संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
उपशम-प्रकरण ] * राजा जनकद्वारा संसारकी स्थितिपर विचार और उनका अपने चित्तको समझाना * २५९
भी रमणीय और सुस्थिरसे भी सुस्थिर पदार्थ हैं, किंतु यह सारी पदार्थ-सम्पत्ति अन्ततोगत्वा चिन्ता और दुःखका ही कारण होती है। फिर तुम उसकी इच्छा क्यों करते हो ? वे स्त्री, धन और गृह आदि विचित्र सम्पत्तियाँ यदि चित्तसे आदरणीय हों तो वे भी बहुत प्रयत्नोंसे प्राप्त करने योग्य, दुःखसे रक्षणीय तथा अवश्य विनाशशील होनेके कारण महाविपत्तिरूप ही हैं—ऐसा मेरा मत है। किंतु यदि धन, सम्पत्ति और बन्धुजनोंसे वियोगरूप आपत्तियाँ भी साधुसङ्ग, तपस्या और ज्ञान आदिकी प्राप्ति करा देनेके कारण विचित्र एव कल्याणकारिणी हैं—ऐसा मनमें विश्वास हो जाय तो वे भी विवेक-वैराग्य आदि महान् आरम्भोंसे युक्त सम्पत्तियाँ ही हैं—ऐसा मैं मानता हूँ। समुद्रमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाकी भाँति क्षण-भङ्गुर, मिथ्यारूप, एकमात्र मनका परिणामस्वरूप जो यह जगत् है, इसमें 'यह मेरा है' यह अपूर्व पद-वाक्यरूप अक्षरमाला कहाँसे आयी ? अर्थात् इसमें ममता करना व्यर्थ है। अग्निकी शिखाओंमें आसक्त हुए फतिंगोंकी भाँति मैं देश, काल और वस्तुसे सीमित तथा त्रिविध तापोंसे संतप्त किन सुख-नामक दृष्टियोंमें अनुरक्त हो रहा हूँ ? निरन्तर दग्ध करनेवाली रौरव नरककी आगमें लोटना अच्छा है, परंतु सुख-दुःखके परिवर्तनसे युक्त विषयभोग-रूप संसारमें रहना अच्छा नहीं। संसार ही समस्त दुःखोंकी चरम सीमा कहलाता है। उसके भीतर पड़े हुए शरीरमें सुखकी प्राप्ति कैसे हो सकती है। जो बाह्य आकारमात्रसे रमणीय प्रतीत होनेवाली किंतु विनाशकी प्राप्ति करानेवाली हैं, मनरूपी बंदरकी उन चपलता रूप वृत्तियोंका अनुभव हो जानेपर मैं आजसे ही इनमें रमण नहीं करूँगा। जो सैकड़ों आशारूपी पाशोंसे ओतप्रोत तथा अधोगति, ऊर्ध्वगति एवं संतापको देनेवाली हैं, उन संसारकी वृत्तियोंको मैंने बहुत भोग लिया। अब मैं इनसे विश्राम लेता हूँ। मैं प्रबुद्ध (जगा हुआ) हूँ तथा हर्ष एवं उत्साहसे भरपूर हूँ। अपने पारमार्थिक धनको चुरानेवाले मन नामक चोरको मैंने देख लिया है। अतः अब इसे मैं मारे डालता हूँ; क्योंकि इस मनने चिरकालसे मुझे मारा है—मेरा पतन कराया है। जैसे सूर्यकी धूपसे ओस या पालेके कण गल जाते हैं, उसी तरह मेरा मन यथार्थ ज्ञानद्वारा ब्रह्मतत्त्वमें नित्य-निरन्तर स्थिति प्राप्त करनेके लिये बहुत शीघ्र लयको प्राप्त होगा। सिद्ध महापुरुषोंने नाना प्रकारके उपदेशोंद्वारा मुझे अच्छी तरह बोध करा दिया है। अब मैं परमानन्दरूप परमात्मामें प्रवेश कर रहा हूँ। परमात्मारूपी मणिको पाकर एकान्तमें उसीको देखता हुआ मैं अन्य सारी इच्छाओंको शान्त करके सुखपूर्वक स्थित होऊँगा। 'यह देह मैं हूँ, यह विस्तृत धन-राज्य आदि मेरा है' इस प्रकार अन्तःकरणमें स्फुरित हुए असत्यरूपका यथार्थज्ञानके द्वारा नाश करके अत्यन्त बलशाली मनरूपी शत्रुको ध्यानके अभ्याससे अच्छी तरह मारकर मैं अतिशय शान्तिको प्राप्त हो रहा हूँ।' (सर्ग ९)
राजा जनकद्वारा संसारकी स्थितिपर विचार और उनका अपने चित्तको समझाना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! राजा जनक जब इस प्रकार चिन्तन कर रहे थे, उस समय प्रतिहारने उनके पास जाकर नैत्यिक कार्य करनेके निमित्त उठनेके लिये अनुरोध किया; परंतु राजा
२६० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
पूर्ववत् संसारकी विचित्र स्थितिपर ही विचार करते रहे।
राजा बोले—जो सुखदरूपसे स्थित है, यह राज्य कितने दिनका है ? मुझे यहाँ इस क्षणभङ्गुर राज्यसे कोई प्रयोजन नहीं है। यह सभी मायाका मिथ्या आडम्बर है। मैं इसका त्याग करके प्रशान्त महासागरकी भाँति शान्त रहकर एकान्तमें ही स्थित रहूँगा। ऐ मेरे चित्त ! बारंबार भोगोंके आस्वादनमें जो वेगपूर्वक तेरी प्रवृत्ति हो रही है, यह बड़ी घृणित है। इससे तू दूर हो जा। तेरी जो भोग भोगनेकी चतुरता है, उसे जन्म, जरा एवं जडताके समूहरूपी कीचड़की शान्तिके लिये त्याग दे। चित्त ! तू जिन-जिन अवस्थाओंमें भ्रमवश सुख देखता है, उन्हींसे तुझे महान् दुःखकी प्राप्ति होगी । इसलिये इस तुच्छ भोग-चिन्तनसे कोई लाभ नहीं है।
ऐसा विचार करके राजा जनक मौन हो गये । उनके चित्तकी चपलता शान्त हो चुकी थी। इसलिये वे चित्रलिखित पुरुषकी भाँति अचलभावसे स्थित हो गये और पुनः इस प्रकार विचार करने लगे—'मुझे कोई भी क्रिया करनेसे क्या प्रयोजन है और कुछ न करके निष्क्रिय होकर बैठ रहनेसे भी क्या मतलब है ? इस संसारमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो उत्पन्न होकर विनाशको न प्राप्त हो। मिथ्यारूपसे प्रकट हुआ यह शरीर कर्म करे या निष्क्रिय होकर बैठा रहे, सर्वत्र समान-भावसे स्थित हुए मुझ विशुद्ध चेतनकी इससे क्या क्षति होनेवाली है ? मैं न तो अप्राप्त वस्तुकी इच्छा करता हूँ और न प्राप्त वस्तुका त्याग ही । मेरा इस जगत्में न तो कुछ करनेसे प्रयोजन है और न न करनेसे ही । करने या न करनेसे जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह सब असन्मय—विनाशशील ही है । इसलिये यह शरीर उठकर क्रमशः प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन करे। यह निश्चेष्ट होकर क्यों सूख रहा है ?'
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसा विचार करके वे राजा जनक अनासक्त भावसे न्यायतः प्राप्त हुए कर्तव्य कर्मका सम्पादन करनेके लिये उठे । उन्होंने श्रेष्ठ पुरुषोंके समादरपूर्वक उस दिनका सारा कार्य भलीभाँति पूर्ण करके उसी ध्यानरूप विनोदसे अकेले ही रात बितायी । जब रात बीतने लगी, तब विषय-भ्रमसे रहित मनको समरस ( एकाग्र ) करके उन्होंने अपने चित्तको इस प्रकार समझाना आरम्भ किया—'ऐ मेरे चञ्चल चित्त ! यह संसार आत्माके सुखका साधन नहीं है । तुम शमका आश्रय लो । शमसे शान्त ( विक्षेप-रहित ) सारभूत आत्मसुखकी प्राप्ति होती है । जैसे-जैसे तुम विचित्र विकल्पोंका संकल्प करते हो, वैसे-ही-वैसे तुम्हारे विषय-चिन्तनसे यह संसार अनायास ही वृद्धिको प्राप्त होता है । दुष्ट मन ! जैसे वृक्षको सींचनेसे उसमें सैकड़ों शाखाएँ निकल आती हैं, उसी प्रकार तुम भी विषयभोगकी इच्छा करनेसे अनन्त आन्तरिक व्यथाओंसे युक्त हो जाते हो। जन्म तथा संसारकी सृष्टियाँ विषय-चिन्ताओंके विलाससे ही प्रकट हुई हैं; इसलिये तुम नाना प्रकारकी चिन्ताओंका त्याग करके उपशमको प्राप्त होओ—संसारसे उपरत हो जाओ।
उपशम-प्रकरण ] * राजा जनककी जीवन्मुक्तरूपसे स्थिति तथा विशुद्ध विचारके माहात्म्यका वर्णन * २६१
सुन्दर चित्त ! इस चञ्चल संसारसृष्टिको और शान्तिके सुखको विचारकी तराजूमें रखकर तौलो। यदि तुम्हें संसारकी सृष्टिमें ही सार प्रतीत हो तो इसीका आश्रय लो; नहीं तो शान्तस्वरूप ब्रह्ममें स्थित हो जाओ। मेरे अच्छे मन ! पहिलेसे अविद्यमान यह दृश्य-प्रपञ्च उत्पन्न हो जाय अथवा यह वर्तमान दृश्य नष्ट हो जाय, तुम इसके गुणों और अवगुणोंसे—उदय और नाशसे हर्ष-विषादरूप विषमताको न प्राप्त होओ। इस दृश्य वस्तु संसारके साथ तुम्हारा थोड़ा-सा भी सम्बन्ध नहीं है। इसका रूप है ही नहीं। ऐसे मिथ्या दृश्य जगत्से तुम्हारा इस तरहका सम्बन्ध हो ही कैसे सकता है। सुन्दर चित्त ! यदि यह दृश्य जगत् असत् है और तुम सत्य हो तो तुम्हीं बतलाओ, सत् और असत्में, जीवित और मृतमें कैसे सम्बन्ध स्थापित हो सकता है ? चित्त ! यदि तुम और दृश्य जगत् दोनों ही सत् और सदा साथ रहनेवाले हो, तब तुम्हारे लिये हर्ष और विषादका अवसर ही कहाँ है ? इसलिये इस विशाल आन्तरिक व्यथाका त्याग करो। आत्मानन्दको, जो मौन होकर सो रहा है, विवेक-वैराग्यसे जगाओ और इस अमङ्गलमयी स्थिति—चञ्चलताको छोड़ो। अरे शठ चित्त ! जड़ दृश्यरूप इस संसारमें ऐसी कोई उन्नत और उत्तम वस्तु नहीं है, जिसकी प्राप्ति होनेसे तुम्हें परम परिपूर्णता प्राप्त हो जाय। इसलिये अभ्यास और वैराग्यके बलसे अत्यन्त धीरताका आश्रय ले चञ्चलताको त्याग दो।' (सर्ग १०-११)
