दूसरे सिद्ध बोले—जिसमें सब है, जिसका सब है, जिससे सब हैं, जिसके लिये यह सब है, जिसके द्वारा सब है तथा जो स्वयं ही सब कुछ है, उस परम सत्य आत्माकी हम उपासना करते हैं।

अन्य सिद्धोंने कहा—जो अकारसे लेकर हकारतक समस्त वर्णोंके रूपमें स्थित हो निरन्तर उच्चारित हो रहा है, अपने आत्मरूप उस परमात्माकी हम उपासना करते हैं।

दूसरे सिद्ध बोले—जो हृदय-गुफामें विराजमान दीप्तिमान् परमेश्वरको छोड़कर दूसरेका आश्रय लेते हैं, वे हाथमें आये हुए कौस्तुभ मणिको त्यागकर दूसरे तुच्छ रत्नोंकी इच्छा करते हैं।

अन्य सिद्धोंने कहा—सम्पूर्ण आशाओंका त्याग करनेपर हृदयमें स्थित ज्ञानका फलरूप यह ब्रह्म प्राप्त होता है, जिससे आशारूप विष-वल्लरीकी मूल-परम्परा ही कट जाती है।

दूसरे सिद्ध बोले--जो दुर्बुद्धि पुरुष भोग्यपदार्थोंकी अत्यन्त नीरसताको जानकर भी उनमें बारंबार अपने मनकी भावनाको बाँधता है वह मनुष्य नहीं, गदहा है।

अन्य सिद्धोंने कहा--जैसे इन्द्रने वज्रके द्वारा पर्वतोंको मारा था, उसी प्रकार बारंबार उठने और गिरने-वाले इन इन्द्रियरूपी सर्पोंपर विवेकरूपी डंडेसे प्रहार करना चाहिये !

दूसरे सिद्ध बोले—उपशम या शान्तिके पवित्र सुखको प्राप्त करना चाहिये; जो उत्तम शम (मनोनिग्रह) से सम्पन्न है, उस पुरुषका विशुद्ध चित्त ही शान्तिको प्राप्त होता है। जिसका चित्त शान्त हो गया है, उसीको अपने परमानन्दमय स्वरूपमें दीर्घकालके लिये उत्तम स्थिति प्राप्त होती है। (सर्ग ६-८)