राजा जनककी जीवन्मुक्तरूपसे स्थिति तथा विशुद्ध विचार एवं प्रजाके अद्भुत माहात्म्यका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उस समय इस प्रकार विचार करके धीरबुद्धि राजा जनक अपने राज्यके सारे काम-काज सँभालने लगे। फिर उन्हें मोह नहीं हुआ (उनके मनमें ममता और आसक्ति नहीं जागी)। उनका मन कहीं हर्षके स्थानोंमें किञ्चिन्मात्र भी उल्लासको प्राप्त नहीं हुआ। जैसे केवल सुषुप्तिमें स्थिति हो, उस प्रकार सदा ही विक्षेपरहित एवं शान्तभावसे स्थिर रहा। तबसे लेकर उन्होंने न तो दृश्य जगत्को मनसे ग्रहण किया और न उसका त्याग ही किया। केवल वर्तमान संसारमें वे निःशङ्क होकर स्थित रहे। इस प्रकार आत्मविवेकके अनुसंधानसे राजा जनकका परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान अनन्त एवं अत्यन्त विशुद्ध हो गया। सम्पूर्ण भूतोंके आत्मस्वरूप परमात्माको जानने तथा आत्माकी अनन्तताका अनुभव करनेवाले राजाने चिन्मय परमात्मामें स्थित सारे पदार्थोंको आत्मभूत देखा—अपने आत्माके रूपमें अनुभव किया। वे न तो अनुकूल वस्तुको पाकर हर्षसे उल्लसित हुए और न कभी प्रतिकूल वस्तुको पाकर शोकसे आतुर ही हुए। सब कुछ प्रकृतिका व्यवहार होनेके कारण वे
२६२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उसमें सदा ही समचित्त एवं विकारशून्य होकर रहे। तभीसे लोकमें सगुण-निर्गुण परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करनेवाले और समस्त प्राणियोंको सम्मान देनेवाले वे राजा जनक परमात्माके यथार्थ ज्ञानमें निपुण हो जीवन्मुक्त हो गये। वे लोगोंको प्राणोंके समान प्रिय थे और विदेह देशका राज्य करते हुए कभी हर्ष और विषादके वशीभूत हो संतप्त नहीं होते थे। सुषुप्तावस्थामें स्थितकी भाँति राजा जनककी राग-द्वेष आदि समस्त वासनाएँ सम्पूर्ण पदार्थोंसे सर्वथा निवृत्त हो गयी थीं। वे न कभी भूतकी चिन्ता करते और न भविष्यका अनुसंधान। वर्तमान कालका ही वे प्रसन्नतापूर्वक अनुसरण करते थे। कमलनयन श्रीराम ! अपने परमात्मविषयक विवेकपूर्ण विचारधारा ही राजा जनकको पानेयोग्य परब्रह्म परमात्म-रूप वस्तुकी पूर्णतया प्राप्ति हो गयी।
अपने चित्तसे तबतक परमात्मतत्त्वका विचार करते रहना चाहिये, जबतक विचारोंकी सीमाका अन्त (परमात्माका यथार्थ ज्ञानरूप फल) प्राप्त न हो जाय। महापुरुषोंके सङ्गसे निर्मलतारूप अभ्युदयको प्राप्त हुए चित्तके विवेकपूर्वक शुद्ध विचारसे जो परमात्मरूप परमपद प्राप्त होता है, वह न तो गुरुके उपदेशसे, न शास्त्रार्थसे और न पुण्यसे ही प्राप्त होता है। श्रीराम ! अपने मित्रके तुल्य स्थिर, शुद्ध एवं तीक्ष्ण बुद्धिसे जो उत्तम पद प्राप्त होता है, वह दूसरी किसी क्रियासे नहीं होता। जिस पुरुषकी पूर्वापरका विचार करनेवाली कुशाग्र एवं तीक्ष्ण प्रज्ञारूपी दीपशिखा प्रज्वलित है, उसे कभी अज्ञानरूपी अन्धकार क्लेश नहीं पहुँचाता। महामते ! दुःखरूपी उत्ताल तरङ्गोंसे व्याप्त जो विपत्तिरूपिणी दुस्तर सरिताएँ हैं, उनको तीक्ष्ण और विशुद्ध बुद्धिरूपी नौकाद्वारा ही पार किया जाता है। जैसे वायुका हल्का-सा झोंका भी निस्सार तिनकेको उड़ा देता है, उसी प्रकार प्रज्ञाहीन मूढ़ पुरुषको थोड़ी-सी आपत्ति भी शोकाकुल कर देती है।
शत्रुमर्दन श्रीराम ! तीक्ष्ण और विशुद्ध प्रज्ञासे युक्त पुरुष दूसरोंकी सहायता तथा शास्त्राभ्यासके बिना भी संसार-समुद्रसे अनायास ही पार हो जाता है। जैसे फलकी प्राप्तिके लिये सींचने और संरक्षण आदिके द्वारा अंगूर आदिकी लताको बढ़ाया जाता है, उसी प्रकार शास्त्रोंके अभ्यास और सत्पुरुषोंकी संगतिसे पहले प्रज्ञाको बढ़ाना चाहिये अर्थात् बुद्धिको पवित्र एवं तीक्ष्ण बनाना चाहिये। जैसे चन्द्रमण्डल संसारके अन्धकारको दूर करनेवाली चाँदनीको उत्पन्न करता है, उसी प्रकार निष्काम कर्मरूपी वृक्ष, जिसका शुद्ध तीक्ष्ण प्रज्ञाबल ही महान् मूल है परम रसमय परमात्माकी प्राप्तिरूप फलको उत्पन्न करता है। लोग धन-सम्पत्ति आदि बाह्य पदार्थोंके उपार्जनके लिये जैसा प्रयत्न करते हैं, वही यत्न पहले विशुद्ध बुद्धिकी अभिवृद्धिके लिये करना चाहिये। बुद्धिकी मन्दता समस्त दुःखोंकी चरम सीमा है, विपत्तियोंका सबसे बड़ा भंडार है और संसाररूपी वृक्षोंका बीज है; अतः उसका यत्नपूर्वक विनाश करना चाहिये।
रघुनन्दन ! न दानोंसे, न तीर्थोंसे और न तपस्यासे ही भयंकर संसार-सागरको पार किया जा सकता है। केवल पवित्र एवं अविचल बुद्धिरूपी जहाजका आश्रय लेनेसे ही उसके पार पहुँचा जा सकता है। पृथ्वीपर विचरनेवाले मनुष्योंको भी जो दैवी सम्पत्ति प्राप्त होती है, वह शुद्ध एवं अविचल प्रज्ञामयी लतासे उत्पन्न हुआ स्वादिष्ट फल है। जिन सिंहोंने अपने पंजोंसे मत्त गजराजोंके कुम्भस्थल विदीर्ण कर डाले थे, वे भी सियारोंद्वारा बुद्धि-बलसे इस तरह पराजित हुए हैं, जैसे सिंहोंसे हरिन। विवेकी पुरुषके हृदयरूपी कोशागारमें स्थित यह पवित्र प्रज्ञा चिन्तामणिके समान है। यह कल्पलताकी भाँति मनोवाञ्छित फल देती है। श्रेष्ठ पुरुष पवित्र और अविचल प्रज्ञाके द्वारा संसार-सागरसे पार हो जाता है, किंतु अधम मानव उसमें डूब जाता है। क्यों न
उपशम-प्रकरण ] * चित्तकी शान्तिके उपायोंका युक्तियोंद्वारा वर्णन * २६३
नौका चलानेकी कलामें शिक्षित हुआ केवट ही नौकासे नदीके पार पहुँचता है, अशिक्षित केवट नहीं। जैसे समुद्रकी भँवरमें चक्कर काटती हुई नौका उसपर चढ़े हुए लोगोंको विपत्तिमें डाल देती है, उसी प्रकार राग, द्वेष, लोभ आदि असन्मार्गमें लगायी गयी अशुद्ध बुद्धि संसारमें भटककर मनुष्यको आपत्तिमें डाल देती है और वही बुद्धि यदि विवेक, वैराग्य आदि सन्मार्गमें लगायी जाय तो वह मनुष्यको भवसागरसे पार कर देती है। जैसे कवच बाँधकर युद्ध करनेवाले योद्धाको बाण पीड़ित नहीं करते, उसी प्रकार विवेकशील, मूढ़तारहित एवं पवित्र बुद्धिवाले पुरुषको तृष्णावर्गके काम, लोभ आदिसे उत्पन्न हुए क्रोध, द्वेष और मोह आदि दोष बाधा नहीं पहुँचाते। रघुवीर! इस लोकमें प्रज्ञारूपी नेत्रसे यह सारा जगत् ठीक-ठीक दिखायी देता है। उस यथार्थदर्शी पुरुषके पास न तो सम्पत्तियाँ आती हैं और न विपत्तियाँ ही। जैसे सूर्यको ढकनेवाला जलमय विस्तृत काला मेघ वायुसे छिन्न-भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार अहंकाररूपी मत्त मेघ जो परमात्मारूपी सूर्यपर आवरण डालनेवाला है, पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिरूपी वायुसे बाधित हो जाता है। परमात्माकी प्राप्तिरूप अनुपम उन्नत पदमें पहुँचनेवाले पुरुषको पहले सत्सङ्ग और विवेक-वैराग्यद्वारा इस बुद्धिका ही शोधन करना चाहिये—ठीक उसी तरह, जैसे धान्य आदिकी वृद्धि चाहनेवाला किसान सबसे पहले पृथ्वीको ही हलसे जोतकर शुद्ध बनाता है। (सर्ग १२)
चित्तकी शान्तिके उपायोंका युक्तियोंद्वारा वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन! बिना जीती हुई मनसहित इन्द्रियाँ शत्रुके समान हैं। इन्हें तबतक बारंबार जीतकर परमात्मामें लगानेका प्रयत्न करे, जबतक अन्तःकरण स्वयं ही परमात्माके ध्यानमें एकाग्र होकर शुद्ध एवं प्रसन्न न हो जाय। इस प्रकारके साधनसे नित्य प्रसन्न, सर्वव्यापी, दिव्यस्वरूप, देवेश्वर परमात्माका स्वतः साक्षात्कार हो जाता है और ऐसा होनेपर सारी दुःख-दृष्टियाँ नष्ट हो जाती हैं। उस सगुण-निर्गुणरूप परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार होनेपर हृदयग्रन्थिरूपी कुदृष्टियाँ जो मोहरूपी बीजकी मुट्ठियाँ और नाना प्रकारकी आपत्तियोंकी दृष्टियाँ हैं, नष्ट हो जाती हैं। नित्य आन्तरिक विचारवाले और जगत्को क्षणभङ्गुर देखनेवाले पुरुषका अन्तःकरण राजा जनकके अन्तःकरणकी तरह समय आनेपर अपने-आप ही शुद्ध हो जाता है। संसारसे भयभीत हुए पुरुषोंके लिये सच्चिदानन्दघन परमात्माके ध्यानरूप परम पुरुषार्थको छोड़कर न दैव शरण देनेवाला है न कर्म, न धन आश्रय देनेवाला है न भाई-बन्धु (अपने उद्धारके लिये इनमेंसे कोई भी आश्रय लेने योग्य नहीं है, केवल एकमात्र परमात्मा ही शरण लेने योग्य है)।
तात! जो लोग विवेक, वैराग्य, विचार, उपासना और धर्मपालन आदि उत्तम कार्योंमें भाग्यके अधीन रहते हैं तथा मिथ्या विपरीत कल्पनाएँ करते रहते हैं, उनकी मन्दमति विनाशकी ओर ले जानेवाली है; अतः उसका अनुसरण नहीं करना चाहिये। उत्तम विवेकका आश्रय ले अपने आत्माका अपने ही द्वारा अनुभव करके परम वैराग्यसे पुष्ट हुई पवित्र एवं सूक्ष्म बुद्धिरूप नौकाद्वारा संसार-सागरको पार करे। श्रीराम! यह मैंने तुमसे आकाशसे गिरनेवाले फलके समान शीघ्रतापूर्वक होनेवाली ज्ञान-प्राप्तिका वर्णन किया है। यह ज्ञान अज्ञानरूपी वृक्षको काट डालनेवाला तथा निरतिशय सुख प्रदान करनेवाला है। वाञ्छित (मनके अनुकूल) और अवाञ्छित (मनके प्रतिकूल) वस्तुकी आशङ्कारूपिणी चञ्चल वानरियाँ जिस चित्तरूपी वृक्षपर कूद-फाँद मचाये रहती हैं, उसमें सौम्यता (शान्ति) कहाँसे आ सकती है।
निष्कामता, निर्भयता, स्थिरता, समता, ज्ञान, निरीहता, निष्क्रियता, सौम्यता, निर्विकल्पता, धैर्य, मैत्री,
सं० यो० व० अं० १०—
२६४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मननशीलता, संतोष, मृदुता और मधुरभाषिता—ये गुण हेय और उपादेयसे रहित ज्ञानी पुरुषमें बिना किसी वासनाके रहते हैं। जैसे बहते हुए जलको बाँधसे रोका जाता है, उसी प्रकार निकृष्ट विषयोंकी ओर दौड़ते हुए मनको विवेक-वैराग्यके बलसे विषयोंकी ओरसे लौटाये अर्थात् चित्तकी बहिर्मुख वृत्तिको विवेक वैराग्यद्वारा अन्तर्मुखी करे। श्रीराम ! मोह संसारको भूलकर फिर नहीं प्रस्फुटित होता और संसार चित्तको भुलाकर फिर नहीं अङ्कुरित होता। खड़े होते, चलते, सोते, जागते, कहीं निवास करते, उछलते और गिरते-पड़ते यह 'दृश्य-प्रपञ्च असत् ही है' ऐसा मनमें निश्चय करके इसके प्रति आस्थाका परित्याग कर देना चाहिये। रघुनन्दन ! समताका भलीभाँति आश्रय ले प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन करते हुए अप्राप्तका चिन्तन न करके निर्द्वन्द्व हो इस लोकमें विचरना चाहिये । श्रीराम ! तुम्हीं सर्वज्ञ, तुम्हीं अजन्मा, तुम्हीं सबके आत्मा और तुम्हीं महेश्वर हो। तुम अपने चैतन्यस्वभावसे कभी च्युत नहीं होते, तथापि तुमने इस प्रकार इस संसार-का विस्तार किया है । जिसने सद्रूप आत्मदृश्यमें परमार्थ सत्स्वरूपताकी भावना करके सब ओरसे दूसरी भावनाका परित्याग कर दिया, वह पुरुष हर्ष, क्रोध और विषाद आदिसे होनेवाले दोषोंसे नहीं बँधता । जो राग-द्वेषसे मुक्त है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझता है तथा संसारकी वासनाओंका त्याग कर चुका है, ऐसा योगी युक्त कहलाता है । वह जो कुछ करता, खाता, देता और नष्ट करता है, उन सब क्रियाओंमें उसकी अहंभावना नहीं होती तथा वह सुख-दुःखमें भी समान भाव रखता है । जो इष्ट और अनिष्टकी भावनाका त्याग करके प्राप्त हुए कार्यको कर्तव्य समझकर ही उसमें प्रवृत्त होता है, उसका कहीं भी पतन नहीं होता । महामते ! यह जगत् चेतनमात्र ही है—इस प्रकारके निश्चयवाला मन जब भोगोंका चिन्तन त्याग देता है, तब वह शान्तिको प्राप्त हो जाता है ।
वास्तवमें तो न मन है, न बुद्धि है और न यह शरीर ही है; केवल एकमात्र आत्मा ही सदा विद्यमान है । आत्मा ही यह सम्पूर्ण जगत् है और आत्मा ही कालक्रम है । वह विशुद्ध आत्मा आकाशसे भी सूक्ष्म होनेके कारण प्रतीत न होनेपर भी ध्रुव सत्य है । सूक्ष्म होनेके कारण प्रत्यक्ष प्रतीत न होनेपर भी यह आत्मा नित्य सत्य चेतनरूप है, अतएव सब प्रकारके लक्षणोंसे अतीत शुद्ध आत्मा केवल अपने अनुभवसे ही जाना जाता है। जहाँ केवल परमात्माकी चेतनता है, वहाँ उसी तरह मनका क्षय हो जाता है, जैसे प्रकाशमें अन्धकारका नाश हो जाता है। अतः उस आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये वैराग्यसे, प्राणायामके अभ्याससे, विवेक-विचारसे, दुर्व्यसनोंके विनाशसे तथा परमार्थ-तत्त्वके बोधसे प्राणवायुका निरोध करना चाहिये । जड़ तथा स्वरूप-हीन होनेके कारण मन सदा ही मरा हुआ है । किन्तु आश्चर्य है कि उस मरे हुए मनके द्वारा ही लोग मारे जा रहे हैं । चक्रके समान घूमती हुई यह मूर्खताकी परम्परा बड़ी विचित्र है। अहो ! महामायावी मयासुरका भी निर्माण करनेवाली यह माया अत्यन्त अद्भुत है, जिसके कारण अत्यन्त चञ्चल चित्तके द्वारा भी यह लोक अभिभूत हो रहा है । जब मूर्खता आती है, तब पुरुष सभी आपत्तियोंका भाजन हो जाता है । भला, अज्ञानीपर कौन-सी आपत्ति नहीं आती । देखो, अज्ञानने ही मूर्खता-से इस सृष्टिको उत्पन्न किया है । हाय ! बड़े क्लेशकी बात है कि यह सृष्टि दुर्बुद्धिके कारण मूर्खताके वशमें पड़ी हुई उसके द्वारा पीड़ित हो रही है, तथापि यह जीव असत्का अनुवर्तन करके उत्तरोत्तर दुःख उठानेके लिये ही इस सृष्टिको उपलब्ध करता है । मैं समझता हूँ, यह मूर्खतामयी सृष्टि अत्यन्त सुकुमार-अविचार-मात्रसे सिद्ध है। अतएव एकमात्र विचारसे ही इसका बाध किया जा सकता है । श्रीराम ! इस मूर्खलोकमयी सृष्टिके रूपमें असद्रूप मन ही प्रकट हुआ है अर्थात्
उपशम-प्रकरण ] * अनधिकारीको दिये गये उपदेशकी व्यर्थता और जीवन्मुक्तके स्वरूपका वर्णन * २६५
यह मनका ही विकार है । जो पुरुष उस मनको वशमें नहीं कर सकता, वह अध्यात्मशास्त्रके उपदेशका पात्र नहीं है। उस पुरुषकी बुद्धि चारों ओरसे विषयोंमें ही आरूढ़ है और उतनेसे ही वह अपनेको परिपूर्ण मानती है, इसीलिये परमात्माकी ओर अभिमुख नहीं होती, सूक्ष्म वस्तुके विचारमें भी समर्थ नहीं हो पाती। इसीलिये उसमें आध्यात्मिक शास्त्रका उपदेश पानेकी योग्यता नहीं होती। (सर्ग १३)
अनधिकारीको दिये गये उपदेशकी व्यर्थता, मनको जीतने या शान्त करनेकी प्रेरणा तथा तत्त्वबोधसे ही मनके उपशमका कथन; तृष्णाके दोष, वासनाक्षय और जीवन्मुक्तके स्वरूपका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस भूतलपर जो मनुष्य पशु-पक्षियोंके समानधर्मा होकर आहार, निद्रा और मैथुन आदिमें ही लगे हुए हैं, उन्हें उपदेश देना उचित नहीं। भला, वनमें ठूंठे काठके निकट कथाका तात्पर्य कहनेसे कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा ? जिन्होंने अपने मनको विषयोंमें फैला रखा है, उन मनुष्योंमें और पशुओंमें क्या अन्तर है ? पशु रस्सीसे बाँधकर खींचे जाते हैं और मूढ़चेता मनुष्य आसक्तिके कारण मनके द्वारा विषयोंकी ओर घसीटे जाते हैं। जिन लोगोंने अपने मनको नहीं जीता है, उन्हें सब ओरसे दुःखदायिनी दशाएँ प्राप्त होती हैं। रघुनन्दन ! जिन्होंने अपने चित्तपर विजय प्राप्त कर ली है, उनके दुःख उत्तम विचारके द्वारा दूर किये जा सकते हैं। इसलिये जिसे ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान हो चुका है, वह ज्ञानी पुरुष उनके दुःखका मार्जन करनेमें प्रवृत्त हो। इस त्रिगुणात्मक मायामय प्रपञ्चका आश्रय लेना बन्धनमें ही डालनेवाला है। यदि इसका त्याग कर दिया जाय तो यह भव-बन्धनसे छुटकारा दिला सकता है। 'मैं' और 'यह' दोनों ही नहीं हैं इस प्रकार चिन्तन करते हुए तुम अनन्त आकाशके समान विशाल हृदयवाले आत्माके रूपमें प्रतिष्ठित हो पर्वतके समान अविचल-भावसे स्थित हो जाओ । यह सम्पूर्ण जगत् परमात्मा ही है, ऐसे ज्ञानका अन्त:करणमें उदय होनेपर कहाँ चित्त है, कहाँ चेत्य है और क्या चेतन है ? मैं चिन्मय ब्रह्म हूँ, जीव नहीं; क्योंकि वास्तवमें एकमात्र परब्रह्म परमात्माके सिवा जीव नामक कोई अलग पदार्थ नहीं है। यही चित्तकी शान्ति है और इसीको परम सुख कहते हैं। रघुनन्दन ! यह संसार परमात्माका ही स्वरूप है, ऐसा निश्चय हो जानेपर निस्सदेह चित्तकी कोई अलग सत्ता नहीं रह जाती। इस प्रकार परमार्थ-तत्त्वका बोध होनेसे यह जगत् परमात्मा ही है, ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाता है। उस दशामें जैसे सूर्यके प्रकाशसे अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी तरह मन भलीभाँति गल जाता है। जबतक मनरूपी सर्प इस शरीरमें विद्यमान है, तबतक महान् भय बना रहता है। योगसे उसको मार भगानेपर भयके लिये अवसर ही कहाँ रह जाता है ?
श्रीराम ! तृष्णा विष-लताके समान है। यह बढ़ते हुए महान् मोहको देनेवाली और भयंकर है। वह मनुष्यको केवल मूर्च्छा (अज्ञान) ही देती है (ज्ञान-जनित सुख नहीं)। वर्षा ऋतुकी अँधेरी रातके समान मनमें अनन्त विकार (भय आदि) उत्पन्न करनेवाली यह तृष्णा जब-जब प्रकट होती है, तब-तब महामोह प्रदान करती है। रघुनन्दन ! संसारमें जो दुरन्त, दुर्जर और महान् दुःख हैं, वे तृष्णारूपिणी विष-लताके ही फल हैं। तृष्णासे पीड़ित मनुष्यमें दीनता प्रत्यक्ष देखी गयी है। वह मन मारे रहता है, उसका तेज नष्ट हो जाता है, वह बहुत नीचे गिर जाता है। वह मोहग्रस्त होता, रोता और गिरता रहता है। निश्चय ही जहाँ तृष्णारूपिणी काली रात नष्ट हो गयी है, वहाँ शुद्ध
२६६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
पक्षके चन्द्रमाकी भाँति सत्कर्म ही बढ़ते हैं। जिस पुरुषरूपी वृक्षमें तृष्णारूपी घुन नहीं लगे हैं, उसमें सदा पुण्यरूपी फूल खिलते हैं, और वह विकासशील अवस्थाको प्राप्त होता है। तृष्णाद्वारा ये सब लोग सूतमें बँधे हुए पक्षीके समान देश-विदेशमें मटकाये जाते, शोकसे जर्जर किये जाते और अन्ततोगत्वा मारे जाते हैं। जैसे हिरन तिनकोंसे आच्छादित हुए गड्ढेके ऊपर रक्खी हुई हरी-हरी घासकी शाखाको चरनेके लिये जाकर उस गड्ढेमें गिर जाता है, उसी प्रकार तृष्णाका अनुसरण करनेवाला मूढ़ मनुष्य नरकमें गिरता है। बुढ़ापा कितना ही बढ़ा हुआ क्यों न हो, वह नेत्रोंको क्षणभरमें उतना जीर्ण (अंधा) नहीं बनाता, जितना हृदयमें रहनेवाली पिशाचीके समान तृष्णा बना देती है। जिसका आकार सम्पूर्ण दुःखोंसे भरा हुआ है और जो जगत्के लोगोंके जीवनका नाश करनेवाली है, उस तृष्णाको क्रूर सर्पिणीके समान दूरसे ही त्याग देना चाहिये।
दूसरोंको मान देनेवाले कमलनयन श्रीराम ! वासनाका त्याग ज्ञेय और ध्येयके भेदसे दो प्रकारका बताया जाता है। सबको ब्रह्मरूपसे समान समझकर मनुष्य ममतासे रहित हो जिस वासनाक्षयका सम्पादन करके शरीरका त्याग करता है, वह ज्ञेय नामक वासनाक्षय कहा गया है। जो अहङ्कारमयी वासनाका त्याग करके लोकसंग्रहोचित व्यवहारमें संलग्न रहता है, वह ध्येय नामक वासनाक्षयसे युक्त हुआ पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। रघुनन्दन ! मूल अज्ञानके सहित सङ्कल्परूप वासनाका त्याग करके जो शान्तिको प्राप्त हुआ है, उस जीवन्मुक्त पुरुषको ज्ञेय नामक वासनात्यागसे सम्पन्न समझ। जनक आदि महात्मा पुरुष ध्येय नामक वासनात्यागका सम्पादन करके जीवन्मुक्त हो लोकसंग्रहके लिये व्यवहारमें स्थित हुए हैं। ज्ञेय नामक वासनात्यागको सम्पन्न करके शान्तिको प्राप्त हुए विदेहमुक्त पुरुष परावरस्वरूप परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित होते हैं। रघुनन्दन ! पूर्वोक्त दोनों ही त्याग समान हैं। दोनों ही प्रकारके त्यागवाले पुरुष मुक्त-पदपर प्रतिष्ठित हैं। ये दोनों ही ब्रह्मभावको प्राप्त हैं और दोनों ही चिन्ता एवं तापसे छुटकारा पा चुके हैं। एक (ध्येय नामक वासनाक्षयसे युक्त) पुरुष इस देहके रहते हुए ही जीवन्मुक्त होकर शोक और चिन्तासे रहित हो जाता है। और (दूसरा ज्ञेय नामक वासनाक्षयसे युक्त) पुरुष देहत्यागके अनन्तर मुक्त (ब्रह्मके स्वरूपमें स्थित) होता है (उसे विदेहमुक्त कहते हैं)। जो समयानुसार निरन्तर प्राप्त होनेवाले सुखों और दुःखोंमें हर्ष और शोकके वशीभूत नहीं होता, वही इस लोकमें मुक्त कहा जाता है। जिस पुरुषका इष्ट वस्तुओंमें राग और अनिष्ट वस्तुओंमें द्वेष नहीं होता, वह मुक्त कहलाता है। जिस पुरुषका अहंता-ममताको लेकर ग्रहण और त्यागरूप संकल्प क्षीण हो गया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। हर्ष, अमर्ष, भय, क्रोध, काम और कायरताकी दृष्टियोंसे जो रहित है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! महर्षि वसिष्ठ जब इतना उपदेश दे चुके, तब दिन बीत गया, सूर्य अस्ताचलको चले गये। उस सभाके सभी सदस्य मुनिको नमस्कार करके सायंकालिक उपासनाके निमित्त स्नान करने चले गये और रात बीतनेपर सूर्यकी किरणोंके उदयके साथ ही फिर उस सभाभवनमें आ गये।
(सर्ग १४-१६)
जीवन्मुक्तिकी प्राप्ति करानेवाले विभिन्न प्रकारके निश्चयों तथा सब कुछ ब्रह्म ही है, इस पारमार्थिक स्थितिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जो विदेहमुक्त हैं, वे वाणीके विषय नहीं होते (शरीर त्यागकर साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हो जानेकेकारण उनकी महिमातकवाणीकी पहुँच नहीं हो पाती। इसलिये उनकी स्थितिका वर्णन नहीं
उपशम-प्रकरण] * महापुरुषोंके स्वभावका वर्णन तथा अनासक्त-भावसे संसारमें विचरनेका उपदेश * २६७
किया जा सकता)। अतः तुम इस जीवन्मुक्तिका वर्णन सुनो। संसार सत्य है, यह समझते हुए जिसके कारण विषय-भोगोंके भोगनेमें दृढ भावना हो गयी है, ऐसी तृष्णाद्वारा जीवकी जो बाह्य पदार्थमें उसकी सत्ताको लेकर आसक्ति है, उसे आचार्यलोग सुदृढ़ संसार-बन्धन कहते हैं। जीवन्मुक्तोंके शरीरके अन्तःकरणमें 'भोग पदार्थ मिथ्या है' इस निश्चयसे हृदयमें भोग संकल्परहित और बाह्य संसारमें विहार करनेवाली स्फुरणा हुआ करती है। महामते श्रीराम ! 'यह मुझे प्राप्त हो' इस प्रकारकी जो हृदयमें भावना है, उसे तुम तृष्णा और सङ्कल्प नामक शृङ्खला समझो। उस तृष्णाका सत् और असत् सभी पदार्थोंमें सदा त्याग करके जो परम उदार हो गया है, वह महामनस्वी पुरुष जीवन्मुक्ति पदको प्राप्त करता है।
श्रीराम ! विचारवान् पुरुषके हृदयमें चार प्रकारका दृढ़ निश्चय होता है—पहला निश्चय यह है कि 'मैं सिरसे लेकर पैरतक माता-पिताके द्वारा रचा गया हूँ; यह असत् दृष्टि है। इसके कारण मनुष्यको बन्धन प्राप्त होता है। मैं देह-इन्द्रिय आदि सब पदार्थोंसे रहित तथा सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर हूँ,—ऐसा जो दूसरा निश्चय है, वह साधुपुरुषोंको मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला होता है। रघुनन्दन ! 'जगत्के सब पदार्थ मुझ अविनाशी परमात्माके ही स्वरूप हैं' इस तरहका तीसरा निश्चय भी मोक्षकी ही प्राप्ति करानेवाला है। 'अहंकार अथवा यह सारा जगत् सदा आकाशके समान शून्य ही है' ऐसा जो चौथा निश्चय है, वह भी मोक्षकी ही सिद्धिका कारण होता है। इन चार निश्चयोंमें जो पहला है, उसे बन्धनकारक कहा गया है। शुद्ध भावनासे उत्पन्न हुए शेष तीन प्रकारके निश्चय मोक्षदायक बताये गये हैं।
महामते ! मैं आत्मा ही सब कुछ हूँ—इस प्रकारका जो निश्चय है, उसे पाकर ही मेरी बुद्धि फिर कभी विषादको नहीं प्राप्त होती। आत्माकी महिमा ऊपर-नीचे और अगल-बगलमें—सर्वत्र व्यापक है। सब आत्मा ही है, ऐसे आन्तरिक निश्चयसे युक्त पुरुष कभी बन्धनमें नहीं पड़ता। जैसे अपार महासागर पातालतक जलसे भरा हुआ है, वैसे ही ब्रह्मासे लेकर कीट-पतङ्गतक सारा जगत् परमात्मासे परिपूर्ण है। इसलिये एकमात्र ब्रह्म ही नित्य और सत्य है। उससे अतिरिक्त जगत्की कोई सत्ता नहीं है—ठीक वैसे ही जैसे सारा समुद्र जल ही है, उससे भिन्न तरङ्ग आदि कुछ नहीं हैं। जैसे सोनेके कड़े, बाजूबंद और नूपुर आदि सुवर्णसे भिन्न नहीं हैं, उसी तरह वृक्ष, तृण आदि कोटि-कोटि पदार्थ आत्मासे भिन्न नहीं हैं। परमात्ममयी अद्वैतशक्ति ही द्वैत और अद्वैतके भेदसे जगन्निर्माणकी लीलाको करती हुई विस्तारको प्राप्त होती है। वास्तवमें न तो अहंकार है और न यह जगत् ही है। यह सब कुछ केवल निर्विकार शान्त विज्ञानानन्दघन ही प्रकाशित हो रहा है। यह संसार न तो असत् है और न सत् ही है—सदा यही समझना चाहिये। परम, अमृत, अनादि, सब ज्योतियोंको प्रकाशित करनेवाला, अजर, अजन्मा, अचिन्त्य, निष्कल, निर्विकार, सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित, प्राणोंका भी प्राण, समस्त सङ्कल्पोंसे रहित, कारणोंका भी कारण, नित्य उदित, परमात्मा, व्यापक, चिन्मय प्रकाशस्वरूप आकाशमें परिपूर्ण, अनुभवका बीज (कारण), अपने आपमें ही अपने आपका अनुभव करने योग्य, आन्तरिक आनन्दानुभवस्वरूप ब्रह्म ही तुम, मैं और जगत् है। उससे भिन्न कुछ नहीं है। इस प्रकारका निश्चय तुम्हें करना चाहिये। (सर्ग १७)
महापुरुषोंके स्वभावका वर्णन तथा अनासक्त-भावसे संसारमें विचरनेका उपदेश
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! जिनका चित्त एकाग्र है तथा जो काम, लोभ आदि कुदृष्टियोंसे
आहत नहीं हुए हैं, इस संसारमें लीलापूर्वक विचरनेवाले उन महापुरुषोंका निम्नाङ्कित स्वभाव बताया जा रहा है।
२६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जीवन्मुक्त चित्तवाला मुनि इस संसारमें विचरण करता हुआ भी आदि, मध्य और अन्तमें—सदा ही रसहीन जो जगत्की अवस्थाएँ हैं, उनको उपहासके योग्य समझे। जो न तो प्राप्त हुई प्रिय वस्तुका अभिनन्दन करता है, न अप्रियसे द्वेष करता है, न नष्ट हुई वस्तुके लिये शोक करता है और न अप्राप्त वस्तुको पानेकी इच्छा ही करता है, सदा मननशील रहकर कर्तव्य कर्ममें आलस्य छोड़कर प्रवृत्त होता है, वह पुरुष संसारमें कभी दुखी नहीं होता। जो पूछनेपर प्रस्तुत विषयका प्रतिपादन करता है, न पूछनेपर मौन हो सूखे काठकी भाँति अविचलभावसे स्थित रहता है तथा इच्छा और अनिच्छाके बन्धनसे मुक्त है, वह पुरुष संसारमें दुखी नहीं होता। जो सबके अनुकूल बोलता, किसीके पूछने या प्रेरणा करनेपर सुन्दर उक्तियोंद्वारा समाधान करता और प्राणियोंके मनोभावको समझ लेता है, वह पुरुष संसारमें दुखी नहीं होता। वह परम पदमें आरूढ़ हो जगत्की क्षणभङ्गुर अवस्थाको अपनी शान्तबुद्धिके द्वारा हँसता हुआ-सा देखता है। रघुनन्दन ! जिन्होंने अपने चित्तको जीत लिया है और परावरस्वरूप परब्रह्म परमात्माका साक्षात् करके जो महात्मा हो गये हैं, उन्हींका ऐसा स्वभाव मैंने तुम्हें बताया है।
अपने चित्तको न जीतनेवाले मूढ़ मनुष्योंके जो यज्ञ आदि कर्म हैं, वे फलकी कामनासे युक्त होते हैं, नाना प्रकारके दम्भ, मान, मद आदि दुर्गुणोंसे भरे होते हैं; अतएव पुनर्जन्म आदिके कारण होनेवाले सुख-दुःखोंसे परिपूर्ण हुआ करते हैं। इसलिये हम उन मूढ़ मनुष्योंके उद्धारका कोई उपाय नहीं बता सकते। रघुनन्दन ! तुम तो भीतरसे सब आशाओंका त्याग करके, वीतराग और वासनाशून्य हो बाहरसे समस्त सत्कर्मोंका एवं सदाचारोंका ठीक-ठीक पालन करते हुए संसारमें विचरो। श्रीराम ! तुम उदार, सदाचारी, समस्त शास्त्रीय कर्मोंका भलीभाँति आचरण करनेवाले तथा भीतर सम्पूर्ण कामनाओं और आसक्तियोंसे शून्य हो संसारमें विचरण करो। रघुनन्दन ! तुम सब पदार्थोंका यथार्थ रहस्य एवं अन्तर जान चुके हो; इसलिये जैसी अभीष्ट हो वैसी ही दृष्टिसे देखते हुए अनासक्तभावसे संसारमें विचरो। श्रीराम ! अहंकारसे रहित, अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित आकाशके समान निर्लेप एवं निर्मल तथा कलङ्कसे दूर रहकर संसारमें विचरण करो। राघव ! सैकड़ों आशारूपी पाशोंसे नित्य मुक्त, सब पदार्थोंमें सम तथा बाहर प्रजाओंके हितकर कार्योंमें तत्पर रहकर तुम लोकमें विचरो। वास्तवमें जीवात्माका न तो बन्धन है और न मोक्ष ही है। यह मिथ्या माया इन्द्रजालकी भाँति संसारमें मटकानेवाली है। आत्मा तो सर्वथा एकरूप, सर्वव्यापी और आसक्तिके बन्धनसे रहित है; फिर उसका बन्धन कैसे हो सकता है। और जब वह बँधा ही नहीं है, तब किसके लिये मोक्षका विधान होगा। यह भ्रान्तरूप विशाल संसार यथार्थ तत्त्वको न जाननेके कारण अज्ञानसे ही उत्पन्न हुआ है। यथार्थ तत्त्वका ज्ञान होनेसे यह उसी तरह नष्ट हो जाता है, जैसे रस्सीका ज्ञान होनेसे उसमें सर्पबुद्धि नष्ट हो जाती है। तुम अनन्त, सत्स्वरूप एवं आकाशके समान व्यापक हो। ज्वालाओंके मध्य-भागकी भाँति प्रकाशमान एवं नित्य शुद्ध हो। तुम्हारा स्वरूप किसीकी दृष्टिमें नहीं आता। तुम सूक्ष्मस्वरूप होकर सम्पूर्ण जगत्के पदार्थोंके भीतर उसी प्रकार स्थित हो, जैसे मुक्ताहारके सभी मोतियोंमें एक ही सूत समाया हुआ है। महाबाहु श्रीराम ! यह शत्रु है, यह अपना है, यह दूसरा है, यह तुम हो, यह मैं हूँ—इत्यादि भावनाएँ यहाँ उसी प्रकार सत्य नहीं हैं, जैसे दृष्टिदोषके कारण होनेवाला दो चन्द्रमा आदिका दर्शन।
(सर्ग १८)
उपशम-प्रकरण ] * पिता-माताके शोकसे व्याकुल हुए अपने भाई पावनको पुण्यका समझाना * २६९
पिता-माताके शोकसे व्याकुल हुए अपने भाई पावनको पुण्यका समझाना—जगत् और उसके सम्बन्धकी असत्यताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी विषयमें विज्ञ पुरुष इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। गङ्गाजीके तटपर दो मुनिकुमारोंमें, जो परस्पर भाई थे, उक्त विषयको लेकर ही जो संवाद हुआ था, वही यह पवित्र एवं अद्भुत इतिहास है; तुम इसे सुनो। इस जम्बूद्वीपकी किसी पर्वतमालामें एक महेन्द्र नामक पर्वत है। उसके एक देशमें जहाँ सुविस्तृत एवं मनोरम रत्नमय शिखर है, मुनियोंने स्नान और जलपानके लिये आकाश-गङ्गाको उतारा था। उसी गङ्गाजीके तट-प्रदेशमें, जहाँके वृक्ष फूलोंसे लदे हुए थे तथा जो पार्श्ववर्ती रत्नमय शिखरकी प्रभासे प्रकाशमान और दीप्तिमान् सुवर्णकी कान्तिसे सुनहरे रंगका दिखायी देता था, एक महर्षि निवास करते थे। उनका नाम था दीर्घतपा। उन्हें सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो चुका था। वे तपस्याकी राशि और उदार-बुद्धि थे तथा तपस्याके मूर्तिमान् रूप-से जान पड़ते थे। उन महर्षिके दो पुत्र थे, जो चन्द्रमाके समान सुन्दर थे,
उनके नाम थे पुण्य और पावन। उन दोनों पुत्रों और
एक पत्नीके साथ वे मुनि गङ्गाजीके उस तटपर रहते थे, जहाँके वृक्ष फलोंसे भरे हुए थे। कुछ समय बीतनेपर मुनिके उन दोनों पुत्रोंमें जो अवस्था और गुण दोनों ही दृष्टियोंसे ज्येष्ठ थे, वे पुण्यनामक मुनि सम्यक् ज्ञानसे सम्पन्न हो गये; परन्तु उनके दूसरे पुत्र पावनका ज्ञान अधूरा ही रह गया। वे मूर्खताकी सीमासे तो बाहर हो गये थे; परंतु उन्हें परमार्थ-तत्त्वका यथार्थज्ञान नहीं प्राप्त हुआ। इसलिये वे बीचमें ही झूल रहे थे।
तदनन्तर सौ वर्ष बीत जानेपर दीर्घतपा जरावस्थासे जर्जर हो गये। अतः उन्होंने अपने शरीरको त्याग दिया
और संकल्प तथा रागसे शून्य परम पदस्वरूप सच्चिदानन्द-घन ब्रह्मभावको प्राप्त कर लिया। तदनन्तर पतिके शरीरको प्राण और अपानसे रहित होकर पृथ्वीपर पड़ा देख मुनिकी पत्नीने भी पतिकी सिखायी हुई चिरकालसे अभ्यस्त यौगिक क्रियाद्वारा अपने शरीरको त्याग दिया और लोगोंकी दृष्टिसे अदृश्य हो अपने पतिकी उसी तरह
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अनुसरण किया, जैसे प्रभा गगनमण्डलमें अस्त होते हुए चन्द्रदेवका अनुसरण करती है । माता और पिताके परलोकवासी हो जानेपर ज्येष्ठ पुत्र पुण्य ही स्थिरचित्त हो उनके अन्त्येष्टि-कर्ममें प्रवृत्त हुए । पावनको माता-पितासे बिछुड़ जानेके कारण बड़ा दुःख हो रहा था । उनका चित्त शोकसे व्याकुल था । वे बड़े भाईकी ओर न देखकर वनकी गलियोंमें घूम-घूमकर विलाप करने लगे । माता-पिताका और्ध्वदेहिक कर्म समाप्त करके उदार-बुद्धि पुण्य वनमें अपने शोकाकुल बन्धु पावनके पास आये ।
पास आकर पुण्यने कहा—वत्स ! यह शोक अन्धता (मोह) का एकमात्र कारण है । तुम इसे घनीभूत क्यों बना रहे हो ? महाप्राज्ञ ! तुम्हारे पिता तुम्हारी माताजीके साथ उस मोक्षनामक सच्चिदानन्दघन परमात्मपदको प्राप्त हो गये हैं, जो सबका अपना ही स्वरूप है। वही सब प्राणियोंका अधिष्ठान है और वही जितात्मा ब्रह्म-वेत्ताओंका स्वरूप है । जब पिता अपने स्वरूपको ही प्राप्त हुए हैं, तब तुम उनके लिये बारंबार शोक क्यों करते हो ? तुमने इस संसारमें ऐसी मोहजनित ममता-मयी भावना बाँध रक्खी है, जिससे तुम अशोचनीय पिताके लिये भी शोक कर रहे हो ! न वे ही तुम्हारी माता थीं और न वे ही तुम्हारे पिता थे । वत्स ! जैसे प्रत्येक वनमें जलके बहनेके लिये बहुत-से नाले होते हैं, उसी तरह तुम्हारे सहस्रों माता-पिता हो चुके हैं। उन माता-पिताके भी असंख्य पुत्र हो चुके हैं, केवल तुम्हीं उनके पुत्र नहीं हो । जैसे नदीके जलमें बहुत-सी तरङ्गें उठती और विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार मनुष्य आदि प्राणियोंके जन्म-जन्ममें बहुतसे पुत्र हो-होकर कालके गालमें जा चुके हैं । वत्स ! यदि स्नेहके कारण माता-पिता और पुत्रोंके लिये शोक करना ही उचित हो तो पहलेके जन्मोंमें जो सहस्रों माता-पिता बीत चुके हैं, उनके लिये निरन्तर शोक क्यों नहीं किया जाता ! महाभाग ! जगत्की कल्पनाके निमित्तभूत भ्रम या अज्ञानके कारण ही यह प्रपञ्च दिखायी देता है । विद्वन् ! वास्तवमें तो तुम्हारे न कोई मित्र है और न बन्धु-बान्धव ही है । वत्स ! पारमार्थिक दृष्टिसे सत्य क्या है? इसका तुम विचार करो । विचार करनेसे तुम्हें ज्ञात होगा कि न तुम हो, न हम हैं । तुम्हारे अन्तःकरणमें जो भ्रम है, उसीके कारण इस जगत्की प्रतीति हो रही है । अतः तुम उसे त्याग दो । 'यह गया, यह मर गया' इत्यादि कुदृष्टियाँ अपने संकल्परूप अज्ञानसे उत्पन्न हो सामने दिखायी देती हैं, वास्तवमें इनकी सत्ता नहीं है।
( सर्ग १९ )
पुण्यका पावनको उपदेश—अनेक जन्मोंमें प्राप्त हुए असंख्य सम्बन्धियोंकी ओरसे ममता हटाकर उन्हें आत्मस्वरूप परमात्मासे ही संतोष प्राप्त करनेका आदेश, पुण्य और पावनको निर्वाण-पदकी प्राप्ति, तृष्णा और विषय-चिन्तनके त्यागसे मनके क्षीण हो जानेपर परमपदकी प्राप्तिका कथन
पुण्य कहते हैं—पावन ! बन्धु, मित्र, पुत्र, स्नेह, द्वेष तथा मोह-दशारूप रंगसे युक्त जो प्रपञ्च है, यह अपने नाममात्रसे विस्तारको प्राप्त हो रहा है (वस्तुदृष्ट्या इनकी सत्ता नहीं है) । जिसके प्रति बन्धुभावना कर
उपशम-प्रकरण ] * पुण्यका पावनको उपदेश * २७१
ली गयी है, वह बन्धु हो गया और जिसके प्रति शत्रुको भावना कर ली गयी, वह शत्रु हो गया। परंतु सभी शरीरोंमें अभिन्नरूपसे विद्यमान जो सर्वव्यापी आत्मा है, उस एकमें ही 'यह बन्धु है, यह शत्रु है' ऐसी कल्पना कैसे हो सकती है? वत्स ! यह शरीर रक्त, मांस और हड्डियोंका समूह है, अस्थियोंका पञ्जर है; इससे भिन्न मैं कौन हूँ, इसका तुम स्वयं अपने चित्तसे विचार करो। पारमार्थिक दृष्टिसे देखनेपर न तुम कोई हो और न मैं कोई हूँ। 'यह पुण्य है, यह पावन है' इत्यादि कल्पनाओंके रूपमें मिथ्याज्ञान ही नृत्य कर रहा है। यदि तुम आत्मासे भिन्न कोई लिङ्गशरीर ही हो तो बताओ । बीते हुए दूसरे अनेक जन्मोंमें जो तुम्हारे बन्धु और धन-वैभव नष्ट हो गये हैं, उनके लिये भी शोक क्यों नहीं करते ? सुन्दर फूलोंसे सुशोभित वनस्थलियोँमें तुम्हारे बहुत-से बन्धु मृगयोनियोंमें मृग-शरीर धारण करके रहे हैं, उनके लिये तुम्हें शोक क्यों नहीं हो रहा है ? वत्स ! इसी जम्बूद्वीपमें तुम पहले अन्यान्य बहुत-सी योनियोंमें सैकड़ों-हजारों बार जन्म ले चुके हो। मैं तत्त्वज्ञानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म-बुद्धिके द्वारा तुम्हारे और अपने पूर्वजन्मके वासना-क्रमको देख रहा हूँ। मेरी भी बहुत-सी योनियों अनेक बार बीत चुकी हैं, उन मोह-मन्थर (अज्ञानसे जडीभूत) अतीत योनियोंको आज मैं तत्त्वज्ञानसे उदित हुई सूक्ष्मदृष्टिसे द्वारा देखता और स्मरण करता हूँ। ऐसी अवस्थामें जो जगत्में उत्पन्न हुए सैकड़ों माता-पिता, भाई-बन्धु और मित्र कालके गालमें जा चुके हैं, उनमेंसे किन-किनके लिये हम दोनों शोक करें और किनके लिये न करें। अथवा किनको-किनको छोड़कर यहाँ किन-किनके लिये हम शोकमें डूबे रहें; क्योंकि संसारकी तो ऐसी ही गति है। पावन ! तुम्हारा भला हो। मनमें अहम्भावके रूपमें स्थित इस प्रपञ्च-भावनाको त्यागकर तुम उस गतिको प्राप्त करो, जो आत्मज्ञानी पुरुषोंको उपलब्ध होती है। वत्स ! तुम शान्तचित्त होकर आत्माका—अपने आपका जो भाव और अभाव (उत्पत्ति और विनाश) से मुक्त तथा जरा और मृत्युसे रहित है, स्मरण करो। मनमें मूढ़ता न लाओ। उत्तम बुद्धिवाले पावन ! न तुम्हें दुःख है न तुम्हारा जन्म हुआ है, न तुम्हारी कोई माता है और न पिता ही है। तुम केवल शुद्ध-बुद्ध आत्मा हो, दूसरे कोई नहीं हो। जैसे रात होनेपर दीपक संनिधिमात्रसे प्रकाशके कर्ता होते हुए भी व्यापार-शून्य होनेके कारण अकर्ता ही हैं, उसी प्रकार तत्त्वज्ञानी पुरुष कर्तापनके अभिमानसे रहित होनेके कारण लोक-व्यवहारकी स्थितिमें कर्ता होकर भी अकर्ता ही हैं। वत्स ! जो समस्त एषणाओंके कलङ्कसे रहित एवं मननशील है तथा जिसका हृदय-कमलमें खस्थ आत्मस्वरूपसे साक्षात्कार किया गया है, उस आत्माके द्वारा अपने भीतरके सम्पूर्ण संसारभ्रमको मिटाकर अवशिष्ट हुए उस भावरूप आत्मा (परब्रह्म परमात्मा) से ही संतोष प्राप्त करो।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! पुण्यके इस प्रकार समझाने-बुझानेपर पावनको उत्कृष्ट बोध (परमात्म-तत्त्वका दृढ़ निश्चय) प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् ज्ञान और विज्ञानमें पारंगत तथा सिद्ध और अनिन्द्य स्थितिको प्राप्त हुए वे दोनों बन्धु उस वनमें इच्छानुसार विचरने लगे। तदनन्तर
२७२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
समय आनेपर वे दोनों देहरहित हो परम निर्वाणपद (परमात्मा) को प्राप्त हो गये । निष्पाप श्रीराम ! इस प्रकार पूर्वजन्मोंमें जो असंख्य देह धारण कर चुके हैं, उन प्राणियोंके माता-पिता, बन्धु-बान्धव आदिका समुदाय अनन्त है । उनमेंसे कौन किनको ग्रहण करे और कौन किनका त्याग । रघुनन्दन ! इसलिये इन असंख्य तृष्णाओंकी निवृत्तिका एकमात्र उपाय त्याग ही है, उनको पोसना नहीं । जैसे लकड़ी डालनेसे आग प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार विषय-भोगोंके चिन्तनसे चिन्ता बढ़ती जाती है; और जैसे बिना ईंधनके आग बुझ जाती है, उसी प्रकार विषयोंका चिन्तन न करनेसे चिन्ता मिट जाती है । एकमात्र विवेकरूपी सखा और एकमात्र पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिरूपिणी प्रिय सखीको साथ ले संसारमें शास्त्रविहित आचरण करनेवाला पुरुष संकट पड़नेपर भी मोहग्रस्त नहीं होता । वैराग्यसे, शास्त्रोंके अभ्याससे तथा महत्तायुक्त क्षमा, दया, शान्ति, समता और संतोष आदि गुणोंसे यत्नपूर्वक आपत्तिका निवारण करनेके लिये मनुष्य स्वयं ही मनको उन्नत बनाये । जो परम पदकी प्राप्तिरूप फल पूर्वोक्त महत्तायुक्त गुणोंसे उत्कर्षको प्राप्त हुए मनके द्वारा उपलब्ध हो सकता है, वह तीनों लोकोंके ऐश्वर्य तथा रत्नोंसे भरे हुए कोशकी प्राप्तिसे भी नहीं हो सकता । मनके विशुद्ध अमृत-रससे पूर्ण होनेपर सारी वसुधा आनन्दकी सुधा-धारासे आप्लावित हो जाती है। मन वैराग्यसे ही पूर्णताको प्राप्त—विज्ञानानन्दघन रससे परिपूर्ण होता है। आशा (इच्छा, कामना आदि) के वशीभूत हुआ मन उपर्युक्त पूर्णताको नहीं प्राप्त होता । जिनके चित्तमें किसी लौकिक वस्तुकी स्पृहा नहीं है, उन लोगोंके लिये तीनों लोकोंका ऐश्वर्य कमलगट्टेके समान अत्यन्त तुच्छ है । श्रीराम ! चित्तके नष्ट हो जानेपर अविचल धैर्यसे युक्त पुरुष उस परमपदको प्राप्त कर लेता है, जहाँ फिर नाशका भय नहीं है। (सर्ग २०-२१)
राजा बलिके अन्तःकरणमें वैराग्य एवं विचारका उदय तथा उनका अपने पितासे पहलेके पूछे हुए प्रश्नोंका स्मरण करना
श्रीवसिष्ठजीने कहा—अथवा हे रघुकुलरूपी आकाशके पूर्ण चन्द्रमा श्रीराम ! तुम राजा बलिकी भाँति विवेकके द्वारा परब्रह्म परमात्माका यथार्थ एवं विशुद्ध ज्ञान प्राप्त करो ।
श्रीरामचन्द्रजी बोले—भगवन् ! सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता गुरुदेव ! आपकी कृपासे मुझे प्राप्तव्य सच्चिदानन्दघन परमात्माके ज्ञानका यथार्थ अनुभव प्राप्त है और उसी निर्मल पदमें मैं परम शान्तिको प्राप्त होकर स्थित हूँ । प्रभो ! जैसे शरद्ऋतुमें आकाशसे बा दल हट जाते हैं उसी प्रकार मेरे चित्तसे तृष्णा नामक महान् तम (अज्ञानान्धकार) का अत्यन्त अभाव हो गया है। पूर्णिमाके सायंकालमें उदित हुए आकाशवर्ती शीतल अमृतमयी किरणोंसे सम्पन्न तथा महातेजस्वी पूर्ण चन्द्रमाके समान मैं विज्ञानानन्दघनमय अमृतसे परिपूर्ण, चिन्मय आकाशस्वरूप ब्रह्ममें विराजमान शान्तिमय महान् प्रकाशस्वरूप तथा अन्तःकरणमें परमानन्दसे परिपूर्ण होकर स्थित हूँ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! मैं तुमसे बलिके उत्तम वृत्तान्तका वर्णन करता हूँ, सुनो ! इस ब्रह्माण्ड-कोशके भीतर किसी दिशारूपी निकुञ्जमें भूमिके नीचे विद्यमान पाताल नामसे विख्यात एक लोक है, जिसमें असुरोंके बाहुदण्डोंपर आधारित महान् साम्राज्य है ।
उपशम-प्रकरण ] * राजा बलिके अन्तःकरणमें वैराग्य एवं विचारका उदय *
उस साम्राज्यपर विरोचनकुमार बलि राजाके रूपमें प्रतिष्ठित हुए। वे दैत्यराज बलि त्रिलोकीके रत्नोंके कोश, समस्त शरीरधारियोंके रक्षक तथा भुवनपालोंके भी पाळक हैं। साक्षात् भगवान् विष्णु उनकी रक्षा करते हैं। उन्होंने अनायास ही वशमें किये हुए सम्पूर्ण लोकोंके विस्तारसे अपने आपको विभूषित करके दस करोड़ वर्षोंतक राज्य किया। तदनन्तर आने-जानेवाले बहुत-से युग बीत गये। देवताओं और असुरोंके महान् समूह कभी उन्नतिको प्राप्त हुए और कभी उनका पतन हुआ। तीनों लोकोंमें अत्यन्त उत्कृष्ट समझे जानेवाले बहुत-से भोगोंका निरन्तर उपभोग करते-करते एक समय दानवराज बलिको उन भोगोंसे अत्यन्त उद्वेग (वैराग्य) प्राप्त हुआ। एक दिन मेरुपर्वतके शिखरपर स्थित रत्नोंके बने हुए विशाल भवनमें खिड़कीके सामने बैठे हुए दैत्यराज बलि स्वयं ही संसारकी स्थितिपर विचार करने लगे— 'अहो ! अक्षुण्ण शक्तिवाले मुझ बलिको अब इस लोकमें कितने समयतक यह साम्राज्य चलाना और तीनों लोकोंमें विचरना होगा ? मेरा यह महान् राष्ट्र तीनों लोकोंको आश्चर्यमें डालनेवाला है। प्रचुर भोगोंसे सम्पन्न होनेके कारण यह अत्यन्त मनोहर जान पड़ता है, किंतु इसके उपभोगसे मेरा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध हो रहा है ! आरम्भमें तभीतक मधुर प्रतीत होता है, जबतक नष्ट या विकृत नहीं हो जाता, और जिसका विनाश अवश्यम्भावी है, उस भोग-समुदायका उपभोगमात्र करना मेरे लिये क्या सुखदायक हो सकता है ? जिसके प्राप्त हो जानेपर दूसरा कुछ पाना या करना शेष न रह जाय, उस परम उदार अद्वितीय (परमात्मप्राप्तिरूप) फलको मैं यहाँ नहीं देख पाता । इन क्षणभङ्गुर भोगोंको छोड़कर दूसरा नित्य, उत्तम एवं यथार्थ सुख क्या है ? इसीका मैं विचार करता हूँ।' विवेक-वैराग्ययुक्त बुद्धिसे ऐसा सोच-समझकर राजा बलि तत्काल ध्यानमग्न हो गये।
तदनन्तर विचार किये हुए परम पुरुषार्थका मन-ही-मन चिन्तन करते हुए असुरराज बलिने क्षणभरमें भूतपूर्व स्मरणपूर्वक कहा—"अरे ! याद आ गया। पहलेकी बात है, जिन्होंने लोकके छोटे-बड़े सभी व्यवहारोंको देखा था तथा जो आत्मतत्त्वके ज्ञानसे सम्पन्न थे, उन अपने ऐश्वर्यशाली पिता महाराज विरोचनसे मैंने पूछा—'महामते ! जहाँ समस्त दुःखों और सुखोंसे सम्बन्ध रखनेवाले मार्ग शान्त हो जाते हों, संसारकी वह सीमा कौन है ! तात !
२७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मनका मोह कहाँ शान्त होता है ? समस्त एषणाओंका कहाँ अभाव होता है तथा चिरकालके लिये निरन्तर एवं पुनरावृत्तिरहित विश्राम कहाँ प्राप्त होता है ? पूज्य पिताजी ! अविनाशी आनन्दसे परम सुन्दर किसी ऐसे परमपदका मेरे लिये वर्णन कीजिये, जहाँ स्थित होकर मैं सदाके लिये परमशान्ति प्राप्त कर लूँ।' मेरे इस प्रश्नको सुनकर पिताने सम्मोहशान्ति (अज्ञान-निवारण) के लिये मुझसे यह बात कही।' (सर्ग २२-२३)
विरोचनका बलिको भोगोंसे वैराग्य तथा विचारपूर्वक परमात्मसाक्षात्कारके लिये उपदेश
विरोचन बोले—महामते ! मनुष्यसे लेकर ब्रह्मपदतक सम्पूर्ण पदोंका अतिक्रमण करनेवाला जो मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरका स्वामी शुद्ध आत्मा है, वह एक राजाके समान है। उसने बुद्धियुक्त मनको अपना मन्त्री बनाया है। उस मन्त्रीको जीत लेनेपर सबको जीत लिया जाता है और सब कुछ प्राप्त हो जाता है। परंतु उसे अत्यन्त दुर्जय समझना चाहिये। वह बलसे नहीं, युक्तिसे ही जीता जाता है।
बलिने कहा—भगवन् ! उस चित्तरूपी मन्त्रीपर आक्रमण करनेके लिये जो युक्ति या उपाय हो, उसे आप भलीभाँति बताइये, जिससे मैं उस भयंकर मनपर विजय पा सकूँ।
विरोचन बोले—बेटा ! सभी विषयोंके प्रति सब प्रकारसे जो अत्यन्त अनास्था (वैराग्य) है वही मनपर विजय पानेके लिये उत्तम युक्ति है। यह अनास्था ही वह उत्तम युक्ति है, जिससे महान् मदमत्त मनरूपी मातङ्ग (गजराज) का शीघ्र ही दमन किया जा सकता है। महामते ! यह युक्ति अत्यन्त दुर्लभ और परम सुलभ भी है। यदि इसके लिये अभ्यास न किया जाय तो यह अत्यन्त दुर्लभ है। परंतु यदि इसके लिये भलीभाँति अभ्यास किया जाय तो यह अनायास ही प्राप्त हो जाती है। बेटा ! यदि क्रमशः विषयोंसे विरक्त होनेका अभ्यास किया जाय तो जैसे सींचनेसे लता लहलहा उठती है, उसी प्रकार यह विरक्ति भी सब ओरसे सुस्पष्टतः प्रकट हो जाती है। पुत्र ! जैसे बोये बिना धान नहीं प्राप्त होता, वैसे ही यदि विरक्तिके लिये अभ्यास न किया जाय तो विषय लोलुप पुरुष कितना ही क्यों न चाहे, यह विरक्ति उसे नहीं मिलती; अतः तुम इसे अभ्यासके द्वारा दृढ़ करो। संसाररूपी गर्तमें निवास करनेवाले ये जीव तबतक नाना प्रकारके दुःखोंमें भटकते रहते हैं, जबतक उन्हें विषयोंसे वैराग्य नहीं हो जाता। जैसे कोई अत्यन्त बलवान् देहवाला मनुष्य भी यदि पैर उठाकर कहीं जाय नहीं तो वह देशान्तरमें नहीं पहुँच सकता, उसी तरह कोई शारीरिक शक्तिसे सम्पन्न पुरुष भी यदि अभ्यास न करे तो वह विषयोंसे वैराग्य नहीं प्राप्त कर सकता। इसलिये देहधारी मनुष्यको चाहिये कि वह जीवन्मुक्तिके हेतुभूत पूर्वकथित ध्येय नामक वासना-
उपशम-प्रकरण ] * विरोचनका बलिको भोगोंसे वैराग्य तथा विचारपूर्वक आत्मसाक्षात्कारके लिये उपदेश * २७५
त्यागकी अभिलाषा एवं चिन्तन करते हुए भोगोंकी ओरसे विरक्तिका अभ्यासपूर्वक विस्तार करे—ठीक वैसे ही, जैसे सींचने आदिके द्वारा लगायी हुई बेलको बढ़ाया जाता है। बेटा! हर्ष और अमर्षसे रहित शुभ कर्मफलको प्राप्त करनेके लिये इस संसारमें परम पुरुषार्थके सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है। पुरुषार्थसे ही उसकी प्राप्ति होती है। संसारमें दैवकी चर्चा बहुत की जाती है। परन्तु दैव कहीं देहधारण करके स्थित हो, ऐसी बात नहीं है। अवश्य होनेवाली जो भवितव्यता है—नियतिके द्वारा मिलनेवाला जो अपने ही शुभाशुभ कर्मोंका फल है, उसीको यहाँ दैव अथवा प्रारब्ध नाम दिया गया है।
प्रारब्ध-भोगरूप जो दैव है, उसे परम पुरुषार्थसे ही जीता जाता है। जीवात्मा पुरुष-शरीर धारण करके पुरुषार्थसे जिस पदार्थका जैसे संकल्प करता है, इस लोकमें वह पदार्थ उसे उसी रूपमें प्राप्त होता है, दूसरे किसी रूपमें नहीं। बेटा! इस जगत्में पुरुषार्थके सिवा दूसरा कुछ नहीं है। अतः उत्तम पुरुषार्थका आश्रय ले भोगोंकी ओरसे वैराग्य प्राप्त करे। जबतक भोगोंसे वैराग्य, जो संसार-बन्धनका विनाश करनेवाला है, नहीं प्राप्त होता, तबतक विजयदायक परमानन्दकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जबतक मोहमें डालनेवाली विषयासक्ति बनी हुई है, तबतक भवदशारूपी झूला चञ्चल गतिसे आन्दोलित होता रहता है अर्थात् जीवको संसारमें भटकानेवाली अस्थिर अवस्था प्राप्त होती रहती है। पुत्र! अभ्यासके बिना विषयभोगरूपी भुजङ्गोंसे भरी हुई दुःखदायिनी दुराशा कदापि दूर नहीं होती।
बलिने पूछा—असुरेश्वर! विषयोंकी ओरसे जो वैराग्य है, वह जीवके अन्त:करणमें कैसे दृढतापूर्वक स्थित होता है?
विरोचनने कहा—बेटा! आत्मसाक्षात्काररूपिणी फलदायिनी लता जीवके अन्तःकरणमें विषयभोगोंसे विरक्तिरूपी फल अवश्य उत्पन्न करती है। आत्म-साक्षात्कार होनेपर विषयोंमें (राग-आसक्ति) का अत्यन्त अभाव हो जाता है। इसलिये पुरुष पवित्र और तीक्ष्ण बुद्धिके द्वारा अति उत्तम विवेक-विचारसे परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करे। साथ ही विषयोंकी आसक्तिसे सर्वथा रहित हो जाय। पवित्र एवं तीक्ष्ण बुद्धिवाला पुरुष दिनके दो भागोंमें अपने चित्तको वैराग्यपूर्वक परमार्थ-साधनरूप सत्-शास्त्रके अनुशीलनमें लगाये, तीसरे भागमें एकान्तदेशमें स्थित होकर मनको सच्चिदानन्दघन परमात्माके ध्यानमें लगाये तथा चौथे भागमें अपने चित्तको श्रद्धाभक्तिपूर्वक गुरुकी सेवा और आज्ञापालनमें लगाये। साधु स्वभाव (श्रेष्ठ आचरण) को प्राप्त हुआ पुरुष ही ज्ञानोपदेश पानेका अधिकारी होता है। जैसे स्वच्छ वस्त्र ही उत्तम रंगको ग्रहण करता है, उसी तरह सदाचारी पुरुष ही ज्ञानोपदेशको अपने हृदयमें धारण करता है। यह चित्त एक बालकके समान है। इसे पवित्र, वचनों, युक्तियों और शास्त्रके अनुशीलनसे धीरे-धीरे लाड़-प्यारके साथ रिझाकर वशमें करना चाहिये।
बेटा! शुद्ध और सूक्ष्म बुद्धिसे तृष्णा-आसक्तिका सर्वथा अभाव करते हुए ही सच्चिदानन्दघन परमात्माका चिन्तन करना चाहिये; क्योंकि परमात्माका साक्षात्कार होनेपर तृष्णा एवं आसक्तिका सर्वथा अभाव होता है और तृष्णा एवं आसक्तिका अभाव होनेपर परमात्माका साक्षात्कार होता है। इस तरह ये दोनों बातें एक-दूसरेपर अवलम्बित हैं। इसलिये दोनों साधनोंको एक साथ करते रहना चाहिये। जब भोग-समूहोंमें आसक्तिका अत्यन्त अभाव हो जाता है तथा परावरस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्मदेवका साक्षात्कार हो जाता है, तब जीवको कभी नष्ट न होनेवाली सीमारहित परमशान्ति प्राप्त हो जाती है। विषयोंमें ही आनन्द मानकर उनका आस्वादन करनेवाले मनुष्योंको तो इस जगत्में कभी भी परमात्म-तत्त्वके श्रवण बिना निस्सीम एवं निरतिशय आनन्दकी
२७६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्राप्ति नहीं होती। सकामभावसे किये गये यज्ञ, दान, तप और तीर्थसेवनसे तो स्वर्गादि सुख ही प्राप्त होते हैं। आत्माका यथार्थ ज्ञान हुए बिना उन तप, दान और तीर्थ-सेवनरूप सकाम साधनोंद्वारा जीवको कभी विषयोंसे वैराग्य नहीं होता।
बेटा ! अपने परम पुरुषार्थके बिना पुरुषकी बुद्धि किसी भी युक्तिसे कल्याणके हेतुभूत आत्मज्ञानमें प्रवृत्त नहीं होती। भोगोंके सर्वथा त्यागसे प्राप्त होनेवाले परम पुरुषार्थके बिना ब्रह्मपदकी प्राप्तिरूप परम शान्ति एवं परमानन्दकी उपलब्धि नहीं होती। परम कारणरूप परमात्माका यथार्थ बोध हो जानेपर मनुष्यको जैसी शान्ति प्राप्त होती है, वैसी ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त इस सम्पूर्ण जगत्में कहीं भी नहीं मिलती। बुद्धिमान् मनुष्य परम पुरुषार्थका आश्रय ले दैव (प्रारब्ध) को दूरसे ही त्याग दे तथा कल्याणरूपी भवनके द्वारको दृढ़तापूर्वक बन्द रखनेवाले अर्गलारूप जो भोग हैं, उनसे घृणा करे—उनकी ओरसे सर्वथा विरक्त हो जाय। भोगोंके प्रति वैराग्यसे परमात्मविषयक विचार उत्पन्न होता है और परमात्मविषयक विचार उदित होनेपर भोगोंकी ओरसे वैराग्य होने लगता है। जैसे समुद्र बादलोंको और बादल समुद्रको भरते हैं, उसी तरह ये दोनों साधन एक-दूसरेके पूरक हैं। जैसे परस्पर अत्यन्त स्नेह रखनेवाले सुहृद् एक-दूसरेके मनोरथ सिद्ध करते हैं, उसी प्रकार भोगोंसे वैराग्य, परमात्म-विषयक विचार और नित्य आत्मदर्शन—ये तीनों एक दूसरेको पुष्ट करते हैं। मनुष्यको चाहिये कि पहले देशाचार और सदाचारके अनुकूल तथा बन्धु-बान्धवोंकी सम्पत्तिके अनुरूप न्याययुक्त पुरुषार्थद्वारा क्रमशः धनका उपार्जन करे। उस धनके द्वारा कुलीन और गुणशाली सज्जनोंको अपनाये—उनकी सेवा करके उन्हें अपने अनुकूल बनाये। उन सत्पुरुषोंका सङ्ग करनेसे भोगोंकी ओरसे विरक्ति होने लगती है। तदनन्तर विवेकपूर्वक विचारका उदय होता है। तत्पश्चात् शास्त्रोंके यथार्थ अर्थका अनुभव होता है। उसके बाद क्रमशः परम पदस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति होती है। (सर्ग २४)
बलिको पिताके दिये हुए ज्ञानोपदेशके स्मरणसे संतोष तथा पहलेकी अज्ञानमयी स्थितिको याद करके खेद प्रकट करते हुए शुक्राचार्यका चिन्तन करना, शुक्राचार्यका आना और बलिसे पूजित होकर उन्हें सारभूत सिद्धान्तका उपदेश देकर चला जाना
बलि मन-ही-मन कहने लगे—पूर्वकालमें सुन्दर विचार रखनेवाले मेरे पूज्य पिताजीने मुझे ऐसा उपदेश दिया था। सौभाग्यकी बात है कि वह उपदेश मुझे इस समय याद आ गया, इससे मैं प्रबुद्ध हो गया हूँ। आज मेरे अन्तःकरणमें भोगोंके प्रति यह अतिशय विरक्ति प्रत्यक्ष अनुभवमें आने लगी है। बड़े आनन्दकी बात है कि मैं अमृतके समान शीतल, विशुद्ध एवं परम शान्तिमय परमानन्द-सिन्धुमें प्रविष्ट हो गया हूँ। अहा ! अन्तःकरणको शीतल बना देनेवाली यह शान्तिमय स्थिति बड़ी ही रमणीय है। इस शान्तिमयी स्थितिमें सुख-दुःखकी सारी दृष्टियाँ ही शान्त (विलीन) हो गयी हैं। परम उपरतिमें स्थित हो मैं परम शान्तिका अनुभव करता हूँ। सब ओरसे निर्वाणको प्राप्त हो रहा हूँ। सुखपूर्वक स्थित हूँ और मेरे अन्तःकरणमें ऐसा अपार हर्ष हो रहा है, मानो मुझे चन्द्रमण्डलमें स्थापित कर दिया गया है। समस्त वैभवोंके दृष्टान्तभूत महान् वैभवका मैंने उपभोग किया, भोगने योग्य सारे भोगोंको बिना किसी बाधाके भोग लिया और समस्त
उपशम-प्रकरण ] * बलिका पिताके दिये हुए ज्ञानोपदेशके स्मरणसे संतोष * २७७
प्राणियोंको पददलित कर दिया, तो भी इससे मुझे कौन-सा सुन्दर लाभ मिला ? परलोकमें, इस लोकमें तथा अन्य स्वर्ग आदिमें इधर-उधर, बारंबार वे ही पहलेकी अनुभव की हुई वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं। कहीं कोई अपूर्व (नूतन) वस्तु नहीं है । पातालमें, भूलोकमें और स्वर्गमें सार पदार्थ क्या है—सुन्दरी स्त्रियाँ, रत्न एवं मणिमय प्रस्तर आदि । परंतु काल इन सबको क्षणभरमें निगल जाता है । आजसे पहले इतने समयतक मैं पूरा मूर्ख बना रहा जो तुच्छ सांसारिक वस्तुओंकी इच्छासे देवताओंके साथ द्वेष करता रहा । जो मनकी कल्पनामात्रा है, उस जगत् नामकी महती मानसिक व्यथाका त्याग न करनेसे कौन-सा पुरुषार्थ सिद्ध होता है ? इसमें महात्मा पुरुषका क्या अनुराग होगा ? अहो ! बड़े दुःखकी बात है कि अज्ञानरूपी मदसे मत्त हुए मैंने दीर्घकालतक अनर्थमें ही अर्थ-बुद्धि करके स्वयं ही उसका सेवन किया । अत्यन्त चञ्चल तृष्णावाले मुझ मूर्खने तीनों लोकोंमें केवल अपने पश्चात्तापको बढ़ानेके लिये अबतक क्या नहीं किया ? अब मैं आश्रित जनोंपर सदा प्रसन्न रहनेवाले गुरुदेव भगवान् शुक्राचार्यका चिन्तन करता हूँ । उनकी वाणीद्वारा उपदेश पाकर मैं अनन्त प्रभावशाली विज्ञानानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें स्थित होऊँगा; क्योंकि महात्माओंके उपदेश-वाक्य अक्षय वस्तुको फलरूपमें उत्पन्न करते हैं—अविनाशी तत्त्वका बोध करा देते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! बलवान् बलिने ऐसा सोचकर आँखें बंद कर लीं और विज्ञानानन्दघन ब्रह्मस्वरूप आकाशमें स्थित कमलनयन शुक्राचार्यका चिन्तन किया । तब परमात्माके ध्यानमें नित्य तत्पर रहनेवाले शुक्राचार्यने सर्वव्यापी ब्रह्मके स्वरूपमें स्थित और चित्तके द्वारा परमात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले अपने शिष्य बलिके विषयमें यह जान लिया कि वह अपने नगरमें तत्त्वज्ञानकी इच्छा रखकर गुरुसे मिलना चाहता है । यह जानकर प्रभु शुक्राचार्यजी, जो सर्वगत अनन्त चेतन परमात्मामें स्थित हैं, अपने आपको बलिकी रत्ननिर्मित खिड़कीके पास ले आये अर्थात् वे बलिके यहाँ स्वयं उपस्थित हो गये । वहाँ राजा बलिने रत्नमय अर्घ्य देकर, मन्दारवृक्षके पुष्पोंकी राशियाँ चढ़ाकर और चरणोंमें मस्तक झुकाकर इन शुक्राचार्यका पूजन किया । जब वे रत्नमय अर्घ्य ग्रहण करके पूर्णतया पूजित तथा मन्दारवृक्षके फूलोंद्वारा निर्मित मुकुटसे विभूषित होकर बहुमूल्य आसनपर विराजमान हो गये, तब बलिने अपने उन गुरुदेवसे इस प्रकार कहा ।
बलि बोले—भगवन् ! जैसे नवोदित सूर्यकी प्रभा संध्या-वन्दन आदि कर्म करनेके लिये लोगोंको प्रेरित करती है, उसी प्रकार आपके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुई मेरी यह बुद्धि मुझे आपके सामने कुछ कहनेके लिये प्रेरित कर रही है । प्रभो ! मैं महान् मोह प्रदान करनेवाले भोगोंसे विरक्त हूँ, इसलिये ऐसे परम तत्त्वको जानना चाहता हूँ, जो अपने ज्ञानमात्रसे महान् मोहका नाश कर दे।
शुक्राचार्य बोले—सर्वदानवराजेन्द्र ! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ ? मैं आकाशमें जानेके लिये उद्यत हूँ; इसलिये संक्षेपसे सार तत्त्व बता रहा हूँ, सुनो ! इस संसारमें एकमात्र चेतन ही है । यह सब जगत् भी चेतनमात्र—चिन्मय ही है । तुम भी चिन्मय, मैं भी चिन्मय और ये लोक भी चिन्मय हैं। अर्थात् जो कुछ भी दिखायी देता है, वह सब एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है—यह समस्त सिद्धान्तोंका सार है । यदि तुम श्रद्धालु हो तो इस निश्चयसे तुम सब कुछ प्राप्त कर सकते हो; और यदि तुममें श्रद्धा नहीं है तो तुम्हें
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दिया गया बहुत-सा उपदेश भी राखमें डाली गयी आहुतिके समान व्यर्थ है। चेतनकी जो विषयाकार कल्पना है, वही बन्धन है। उससे छूटना ही मोक्ष कहलाता है। विषयाकाररहित चेतन ही पूर्ण ब्रह्म परमात्मा है, यह समस्त सिद्धान्तोंका सार है। इस सिद्धान्तको ग्रहण करके यदि तुम स्वयं अखण्डाकार वृत्तिसे अपने द्वारा अपने आपका यथार्थ अनुभव करोगे तो अनन्त परमपदस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाओगे। मैं इस समय देवलोकको जाता हूँ। मुझे यहाँपर सप्तर्षि मिले थे। वहाँ देवताओंके किसी कार्यके लिये मुझे रहना होगा।
ऐसा कहकर शुक्राचार्यजी ग्रहसमुदायसे भरे हुए आकाशमार्गसे चले गये। (सर्ग २५-२६)
राजा बलिको शुक्राचार्यके दिये हुए उपदेशपर विचार करते-करते समाधिस्थ हो जाना, दानवोंके स्मरण करनेसे आये हुए दैत्यगुरुका बलिकी सिद्धावस्थाको बताकर उनकी चिन्ता दूर करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! देवताओं और असुरोंकी सभामें श्रेष्ठ माने जानेवाले भृगुनन्दन शुक्राचार्यके चले जानेपर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बलिने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—"भगवान् शुक्राचार्यने यह ठीक ही कहा है कि 'ये तीनों लोक चेतन ही हैं। मैं चेतन हूँ, ये सब लोग चेतन हैं, दिशाएँ चेतन हैं और ये सब क्रियाएँ भी चेतन ही हैं।' वास्तवमें जगत्के बाहर और भीतर सब चेतन ही है। चेतनके अतिरिक्त यहाँ कहीं कुछ भी नहीं हैं। इन्द्रियाँ चेतन हैं, शरीर चेतन है, मन चेतन है, उसकी इच्छा चेतन है, भीतर चेतन है, बाहर चेतन है, आकाश चेतन है, समस्त भाव-पदार्थ चेतन हैं तथा इस जगत्की स्थिति भी चेतन ही है। अर्थात् जो कुछ भी है, वह एक सच्चिदानन्दघन परमात्माका ही स्वरूप है। वहाँ केवल चेतन-ही-चेतन है, दूसरी कोई कल्पना ही नहीं है। संसारमें जब द्वैतकी सम्भावना ही नहीं है अर्थात् एक चेतन परमात्माके सिवा दूसरी किसी वस्तुकी सत्ता ही नहीं है, तब कौन किसका शत्रु है और कौन किसका मित्र। बहुत विचारनेसे भी इस विशाल त्रिलोकीके भीतर चेतनके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु सिद्ध नहीं होती। उस अतिशय शुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मामें न द्वेष है न राग, न मन है और न उसकी वृत्तियाँ ही। फिर उस चिन्मय परमात्मामें विकल्पकी कल्पना हो ही कैसे सकती है। मैं सर्वत्र विचरनेवाला, व्यापक, नित्यानन्दमय, विकल्प-कल्पनासे रहित तथा द्वैतसे शून्य सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही हूँ। मैं आकाशके समान सर्वव्याप्त, अनन्त और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हूँ; इसलिये ये सुख-दुःख आदिकी दशाएँ मेरे पास नहीं फटक पातीं।"
इस प्रकार विचार करते हुए ही परम विवेकी दैत्यराज बलि ओंकारसे प्रकट हुए उसकी अर्धमात्रा (मकार